Friday, May 27, 2011

काऊ के बोलोश ना!


(यह आलेख काफी समय पहले नागरिक उत्तर प्रदेशमें प्रकाशित हुआ था. शिवानी मेरी सबसे प्रिय लेखिका रही है इसलिए इसे में इस ब्लॉग पर नागरिक उत्तर प्रदेश से साभार पुनर्प्रकाशित कर अपने मित्रों के साथ बाँट रहा हूँ. )


हिंदी की सर्वाधिक लोकप्रिय, निर्भीक, एवं गरिमामयी कथा-लेखिका गौरा पन्त शिवानी जन्मी भले ही गुजरात में पर "कृष्णकली" के रेवतिशरण तिवारी परिवार की गृहस्वामिनी की तरह ही उनके व्यक्तित्व में "कुमाऊँ एवं बंगाल की संस्कृति का अद्भुत मिश्रण" था. उनके बहुत से उपन्यासों में जहाँ एक ओर कुमाऊँ अंचल के लोक जीवन का सुन्दर और सटीक चित्रण मौजूद है वहीँ दूसरी ओर उनकी रचनाओं में तत्सम, समास-युक्त शब्दावली के साथ-साथ बांग्ला साहित्य और बांग्ला भाषा का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है. इस प्रभाव के पीछे शिवानी के अपने पारिवारिक तथा वे प्रारंभिक शिक्षा-संस्कार थे जो उन्हें शांति निकेतन आश्रम में लगभग नौ वर्षों के शिक्षा काल में मिले.

शांति निकेतन में शिवानी को अपने गुरुजनों के रूप में न केवल गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर बल्कि बलराज साहनी, गुरदयाल मल्लिक, डॉक्टर एलेक्स एरंसन, मिस मार्जारी साइक्स तथा क्षितीश राय जैसी नामी-गिरामी हस्तियों का शिष्यत्व एवं सान्निध्य मिला. यही नहीं, यहाँ उन्हें ऐसे सहपाठी भी मिले जो आगे चलकर अपने-अपने क्षेत्र में सुविख्यात हुए. इनमे से एक माणिक दा यानी सत्यजित रे थे जिनके साथ आगे चल कर शिवानी का प्रगाढ़ सम्बन्ध बना. इन सभी लोगों का स्मरण शिवानी ने अपने अनेक संस्मरणों में बड़ी ही आत्मीयता एवं श्रद्धा भाव से किया है.

शिवानी के ये संस्मरण पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखे गए कालमों तथा उनकी कुछ कृतियों में प्रकाशित हुए हैं जिनमे "स्मृति-कलश", "झरोखा" तथा "एक थी रामरती" के नाम उल्लेखनीय हैं. इन संस्मरणों को पढते हुए मुझे बार-बार देवेन्द्र सत्यार्थी की पुस्तक "यादों के काफिले" याद आती रही. गौरतलब है कि सत्यार्थी जी ने भी लोकगीत खोजने की धुन में देश-दुनिया का भ्रमण करते हुए गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर, नन्द लाल बसु, अवनींद्र नाथ ठाकुर, बलराज साहनी आदि का सान्निध्य प्राप्त किया था और अपने चिरपरिचित अंदाज में इन सभी का स्मरण किया, हालांकि शिवानी की संस्मृतियों में आश्रम की गुरु-शिष्य परंपरा की जैसी विरल छवियाँ हैं देवेन्द्र सत्यार्थी की पुस्तक में नहीं.

