Sunday, June 30, 2013

One of my ghazals in Ms.Preeta Vyas' voice on You Tube

You may please listen it on this link :

http://www.youtube.com/watch?v=h-UtVD5nyoo

My brief profile:




RAMESH TAILANG 



01
Full Name (in Roman Capitals)
Mr/Mrs./Dr.
Surname
Forename

Mr.
TAILANG
RAMESH KUMAR
1.1
Pen name, if any
RAMESH TAILANG
02
Date of Birth
(DD/MM/YY)
2nd June, 1946
02/06/1946
2.1
Place of Birth
District
State

TIKAMGARH
MADHYA PRADESH
03
Classification/Genre of Writing
Children’s Literature
3.1
Are you an author/editor/ illustrator/compiler/translator
(If yes, please give details, you may enclose an additional sheet, if required.)
Author & Translator
(For details pl.see Annex-1)
04
Education
(Degree/Diploma/Ph.D/etc.
a)       Post Graduate in Hindi Literature –First Divn from Jiwaji University-Gwalior
b)       Post Graduate in Sociology -2nd Divn. From Jiwaji University-Gwalior
c)        P.G.diploma in Industrial Relations & Personnel Management . –First Divn. From Bhartiya Vidya Bhavan –Govt.Recog.
05
Present Position/Occupation
Freelance Author/Journalist/Translator/Telescript writer.
06
Career (Professional and Literary)
Position held, if any, with dates :
a)       Worked d with H.T.MEDIA LTD. (formerly Hindustan Times Ltd.) New delhi since March 1973 to June 30, 2001. Opted for VRS in July, 2001 as MEDIA EXECUTIVE.
b)       Honorary Editor for  three issues of MUKTA VANI ( 64 pages illustrated monthly)  the period  1995-96 (RNI No. F-2(M-16)Press /95
07
Mother-tongue
HINDI

08
Language (s)
In whih you normally write

HINDI & ENGLISH
09
Literary Distinction
Such as Awards, Prizes, Titles ect. Received
Pl. see Annex -2
10
Foreign Countries Visited
Either in personal capacity or as member of any Delegation
None
11
Particulars of Publications
(If necessary please use a separate
Sheet of paper to give complete list of publication………..to be given chronologically.
Please see Annex.-3




13
Full Postal Address
Flat No. 506 Gaur Ganga-1, (Fifth floor), Vaishali, Ghaziabad-201012
14
Telephone No. with STD  Code
Office
Residence
Mob.
0120
X
4231040
9211688748
15
a)       Email i.d.
b)       Individual URL/blog
b.1 rameshtailang.blogspot.com
b.2 nanikichiththian.blogspot.com
b.3 balsahityasansar.blogspot.com
b.4 rameshtailangwriteups.blogspot.com


ANEXURE – 1

A)       AUTHOR OF  9 TITLES OF CHILDREN’S POETRY
B)       TRANSLATED/ADAPTED   JOINTLY WITH MR DEVENDRA KUMAR AS A TEAM - TENS OF WORLD’S CLASSIC  IMMORTAL FAIRY/FOLK TALES  A SERIES OF SUCH TRANSLATED/ADAPTED TALES IS CONTINUOUS BEING PUBLISHED EVERY MONTH IN LEADING CHILDREN’S HINDI MONTHLY MAGAZINE- “BAL BHARTI”  FOR THE LAST AROUND TWO YEARS
BESIDES INDIVIDUAL ADAPTATION OF JAMES METHEW BERRY’S FAMOUS CLASSIC BOOK “PETER PAN” IN HINDI.

  

ANNEXURE – 2 
Literary Distinction
Such as Awards, Prizes, Titles ect. Received


1.        DELHI HINDI ACADEMY CHILDREN LITERATURE AWARD FOR CHILDREN POETRY –EK CHAPATI AUR ANY BAAL KAVITAAYEN (MANUSCRIPT) FOR THE  -YEAR 1991-92

2.        DELHI HINDI ACADEMY CHILDREN LITERATURE AWARD FOR CHILDREN POETRY (MANUSCRIPT) FOR THE – -YEAR 1995-96

3.       GOOVERNMENT OF INDIA- PUBLICTIONS DIVISION ( MINISTRY FOR INFORMATION & BROADCASTING-NEW DELHI)
        BHARTENDU HARISHC HANDRA PURASKAAR (FIRST PRIZE) FOR THE YEAR 2001 IN CHILDREN’S LITERATURE CATEGORY FOR CHILDREN POETRY MANUSCRIPT ENTITLED –“ HARI BHARI DHARTI”

