Wednesday, May 3, 2023

मधुमती 2013 बालसाहित्य विशेषांक से आभार :

हिन्दी बालसाहित्य के पुरोधा

रमेश तैलंग


’पुरोधा‘ शब्द को यदि आप सीमित अर्थ (पुरोहित) में न लें तो इस श्रेणी में मैं उन्नीसवीं शताब्दी के मध्यकाल से लेकर स्वतंत्रताप्राप्तिकाल तक के उन सभी मूर्धन्य हिंदी रचनाकारों को शामिल करना चाहूंगा जिन्होंने आधुनिक हिंदी बालसाहित्य की सही मायने में नींव रखी और उसे पुख्ता करने में अपना अप्रतिम योगदान दिया, ऐसे सिरमौर रचनाकारों में एक और तो वे हैं जिन्होंने बालसाहित्य सृजन के बल पर ही अपनी महती पहचान बनाई और दूसरी और वे हैं जिन्होंने वयस्क साहित्य के साथ-सथ बालसाहित्य का भी पर्याप्त मात्रा में सृजन किया।
इनमें बहुत से ऐसे शीर्ष रचनाकार आज हमारे बीच नहीं हैं पर जो वर्तमान में हैं वे न केवल अपनी रचनाओं से बालसाहित्य की निरंतर श्रीवृद्धि कर रहे हैं, बल्कि प्रकाश स्तंभ की तरह नए बालसाहित्यकारों का मार्ग भी आलोकित कर रहे हैं।
विगत काल पर दृष्टि डालें तो ज्ञात होगा कि लोक की वाचिक परंपरा को आत्मसात् करती हुई हिंदी बालसाहित्य की आरंभिक धारा को बाल कविता के जरिये ही अपेक्षित विस्तार मिला जिसकी स्पष्ट झलक उन्नीसवीं शताब्दी के उतरार्द्ध और बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध काल से ही देखने को मिल जाती है।
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति काल तक जन्मे जिन पुरोधा रचनाकारों ने हिंदी बाल साहित्य को पुष्पित-पल्लवित होने के लिए शुरू से ही एक सुदृढ आधार प्रदान किया, उनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण नाम अलग-अलग कालखंडानुसार इस प्रकार हैं-
प्रारंभिक दो दशक (१८६०-१८८०)
दो दशक के इस कालखंड में पं. श्रीधर पाठक (१८६०-१९२८ जोंधरी, आगरा ः प्रमुख कृतियां ः ’बाल-भूगोल‘, ’भारतगीत‘, ’मनोविनोद‘), पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी (१८६४-१९३८, दौलतपुर-रायबरेली ः प्रमुख कृतियां ः ’बालविनोद‘), बाल मकुन्द गुप्त, (१८६७-१९०७ ः प्रमुख कृतियां ः ’खेल तमाशा‘, ’खिलौना‘), अयोध्यासिंह उपाध्याय ’हरिऔध‘ (१८६७-१९४७, निजामाबाद, आजमगढ ः प्रमुख कृतियां ः ’बाल-विभव‘, ’बाल-विलास‘, ’फूल पत्ते‘, ’चन्द्र खिलौना‘, ’खेल तमाशा‘, ’उपदेश-कुसुम‘, ’बाल-गीतावली‘, ’चांद-सितारे‘, ’पद्य-प्रसून‘), कामता प्रसाद गुरु (१८७५-१९४७, परकोटा, सागर ः प्रमुख कृतियां ः ’सुदर्शन‘, ’पद्म पुष्पावली‘), दामोदार सहाय ’कविकिंकर‘ (१८७५-१९३२, शीतलपुर, छपरा - बिहार ः प्रमुख कृतियां ः ’रसाल‘, ’अंगूर‘, ’सुधा सरोवर‘, ’सरल सितारी‘, ’बाल सितारी‘), पं सुदर्शनाचार्य (१८७९), के नाम उल्लेखनीय हैं।