शिवानी के छात्र-जीवन के प्रसंगों में सबसे अधिक रोचक कीट्स की कविता वाला प्रसंग है. शिवानी लिखती हैं-"एक बार हमारी कक्षा में दक्षिण का एक नया छात्र शिवशंकर मुन्दुकर आ गया. तब तक कक्षा में प्रथम आने का सौभाग्य मुझे प्राप्त था. अपने जर्मन प्रोफेसर डॉक्टर एलेक्स एरनसन की मैं प्रिय छात्र थी किन्तु मुन्दुकर के आने के साथ ही मेरी प्रतिभा भी म्लान होने लगी. एक बार हमें कीट्स कि एक कविता का क्रिटिकल अप्रिसिएशन लिखने को दिया गया कि घर से लिख कर लाना. बेईमानी की प्रचुर गुंजाईश थी. इसी से मैं भागी गुरुदेव के पास "प्लीज, आप लिखा दीजिए , फिर देखूँगी कैसे पछाड पाता है वह दक्षिणी छात्र. पहले तो गुरुदेव ने डोंट कर भगा दिया फिर भी मैं अडी रही. कुछ ही पंक्तियों में कीट्स को धन्य कर दिया गुरुदेव ने. मैंने दूसरे दिन कॉपी "सबमिट" की. तीसरे दिन कॉपी मिली तो रवींद्रनाथ को मिले दस में चार और "टू इल्यूसिव (बहुत ज़टिल) के कटु शब्द. मुन्दुकर को दस में से छः. मेरी हाड-मज्जा भस्म हो गई. मैं फिर भागी गुरुदेव के पास, "देखा, आप कहते थे अपने विदेशी गुरुजनों का आदर करो, विदेशी गुरु ने ही आपको चार नम्बर दिए"

बड़ी जोर से हँसे वे. बोले, " काऊ के बोलोश ना!" (किसी से कहना मत)

ऐसा ही एक मजेदार प्रसंग आश्रम की मासिक साहित्य-सभा में आयोजित आशुकवि प्रतियोगिता का है जिसमे शिवानी ने एक दिग्गज प्रतियोगी, जो उनके अपने ही बड़े भाई "त्रिभुवन" थे, को हराकर गुरुदेव से पहला पुरस्कार प्राप्त किया था. शिवानी के शब्दों में "समस्यापूर्ति के लिए उस दिन लड़कियों को मिली थी ये पंक्ति-"इफ आय वेयर ए बॉय!" और लड़कों को "इफ आय वेयर ए गर्ल!" मैंने तत्काल लिखा था-" इफ आय वेयर ए बॉय व्हाट वुड बिकम ऑफ द बॉय आय लव? पुरस्कार तो मिल गया पर दूसरे दिन से शिवानी का आश्रम से निकलना दूभर हो गया. जहां जाती, लड़के चीखते, "हे, हूँ इज द लकी वन?

शांति निकेतन में शिवानी के अंग्रेजी के दो अध्यापक थे. एक गुरुदयाल मल्लिक और दूसरे बलराज साहनी. बलराज साहनी और उनकी पत्नी दमयंती के जो व्यक्तिचित्र शिवानी ने खींचे हैं वे किसी आनंद-कथा से कम नहीं.

"हमारे दूसरे अंग्रेजी के अध्यापक थे श्री बलराज साहनी जो बाद को फिल्म-जगत के नक्षत्र बनकर चमके. गोरा रंग, सजीला व्यक्तित्व, लाल खद्दर का कुरता और सवा लाख की चाल. लगता सेहरा बांधे कोई दूल्हा चला आ रहा है. वे हमारी अंग्रेजी कविता की क्लास लेते थे. उनकी शिक्षा-प्रणाली मौलिक थी. किसी भी अंग्रेजी अखबार का संपादकीय दी कर कहते, "पहले इसे पढ़ो, फिर इसी विषय पर अपने ढंग से सम्पादकीय लिखो. आज जो थोड़ी बहुत ठसक कलम में आ पाई है, वह मेरे उसी गुरु की देन है.

उनकी पत्नी दमयंती दी तब हमारे छात्रावास में रहती थीं. दम्मो दी गज़ब की आनंदी युवती थीं. गोरा रंग, बेहद घुंघराले बाल, जो उनके सलोने चेहरे पर कुंडल किरीट बन कर छाये रहते, कानों में लंबे -लंबे लाल चेरी बने बुँदे और खड्ग के धार-सी तीखी सुभग नासिका. अब जब कभी किसी धारावाहिक में उनके बेटे परीक्षित साहनी को देखती हूँ, तो बार-बार उन दम्मो दी की याद हो आती है, जो मुझे परीक्षा के सन्निकट त्रास से क्षण भर को मुक्ति दिलाने बरबस अपने कमरे में खींच ले जाती, " ए पढाकू लड़की, क्या हर वक्त किताबों में घुसी रहती है? चल महफ़िल जमाएं."