4.     KENDRIYA SAHITYA AKADEMI BAAL SAHITYA PURASKAAR -2013 ON "MERI PRIYA BAAL GEET"




ANNEXURE – 3

Particulars of Publications


YEAR
TITLE
GENRE
PUBLISHER

1989
HINDI KE NAYE BAALGEET
CH. POETRY
DHARA PRAKASHAN & MANAK PRAKASHAN   DELHI-92

1994
UDAN KHATOLE AA
- DO -
MAGADH PRAKASHAN, DELHI-32

1998
EK CHAPATI AUR ANYA BAAL KAVITAAYEN
- DO -
VAIBHAVSHALI, DELHI-32

1998
KANER KE PHOOL
- DO -
VAIBHAVSHALI, DELHI-32

2005
TINNI JI O TINNI JI
- DO -
SARLA PUBLISHERS, DELHI-32

2008
EKYAVAN BAAL GEET
-DO-
AATMARAM & SONS, DELHI-6

2008
LADDOO MOTICHOOR KE
(101 Natkhat baal geet)
-DO-
GLORIOUS PUBLISHERS, DELHI

2010
MERE PRIYA BAAL GEET
(163 CHILDREN SONGS)
- DO -
KRITIKA BOOKS, DELHI-51

2013
KATH KA GHODA TIMMAK TOON
-DO-
AATMARAM & SONS –DELHI-6


ADAPTATION/TRANSLATION
(FIRST TWO TITLES WITH MR DEVENDRA KUMAR & THIRD TITLE IS AN INDIVIDUAL ATTEMPT)



2009
AMAR VISHWA KISHORE KATHAYEN
ADAPTED CLASSIC STORIES IN HINDI
ARS PUBLISHERS AND DISTRIBUTORS, DELHI-6




2009

 VISHWA PRASIDDH KISHORE KATHAYEN
ADAPTED CLASSIC STORIES IN HINDI
ARS PUBLISHERS AND DISTRIBUTORS, DELHI-6





2013
PETER PAN
ADAPTED FROM ENGLISH TO HINDI
PUBLICATIONS DIVISION, GOVT. OF INDIA, NEW DELHI.







Tuesday, June 25, 2013

देवेन्द्र कुमार देवेश द्वारा सम्पादित पुस्तक “रवीन्द्रनाथ ठाकुर का बालसाहित्य”




रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बालसाहित्य पर बहुआयामी विमर्श

रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बालसाहित्य पर आलोचकीय दृष्टि से जितना काम बांगला  भाषा में हुआ है उसका शतांश भी हिंदी में नहीं हुआ है. इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो देवेन्द्र कुमार देवेश द्वारा सम्पादित समीक्ष्य पुस्तक रवीन्द्रनाथ ठाकुर का बालसाहित्य इस जड़ता को तोडने वाली एक महत्वपूर्ण कृति है.रवीन्द्रनाथ ने अपने जीवन काल में विपुल साहित्य का सृजन किया और उनकी ख्याति देश-rदेशांतर की सीमाओं का अतिक्रमण करती  हुई  पूरे विश्व में फैली, यह किसी से छुपा हुआ तथ्य नहीं है पर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने  बालसाहित्य सृजन के क्षेत्र में भी एक ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया जिस तक शायद ही कोई और अन्य  लेखक/कवि पहुँच सका हो. उन्होंने बालसाहित्य की लगभग  सभी विधाओं में लिखा और ऐसे समय में जब बालसाहित्य अपने अनगढ़ स्वरुप में स्कूली पाठ्यपुस्तकों तक ही सीमित था, ऐसी स्तरीय रचनाएं दीं जो आज भी शिशु/बाल/किशोर वय के पाठकों के बीच लोकप्रिय एवं पठनीय बनी हुई हैं.
      देवेश की इस पुस्तक में, विभिन्न विद्वानों द्वारा रवीन्द्रनाथ के बाल साहित्य के विविध पक्षों को उद्घाटित करने वाले, बीस लेख शामिल है जिनमें कुछ हिंदी में ही लिखे गए हैं, तो कुछ अंग्रेजी से और  कुछ बांगला से सीधे हिंदी में अनूदित किये गए  हैं. स्वतंत्र मिश्र के अनुवाद में कई जगह वाक्यविन्यास और लिंगभेद (पुल्लिंग/स्त्रीलिंग) की छोटी-बड़ी  खामियां हैं  जो सहजता से पढने में वाधा डालती हैं जबकि कल्लोल चक्रवर्ती द्वारा किया गया अनुवाद उनकी अपेक्षा ज्यादा स्तरीय है.
      जहाँ तक पुस्तक में शामिल लेखों का प्रश्न है, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का शिशु संबंधिनी रचना अपने आप में एक दस्तावेज है जो न केवल रवीन्द्रनाथ के शिशुकाव्य की रचनात्मक महत्ता को रेखांकित करता है बल्कि  उदाहरण  सहित बाल-मन की अनेक गुत्थियों को भी अनावृत्त करता है. लीला मजूमदार का बच्चों के लेखक के रूप में रवीन्द्रनाथ gagaygaya भी अंतर्दृष्टि के साथ लिखा  गया लेख है. लीला जी रवि बाबू के बालसाहित्य की गहन अध्येता रही हैं और उनके तथा क्षितिज राय के संयुक्त संपादन में  रवींद्रनाथ का बाल साहित्य भी दो खंडो में प्रकाशित हो चुका है. उनका लेख रवि बाबू की बाल साहित्य सृजन प्रतिभा तथा बाल साहित्य से जुड़े अनेक मुद्दों पर विस्तृत प्रकाश डालता है. सुकांत चौधरी अपने लेख babaabaaरवीन्द्रनाथ का lबाल साहित्य”  में एक अति महत्वपूर्ण बात कहते हैं  - रवीन्द्रनाथ अपने समय की शिक्षा व्यवस्था से बहुत नाखुश थे अपने स्कूल में उन्होंने यह निश्चित करने की कौशिश की कि सीखना और पढना सुकून और आनंद पहुंचा सके....उन्होंने बहुत सारी स्कूली  किताबें खुद ही तैयार की थी.
      डॉ. हरिकृष्ण देवसरे का मानना है कि रवीन्द्रनाथ के  बालसाहित्य में बालमन की उन्मुक्तता और स्वच्छंदता के दर्शन होते हैं. प्रकाश मनु लिखते हैं कि उनकी बाल कवितायें ऐसी हैं जिनमें बालमन कि इतनी सरल जिज्ञासा और इतना कौतूहल प्रकट हुआ कि इनको पढ़ते हुए हम पुनः बच्चे बन जाते हैं.अरुणा भट्टाचार्य का मानना है –टैगोर ऐसे पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने बच्चों की मानसिकता को अनिवार्य कारक के taurतौर पर  गंभीरतापूर्वक लिया. सुरेन्द्र विक्रम इस बात को रेखांकित करते हैं कि उन्होंने (रवीन्द्रनाथ) जितना बच्चों के लिए लिखा उतना ही बच्चों के विषय में भी लिखा. 
इन लेखों के अलावा रवीन्द्रनाथ  के बाल नाटकों, उनके बाल साहित्य में बच्चे, बाल चरित्र  उनकी  चिट्ठियों, जीवन स्मृति पर भी अनेक विद्वानों ( खगेन्द्रनाथ मित्र, रेखाराय चौधरी, इतिमा दत्त, तनूजा मजूमदार, समीरण चटर्जी, एस कृष्णमूर्ति, कानाई सामंत, ए.वी.सूर्यनारायण एवं के.चंद्रशेखरन) ने विमर्श प्रस्तुत किया है.
ओम प्रकाश कश्यप ने रविबाबू की पुस्तक छेल बेला को केंद्र में रख कर उनके बचपन के अनेक आयाम उद्घाटित किया हैं. वे लिखते हैं रवीन्द्रनाथ की प्रतिभा बहुआयामी है. लेकिन जब हम उनके जीवन का अध्ययन करते हैं तो यह साफ़ नज़र आने लगता की इसमें उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि से अधिक योगदान उनके परिवेश का था जिसमें समाज के तरह-तरह के लोगों की बहुतायत है.
पुस्तक का एक महत्वपूर्ण लेख है अमर गोस्वामी का जिसमें उन्होंने रवि बाबू के बाल/किशोर कथा साहित्य का आकलन किया है. गोस्वामी जी लिखते हैं –रवीन्द्रनाथ के बाल और किशोर-कथासाहित्य को तीन प्रकार से विभाजित किया जा सकता है – पहले प्रकार में ‘गल्पगुच्छ में संग्रहीत वे कहानियां हैं, जो यद्यपि बच्चों के लिए नहीं लिखी गेन, पर कथा नायक के किशोरे होने या बाल-किशोरे मनोविज्ञान पर आधारित होने के कारण उन्हें किशोरे कथाओं के संग्रह में संग्रहकर्ता शामिल करते रहे हैं. इसी तरह से ‘गल्पशल्प जिसका अनुवाद मैंने (अमर गोस्वामी ने) दद्दू की कहानियां नाम से किया है ....इन सारी कहानियों vavah में बतकही का जो मजा है, वह बांगला साहित्य में अन्य कथाकारों की कहानियों में दुर्लभ है
रवीन्द्रनाथ की दूसरे प्रकार की कहानियां वे हैं जिन्हें उन्होंने छोटे बच्चों की पाठ्यपुस्तकें तैयार करते हुए लिखी हैं....तीसरे प्रकार की कहानियों में ऐसी कहानियाँ मुख्य है, जो रूपकथा की शैली में लिखी गई हैं.
पुस्तक का अंतिम आलेख स्वयं संपादक देवेश का है जिसमें उन्होंने इस बात को गंभीरता से रेखांकित किया है कि रवीन्द्रनाथ की सार्वदेशिक लोकप्रियता का एक कारण यह भी है की वे अपने पाठकों को उसके बचपन और किशोरी में ही अपना बना लेते हैं, जिस अवस्था का  नेह-नाता पहले प्रेम की तरह आजीवन बना रहता है.
सारांश में यह पुनः कहा जा सकता है रवीन्द्रनाथ के बालसाहित्य प्रेमियों के लिए आलोचनात्मक दृष्टि से यह एक महत्वपूर्ण पुस्तक है जिसका स्वागत होना चाहिए.#
-          रमेश तैलंग
-          समीक्ष्य पुस्तक : रवीन्द्रनाथ ठाकुर का बालसाहित्य
-          संपादक –देवेन्द्र कुमार देवेश
-          प्रकाशक – विजय बुक्स
-          १/१०७५३ सुभाष पार्क, गली न. ३
-          नवीन शाहदरा, दिल्ली- ११००३२
-          प्रथम संस्करण – २०१३, मूल्य – ३५०/- रुपये 