इस कालखण्ड में, जिसे आधुनिक हिंदी बाल साहित्य का उत्सकाल भी कहा जाता है. पं. श्रीधर पाठक,, बाल मुकुन्द गुप्त, अयोध्यासिंह उपाध्याय ’हरिऔध‘ की एक ऐसी कवि-त्रयी नजर आती है जिसने शुरू से ही एक-से-एक बेहतर बाल कविताएं रचकर आगामी रचनाकारों के सामने एक बहुत बडी लकीर खींच दी, यही नहीं, इन तीनों कवियों के बीच हिंदी का पहला बालकवि सिद्ध करने की एक तथाकथित होड भी आलोचकों के बीच लग गई- सब जानते हैं कि पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन में प्रकाशित होने वाली तत्कालीन पत्रिका ’सरस्वती‘ बाल-पत्रिका नहीं थी पर द्विवेदी जी ने उस पत्रिका में सन् १९०६ में मैथिली शरण गुप्त की एक बालोपयोगी कविता ’ओला‘ को प्रकाशित कर एक नई परंपरा का सूत्रपात किया। प्रकाशन की दृष्टि से देखा जाए तो बालमुकुन्द गुप्त रचित ’खिलौना‘ पुस्तक की बाल कविताएं, खास तौर पर ’गिलहरी का ब्याह‘, पं. श्रीधर पाठक की बालकविताओं से पहले प्रकाशित हो चुकी थी और उनकी समालोचना भी हो चुकी थी, इस बिना पर गुप्त जी को हिंदी का पहला बालकवि ठहराने का औचित्य गलत नहीं लगता पर दूसरी ओर अयोध्या सिंह उपाध्याय ’हरिऔध‘ के एक साक्षात्कार से पता चलता है कि उन्होंने बाल कविताएं काफी पहले से लिखना शुरू कर दिया था और इसलिए वे भी स्वयं को हिंदी का पहला बाल कवि घोषित करने से नहीं हिचके (सन्दर्भ देखें - कृष्ण शलभ संपादित ’बचपन एक समंदर‘ की भूमिका)। डॉ. श्रीप्रसाद हरिऔध जी के इस पक्ष का समर्थन करते हुए ’आजकल‘ पत्रिका के नवम्बर- २००८ अंक में प्रकाशित अपने लेख ’हिंदी की बाल कविताएं‘ में लिखते हैं - ’’प्रथम बाल कवि के रूप में श्रीधर पाठक की चर्चा की जाती है, पर अनुसंधान से अयोध्या सिंह उपाध्याय प्रथम बाल कवि के रूप में सिद्ध होते हैं।‘‘ जबकि डॉ. प्रकाश मनु का अभिमत है कि ’मैथिलीशरण गुप्त, हरिऔध, रामनरेश त्रिपाठी, सुभद्राकुमारी चौहान सबने एक से एक सुन्दर बाल कविताएं लिखीं, पर श्रीधर पाठक की कविताएं इनमें सबसे अलग थीं, और हम बीसवीं सदी के प्रारम्भ की हिंदी बाल कविता की सबसे बडी विभूति के रूप में कृतज्ञतापूर्वक उनका स्मरण करते हैं।‘ (देखें ः ’हिंदी बाल कविता का इतिहास‘, पृष्ठ २१)
इस काल के कवियों की बाल कविताओं पर विचार करते हुए यह भी स्मरण रखना होगा कि यह वह समय था। जब एकल परिवारों का चलन नहीं था, संयुक्त परिवारों के बीच मानवीय रिश्तों का एक घना संजाल हुआ करता था और आस-पास की प्राकृतिक दुनिया से भी बडों तथा बच्चों का सघन रिश्ता जुडा हुआ था, इसलिए उस समय की बाल कविताओं में जीव जगत् तथा बाल जगत् की अनेक मनोरंजक एवं अनूठी छवियां मौजूद दिखाई देती हैं, उदाहरण के लिए श्रीधर पाठक की तोतली भाषा में यह सुविख्यात बाल कविता देखिये-
बाबा आज देल छे आए/चिज्जी-पिज्जी कुछ न लाए/बाबा क्यों नहीं चिज्जी लाए/इतनी देली छे क्यों आए/कां है मेला बला खिलौना/कलाकंद, लड्डू का दोना/चां-चां-गाने वाली चिलिया!चें-चें करने वाली गुलिया.../बाबा तुम और कां से आए/आं-आं-चिज्जी क्यों ने लाए ?