और फिर दम्मो दी की महफ़िल किसी मोती-सी पुस्तक की डफली बजाते हुए इस गाने के साथ जगती- "अध्धी राती/चन्न् तारे/ परशु प्यारा/अंख मारे/परशुरामा मथासड्इया/दिल मेरा छीना तूने."

शांति निकेतन में ही शिवानी के एक सहपाठी था गिरधारी. उसके पिता डॉक्टर हीरालाल सौराष्ट्र की रियासत जसदन में डॉक्टर थे. बचपन से आश्रम में रहने के कारण गिरधारी पूरी तरह बंगाली बन गया था और फर्राटेदार बांगला बोलता था. आश्रम में उसे घंटा कुमार कहा जाता था क्योंकि आश्रम के घंटे की रस्सी उसी के हाथों में रहती.

एक बार आश्रम से सटे संथाल ग्राम में भीषण आग लग गई और आग की लपटों का आश्रम तक पहुँचने का खतरा देख गिरधारी डोरी खींच-खींच कर जोर से घंटा बजाने लगा. आश्रम के लोग बाल्टियों में पानी भर-भर कर ग्राम की आग बुझाने दौड पड़े. शिवानी ने, जो अब तक ठगी हुई सी खड़ी थी, गिरधारी की मदद करने के लिए घंटे पर बंधी रस्सी लपक ली. रस्सी का लपकना था कि गिरधारी शिवानी पर बरस पड़ा-"किसने कहा तुमसे यह करने को? जानती नहीं यह काम मेरा है, केवल मेरा." शिवानी को वह पीड़ा ता-उम्र याद रही.

वर्षों बाद जब शिवानी का दुबारा शांति निकेतन जाना हुआ तब गिरधारी पहले वाला गिरधारी नहीं रह गया था. गुरुदेव की पुत्री पूपे यानी नंदिनी, जो उसकी प्रेयसी थी पर जिसका विवाह मुंबई के प्रसिद्ध उद्योगपति घराने में अजित खटाऊ से कर दिया गया था, पहले पति की मृत्यु के बाद गिरधारी से दूसरा विवाह कर चुकी थी और दादा बना गिरधारी अपनी प्रौढावस्था में आसन्न मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था.

विगत स्मृतियों में डूबी शिवानी ने जब रुग्ण शैया पर पड़े गिरधारी और क्षीणकाय पूपे को देखा तो हक्की-बक्की रह गई. शिवानी की पीड़ा का पार नहीं था. “अब शायद ही तुझसे कभी मिलना हो.” गिरधारी ने भग्न स्वर में कहा था, “में अब अधिक दिन नहीं बचूंगा. गले में दर्द रहने लगा है.”

शिवानी ने सांत्वना डी- “कैसी बातें कर रहे हो? गले में दर्द तो तुम्हे पहले भी रह्ता था. हमेशा गुलुबन्द लपेटे रहते थे. खूब बचोगे, अभी तो दादा ही बने हो, अभी पुत्र-प्रपौत्र भी तो देखोगे.” पर, गिरधारी को अपना भवितव्य पता था – नहीं, यह वह टोंसिल का दर्द नहीं, हर वक्त गले में काँटा सा चुभने लगा है.”

और एक दिन सचमुच ही वह घातक काँटा मृत्यु-कंटक बन कर उपजा. कलकत्ता से भेजे गए उसके पुत्र के पात्र द्वारा शिवानी को सूचना मिली –“बाबा नहीं रहे. गले का केंसर हो गया था.”

बीती मैत्री ना स्मरण/
हैये रही गया/
(बीती मैत्री कि स्मृति हृदय में रह गई. लिखने वाला चुपचाप चला गया.