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संपर्क:
५०६ गौर गंगा-१, सेक्टर-१, वैशाली,गाज़ियाबाद -२०१०१२


  

Friday, June 21, 2013

पंडित श्रीधर पाठक की एक अलभ्य कविता




हिंदी भाषा के वन्दनीय कीर्ति-स्तंभों में से एक पंडित श्रीधर पाठक की कबित्त छंद में एक अनोखी कविता मिली है. यह कविता राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान जोधपुर के पूर्व निर्देशक और पंडित श्रीधर पाठक के पुत्र श्री पद्मधर पाठक द्वारा तीन खण्डों में सम्पादित पुस्तक "श्रीधर पाठक ग्रंथावली" में संग्रहीत है और यह श्री बालकृषण भट्ट के सम्पादन में निकल रही पत्रिका - हिंदी प्रदीप में प्रकाशित हुई थी..

अंग्रेजी वर्णमाला से शुरू होती इसकी सारी   पंक्तियाँ अंत में आकर एक मुकम्मल कविता बन जाती है जो गुलामी में जकड़े भारतीय युवावर्ग को अपनी ताकत पहचानने और गुलामी के विरुद्ध युद्ध करने का आह्वान करती है... नै पीढ़ी के लिए यह कविता सामान्यतः अलभ्य ही है . यहाँ आप  अपने स्वभावानुसार इस कविता की मीन-मेख निकालने की बजाय  इसका आत्मिक आनंद लीजिये:


A रे
B र
C रे ना परहु, रन-खे त माहिं
D ल तो निहारो निज, दिग्गज लखात है
E स कोण मनाई
F G हति  विचारी देस, तुरत विदारी,
H मू कितेक बात है
I,J मलेच्छ सेन,
K ती हैं विचारी भला, लरिये
L राई  भाई प्रजा अकुलात है
M द-साने सूर, नाम पे न डारौ धूर
N युद्ध औसर पी ढील न सुहात है
O खाऊ है समैया, नाहीं,
P र को सुनैया कोंऊ धीरज-धरेया, भैया एक ना दिखात हैं.
सर,
Q लार देस में फ़िरायौ कलि-राज आज
R त अवस्था झूठ भारत की बात है
S ढील आलस काउ
T को लगायौ सर
U थन के यूथ, आर्य
V ज के नसात हैं
W न पास एक टेक्स
X इज अनेक, पोतहू स
Y देत-देत
Z रात हैं.

श्री प्रयाग : जनवरी, १८८५
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हिंदी पाठ

एरे वीरे सीरे ना परहु रन-खेत माहिं
डील तो निहारो निज दिग्गज लखात है.
ईस कौं मनाईए, फजीहति बिचारी देस
तुरत विदारिए चमू कितेक बात है.

आई जे मलेच्छ सेन केती हैं विचारी भला
 लरिये लराई भाई प्रजा अकुलात है
ऐ मद-साने सूर, नाम पे  न डारो धूर
एन युद्ध-औसर पै ढील न सुहात है

ओखौ है समैया नाहिं पीर की सुनैया कोंऊ
धीरज-धरेया भैया एक न दिखात है
सरक्युलर देस में फिरायो कलि राज आज
आरत अवस्था झूठ, भारत की बात है

ऐसे ढील आलस कौ टीकौ लगायो सर
यूथान के यूथ आर्य-वीजके नसात है
डबलउ न पास एक टेक्स एक्सइज अनेक
पोतहू सवाई  देत-देत जे डरात है.