बाल स्वभाव से जुडी इस कविता के सन्दर्भ में डॉ. श्रीप्रसाद का कहना है कि ’श्रीधर पाठक ने बाल कविता में भाषिक प्रयोग के द्वारा एक नई दिशा की ओर संकेत किया है (सन्दर्भ ः आजकल, पूर्वोक्त लेख)
इसी कालखंड के एक और कवि कामताप्रसाद गुरु ने घर की मामूली चीजों को लेकर बहुत ही मनोरंजक बाल कवितायें रची हैं, छडी को लेकर रची गई उनकी कविता थोडी अद्भुत है ’’यह सुंदर छडी हमारी/है हमें बहुत ही प्यारी, हम घोडी इसे बनाएं/कम घेरे में दौडाएं...‘‘ कविता थोडी लम्बी है पर एक छडी कितने रूप ले सकती है इसका नाटकीय वर्णन इस कविता में भलीभांति मिलता है।
छपरा में जन्मे पं. दामोदर सहाय ’कविकिंकर‘ की बाल कविताओं के अनेक संग्रह हैं, जिनमें प्रमुख हैं- ’रसाल‘, ’अंगूर‘, ’सुध सरोवर‘ आदि, प्रकाश मनु के अनुसार - ’’ग्रियर्सन जैसे विद्वानों ने मुक्तकंठ उनकी कविताओं की तारीफ की है। दामोदर जी की बाल कविता मोरों की शिकायत पर है- ’मोर विचारे‘। जिसमें वे ब्रह्मा जी के पास जाकर विलाप करते हैं कि अन्य सभी पक्षियों की बोली मधुर है जबकि उनकी बोली पर लोग हँसते हैं, ब्रह्मा जी उन्हें समझाते हैं कि इस दुनिया में बिल्कुल अच्छा या बिल्कुल बुरा कोई नहीं है, सबमें कुछ गुण हैं तो कुछ दोष, एक तरह से देखा जाए तो इस कविता में कथात्मकता के जो सूत्र गूंथे हुए हैं वे इस कविता को और भी प्रभावी बना देते हैं।
मार्ग प्रशस्त किया बल्कि स्वयम् भी अनेक मनोरंजक कविताएं लिखीं। उनकी एक बाल कविता - ’हाऊ और बिलाऊ‘ अपनी कथात्मकता और नेक तथा बुरे चरित्र की पहचान के कारण बहुत प्रसिद्ध हुई।
उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दो दशक (१८८१-१९००)
आठवें दशक से जरा और आगे बढें तो उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दो दशकों में जन्मे बहुत से ऐसे पुरोधा बालसाहित्यकार हैं जिन्होंने हिंदी बाल साहित्य को एक से बढकर एक नायाब बालरचनाएं दी हैं और इसी कालखंड ने हमें प्रेमचंद जैसा महान् लेखक भी दिया जिन्होंने आगे चलकर हिंदी जगत् को पहला बाल उपन्यास ’कुत्ते की कहानी‘ और ’जंगल की कहानियां‘ सहित अनेक यादगार रचनाएं दीं।
इस दौर के उल्लेखनीय साहित्यकार हैं - मन्नन द्विवेदी ’गजपुरी‘ (१८८५-१९२१), प्रेमचंद (१८८५-१९३६ लमही-वारणसी, प्रमुख बाल कृतियां ः ’कुत्ते की कहानी‘, ’जंगल की कहानियां‘, ’वीर दुर्गादास‘, ’राणाप्रताप‘ आदि), मैथिलीशरण गुप्त (ज. १८८६-१९६४, चिरगांव, झांसी ः ’यशोधरा..