गिरधारी के अलावा शिवानी को अपनी कुछ सम्वयसिनियों की अकाल मृत्यु भी बुरी तरह विचलित करती रही. इनमे अरुंधती उर्फ नुकू, सुशीला और माताहारी से सम्बंधित उनकी संस्मृतियाँ तो सचमुच हृदयविदारक हैं.

यहाँ यह उल्लेख करना भी जरूरी है कि शिवानी ने अपनी संस्मृतियों में सिर्फ “सेलिब्रिटीज” को ही नहीं समेटा बल्कि रामरती जैसी अपनी अपढ़ लेकिन सरल-ह्रदय सेविका को भी बराबर का सम्मान और स्थान दिया और उसके दिवंगत होने पर उसकी पूरी कथा ही लिख डाली जो उनकी “एक थी रामरती” कृति में शामिल है.

शिवानी ने साहित्य, संगीत और कला जगत की कुछ ऐसी शिखरस्थ शख्सियतों के बारे में अपने संस्मरण लिखे हैं जो आज भी हमारे प्रेरणास्रोत हैं और जिनके बारे में अधिक से अधिक जानने की हमारी लालसा न कभी खत्म हुई है और न ही होगी. इन शख्सियतों में सत्यजित रे, गंगा बाबू,, बेगम अख्तर, सिद्धेश्वरी देवी, भीम सेन जोशी, अमृत लाल नागर, मैत्रेयि देवी, बनारसी दास चतुर्वेदी, शरद जोशी सभी शामिल हैं.

माणिक दा यानी सत्यजित रे शिवानी के बड़े भाई के मित्र थे और शांतिनिकेतन आश्रम के सहपाठी भी. आश्रम में घटी एक घटना की याद करते हुए शिवानी “झरोखा” पुस्तक में लिखती हैं –“देखने में चुपचाप सत्यजित अक्सर जुटने पर हम छात्राओं को अपनी पेनी कलम के प्रहार से आहत करने से नहीं चूकता. एक नाटक में मुस्लिमवेशी नायक बनने पर मैंने अपना अभिनय और प्रभावशाली बनाने के लिया अजवाइन-भरी सिगरेट फूंक आश्रम के स्टेज पर नकली सिगरेटी धूम्र-रेखा उड़ाने का दुस्साहस किया. तालियाँ तो खूब मिली किन्तु दूसरे ही दिन आश्रम की हस्तलिखित पत्रिका में मेरे अभिनय की तीव्र आलोचना हुई- उस मुस्लिम छोकरे ने आश्रम के रंगमंच पर लड़की होने पर भी सिगरेट पीने की धृष्ठता की कैसे?

...और इतने वर्षों बाद मैंने जब स्वयं उस प्रख्यात अपराधी से अपराध उगलवाया तो माणिक दा बड़ी जोर से हँसे –“तो तम्हे पा चल गया था कि मैंने ही लिखा था.”

शिवानी का एक लघु उपन्यास है “कैंजा” जिससे सम्बंधित एक मार्मिक संस्मरण है उनका. एक बार उनके पास मुंबई से एक हितेषी मित्र का पत्र आया कि उनके उपन्यास “कैंजा” को लेकर किसी ने “कर्म” पिक्चर बना ली है. उन्होंने शिवानी को लिखा था-“तुम क्या सोती रहती हो? अविलम्ब कानूनी कदम उठाकर चित्र का प्रदर्शन रुकवादो.”

शिवानी ने इसकी चर्चा माणिक दा से की – दुःख यह होता है कि तस्करी, उस मित्र की सूचनानुसार किसी बांग्ला लेखक ने की है –बंगाल से मुझे यह उम्मीद नहीं थी.