‘, ’स्फुट बाल कवितायें‘), माखनलाल चतुर्वेदी (ज. १८८९-१९३८), राम नरेश त्रिपाठी (ज. १८९०-१९६२, प्रमुख कृतियां ’हंसू की हिम्मत‘, ’मोहन माला‘, ’मोहन भोग‘, ’वानर संगीत‘, ’कविता विनोद‘, ’मोतीचूर के लड्डू‘), गोपालशरण सिंह (ज. १८९१-), विद्या भूषण विभु (ज. १८९२-१९६५ प्रमुख कृतियांः ’चार साथी‘, ’बबुआ‘, ’पंख-शंख‘ सहित अनेक बाल पुस्तकें), देवीप्रसाद गुप्त ’कुसुमाकर‘ (ज. १८९३-), मुरारीलाल शर्मा ’बंधु‘ (ज. १८९३-१९६१, ’सेमल की टिकरी‘, मेरठ ः प्रमुख कृतियां ः ’बच्चे‘, ’होनहार बिरवे‘, ’गोदी भरे लाल‘, ’ज्ञान गंगा‘, ’कोकिला‘), भूपनारायण दीक्षित (ज. १८९५-१९८६, सहबसु-कानपुर ः प्रमुख कृतियां, ’खड-खड देव‘, ’गधे की कहानी‘, ’नटखट पांडे‘, ’नया आल्हा‘, ’नानी के घर टंटू‘, ’बाल-राज्य‘, ’साहसी कौवा‘, और जहूर बख्श (ज. १८९७-१९६४, भोपाल)
एक जमाने में मन्नन द्विवेदी ’गजपुरी‘ की यह प्रार्थना स्कूल के बच्चों में बहुत ही लोकप्रिय थी - विनती सुना लो हे भगवान/हम सब बालक हैं नादान‘, इसके अलावा गजपुरी जी की ’आम रसीले‘ और ’जामुन‘ सुपरिचित बाल कविताएं हैं।
कथा सम्राट् प्रेमचंद (ज. १८८५-नि. १९३६-लमही, वाराणसी) ने वयस्कों के अलावा बच्चों के लिए अनन्य रूप से कितना साहित्य रचा इस पर मैं साधिकार कोई टिप्पणी नहीं कर सकता, हालांकि उनकी बहुत-सी कहानियां जैसे ’ईदगाह‘, ’ठाकुर का कुआं‘, ’दो बैलों की कथा‘, ’नमक का दारोगा‘, ’पंच परमेश्वर‘, ’कफन‘, ’बडे भाई साहेब‘, आदि बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल की जा चुकी हैं पर ’कुत्ते की कहानी‘ जिसे हिंदी के अनेक विशिष्ट बाल साहित्यकार/आलोचक हिंदी का पहला बाल उपन्यास मानते हैं निस्संदेह बच्चों के लिए ही लिखी गई रचना है और इसे अलग से प्रमाणित करने की जरूरत नहीं, कृति के आमख के रूप में दिनांक १४ जुलाई, १९३६ का बच्चों के नाम लिखा गया लेखक का संबोधन-पत्र स्वतः इसे प्रमाणित करता है।
’कुत्ते की कहानी‘ के सन्दर्भ में मैं एक और बात यहां रेखांकित करना चाहूंगा कि प्रेमचंद बनारस के लमही गांव में पैदा हुए, ग्रामीण परिवेश में पले-बढे, खेती-बाडी, महाजनी सभ्यता, भुखमरी, गरीबी, आजादी की लडाई, भारतीय समाज की रूढ, सभी को उन्होंने अपनी नंगी आँखों से देखा और जहां भी, जिस तरह संभव हुआ, अपने समय की कुरीतियों का विरोध किया, जीव-जंतुओं के जगत् को उन्होंने किसी चिडयाघर में नहीं देखा, वह तो उनके ग्रामीण-परिवेश का ही अटूट हिस्सा थे ’दो बैलों की कहानी‘ में जिस तरह हीरा-मोती जैसे यादगार चरित्र उन्होंने रचे ठीक उसी तरह इस बाल उपन्यास का नायक कल्लू कुत्ता भी एक यादगार चरित्र के रूप में हमारे सामने आता है, सहृदयता और संवेदशीलता लेखक के सबसे बडे गुण होते हैं, ’मूकम करोति वाचालं‘ वाली उक्ति को चरितार्थ करते हुए प्रेमचंद इस बाल उपन्यास में कल्लू कुत्ते को मनुष्य की वाणी देते हैं और उसी की जुबानी एक मनोरंजक एवं प्रेरक कथा सुनाते हैं जिससे कतिपय उपकथाएं भी जुडी हुई हैं।