माणिक दा का जवाब था-“अब बंगाल भी बदल गया है. तुम कुछ कर नहीं पाओगी-फिल्म जगत में तस्करी भी पेशेवर अंदाज से की जाती है.
(कैंजा के साथ हुई इस दुर्घटना के सन्दर्भ में मुझे लेखक-कथाकार ओंकार शरद के एक उपन्यास के कोपीराईट भंग की घटना याद आ रही है जिसका उल्लेख उन्होंने अपनी कृति “व्यक्तिगत” में किया है. हुआ यह है उनके एक उपन्यास “आँचल का आसरा” की पाण्डुलिपि के प्रकाशक ने स्वयं न छाप कर दूसरे प्रकाशक को कुछ रूपये दी कर, छापने के लिए दी दी और न तो लेखक की अनुमति ली और न ही कोई पारिश्रमिक दिया. लेखकों के साथ ऐसी दुर्घटना अक्सर होती रहती है. जहां तक कोपिराइट का प्रश्न है तो एक प्रख्यात लेखक ने तो यहाँ तक कह दिया था कि पाठकों के पास पहुँचने के बाद पुस्तक लेखक की नहीं रह जाती, वह पाठकों की हो जाती है.
-----बहरहाल बात शिवानी की चल रही थी.

शिवानी का कैशोर्य रामपुर और ओरछा (टीकमगढ़) रियासतों में बीता जहाँ सारी-सारी रात संगीत की महफ़िलें जमा करती थीं. ओरछा से जुडी शिवानी की एक संस्मृति देखिये –“मुझे याद है जब ओरछा युवराज राजा बहादुर की सगाई के ज़लसे में गाने के लिए पधारी सिद्धेश्वरी मेघ राग गा रही थीं और समां बंध ही रहा था कि कुछ पेशेदार आपस में फुसफुसाने लगे. उन्होंने चट गाना रोक दिया. चेहरा तमतमा उठा और उठने को तत्पर हो कर गरजीं. “अन्नदाता, पहले सुनने वाले तैयार कर लीजिए, तब सुनाने वालों को बुलाइए.” आखिर स्वयं महाराज वीरसिंह जू देव ने बड़े मान मनुहार से उन्हें मनाकर रोका और एक ही गरज में सचमुच सुनने वाले सुनना सीख गए.”

पंडित भीमसेन जोशी और उनकी पत्नी वत्सला जी के साथ विताये क्षणों की स्मृतियाँ तो, लगता है, शिवानी की अमूल्य निधि रही हैं. शिवानी खाने के बाद ज़र्दे का सेवन किया करती थीं. एक बार पंडितजी ने शिवानी को अपने ज़र्दे का कमाल दिखाया और बोले-“लीजिए यह चख कर देखिए!”

शिवानी ने जैसे ही चुटकी मुंह में भरी तो तम्बाकू का स्वाद पूरे देसी तमंचे के बारूद जैसा लगा. थूकें तो थूंके कहाँ? कंठ में ही नीलकंठ बन कर घुटक लिया और ब्रह्माण्ड की परिक्रमा कर ली. सोचा, इस एटमिक चुटकी के बाद पंडित जी गा कैसे पाते हैं?

“क्यों कैसे लगा?” पंडित जी ने पूछा.

शिवानी के मुंह से बस इतना ही निकला-“जो खायेगा, सोई परम पद पायेगा.”

नागरजी से शिवानी का सम्बन्ध बहुत ही आत्मीय और भावुकतापूर्ण रहा. शिवानी के पति जब दिवंगत हुए तो नागर जी ने उन्हें ढांढस बंधाया – “देखो गौरा बेन, मनुष्य दो तरह से जीता है, एक घुल कर, एक तप कर. हम नहीं चाहते तुम घुल कर जियो, तुम्हे तप कर जीना है, खूब लिखो और उसी स्याही में अपना दुःख मिलादो. यह भी एक विडंबना ही है कि जब स्वयं नागरजी की पत्नी का देहांत हुआ तो वे विह्वलता में शिवानी से बोल उठे-“बेन, ह वे हूँ नही लिख शकूं.”

शोक की उस कठिन घड़ी में शिवानी को ही उन्हें याद दिलाना पड़ा, आप? “आप यह क्या कह रहे हैं. भूल गए, आपने मुझसे क्या कहा था?

शिवानी “गौरा” से शिवानी कैसे हुई इसका खुलासा दुर्गा प्रसाद नौटियाल (खेद है कि ...नौटियालजी जो मेरे घनिष्ठ मित्र थे, भी अब दिवंगत हो चुके हैं) को दिए गए एक साक्षात्कार में मिलता है-“ मेरा नाम वैसे गौरा है. मैंने धर्मयुग में १९५१ में एक छोटी कहानी –“में मुर्गा हूँ” लिखी थी. उसमे शिवानी नाम दिया था. बांगला में “गौरा” नहीं होता गुरुदेव भी मुझे “गोरा” कहकर पुकारते थे. वहाँ सभीई मुझे टोकते थे कि “गोरा” नाम तो लड़कों का होता है. बांगला की एक पत्रिका थी “सोनार बांगला”. उसमे भी मैंने “मरीचिका” नामक एक कहानी लिखी थी. लेकिन नाम उसमे गौरा ही छपा था. गौरा नाम छोड़कर साहित्यिक नाम शिवानी रखने के पीछे और कोई विशेष कारण नहीं है.

इसी साक्षात्कार में शिवानी ने अपने लेखन के बारे में और भी कई ऐसी बातें कहीं जो अब किसी दस्तावेज से कम नहीं. उदाहरणतः –“मैंने अपने अधिसंख्य चरित्र वास्तविक जीवन से लिए हैं और सुने-सुनाये चरित्रों पर कभी कलम नहीं चलाई...”भैरवी में मैंने अघोरी साधू का सच्चा वर्णन किया है. मेरी पहली रचना तब छपी जब मैं बारह वर्ष की थी...आलोचकों को मैं कभी महत्त्व नहीं देती..उन्होंने मेरे साथ न्याय नहीं किया...मैं शब्दकोष खोलकर नहीं लिखती. जो भाषा बोलती हूँ, वैसे ही लिखती हूँ. उसे बदल नहीं सकती...कृष्णकली मेरी सबसे अधिक चर्चित कृति रही है...फिर भी यदि आप मेरी प्रिय रचना कहकर मुझसे जानना चाहते हैं तो मैं यात्रा-वृत्तान्त “चरैवैती” का नाम लूंगी. इसमें भारत से मोस्को तक की यात्रा का विवरण है. मेरी प्रिय रचना यही है...मैं नहीं मानती कि कोई किसी घटना से प्रभावित हो कर लेखक बन सकता है. उदाहरण के लिए किसी प्रियजन की मृत्यु से दुखी हो कर कोई सन्यासी तो बन सकता है, किन्तु लेखक नहीं बन सकता.

शिवानी आज हमारे बीच नहीं हैं और उनका स्मरण मैं उन्ही के संस्मरणों से कर रहा हूँ. इसमें कुछ बुरा भी नहीं, शिवानी की संस्मृतिया निस्संदेह उनकी अपनी हैं और उनमे मेरा कहने को कुछ नहीं. पर उन्हें पढकर जो आनंद मुझे मिला है उसे तो कम से कम मैं अपने सहृदय पाठकों तक पहुंचा ही सकता हूँ. और जहाँ तक इन संस्मरणों की सराहना का प्रश्न है तो शिवानी के एक संस्मरण को पढकर तो हिंदी के परम विद्वान गंगा बाबू भी अभिभूत हो गए थे और उन्होंने शिवानी को लिखा था-“संस्मरण ऐसा हो कि जिसे कभी देखा भी न हो, उसकी साक्षात् छवि ही सामने आ जाये, उसका क्रोध, उसकी परिहास रसिकता, उसकी दयालुता, उसकी गरिमा, उसकी दुर्बलता सब कुछ सशक्त लेखनी आंकती चली जाए, वही उसकी सच्ची तस्वीर है. वही सफल संस्मरण है.

ज़ाहिर है कि शिवानी ने अपनी संस्मृतियों में इन सभी बातों का भरसक निबाह किया.

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