प्रेमचंद की दूसरी यादगार कृति है ’जंगल की कहानियां‘ जिसमें रोमांच, साहस और हास्य से भरी अनेक कथाएं हैं जो प्रेमचंद ने बच्चों को दृष्टि में रख कर लिखी हैं, यदि प्रेमचंद और कुछ वर्ष जिए होते तो उनका और भी बालसाहित्य आज हमारे सामने होता।
इसी दौर के एक विशिष्ट कवि विद्याभूषण विभु हैं जिनकी ’घूम हाथी‘ बालकविता एक अनोखी ध्वन्यात्मकता के कारण अपनी अलग पहचान बनाती है हालांकि इसमें सामंतशाही प्रतीकों के कुछ संकेत हैं (जैसे राजकुमार, फौजें आदि) पर किसी भी रचना को उसके देशकाल से जोडकर ही परखा जाना चाहिए, कवितांश इस प्रकार है-
घूम हाथी, झूम हाथी/ घूम हाथी, झूम हाथी/ राजा झूमें, रानी झूमें झूमें राजकुमार/ घोडे झूमें, फौजें झूमें, झूमें सब दरबार/ घूम हाथी, झूम हाथी/ घूम हाथी, झूम हाथी/ राजमहल में बांदी झूमें/ पनघ्kV ij ifugkjh@ पीलबांन पर अंकुश घूमे, सोने की अंबारी/ घूम हाथी, झूम हाथी/ घूम हाथी, झूम हाथी‘।
मैथिलीशरण गुप्त (१८८६-१९३४, चिरगांव, झांसी ः यशोधरा.. ’स्फुट बाल कविताएं‘) ने वयस्कों के लिए काफी साहित्य रचा और उनकी ’भारत-भारती‘ एक अनुपम कृति के रूप में समादृत हुई पर उनकी कुछ बाल कवितायें भी यहां उल्लेखनीय हैं जैसे -
’माँ कह एक कहानी/समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी।‘ ध्यातव्य है कि गुप्त जी की ’ओला‘ कविता को महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ’सरस्वती‘ में १९०६ में छापकर एक नई परंपरा का सूत्रपात किया था- ’एक सफेद बडा सा ओला/था मानो हीरे का गोला/हरी घास पर पडा हुआ था/ वहीं पास में खडा हुआ था...
राम नरेश त्रिपाठी इस कालखंड में जन्मे एक बडे कवि हैं, उनकी बाल कवितायें ’चंदा मामा, तिल्लीसिंह‘ व ’नंदू को जुकाम‘ बहुत ही सुप्रसिद्ध हैं-
चंदा मामा गए कचेहरी, घर में रहा न कोई/मामी निशा अकेली घर में कब तक रहती सोई... पहने धोती कुरता झिल्ली/गमछे से लटकाएं किल्ली/कसकर अपनी घोडी लिल्ली/तिल्लीसिंह जा पहुंचे दिल्ली।
इसी तरह ठाकुर गोपालशरण सिंह (१८९१) की वायुयान पर रची यह सुंदर कविता बच्चे की कल्पना का मोहक वर्णन करते हैं-
सुंदर, सजीला चटकीला वायुयान एक/भैया, हरे कागज का आज मैं बनाऊंगा/चढ के उसी पे सैर नभ की करूंगा खूब/-बादल के साथ-साथ उसको उडाऊंगा।
इस कालखंड के दो सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बालसाहित्यकार भूप नारायण दीक्षित और जहूर बख्श की ख्याति यद्यपि बाल उपन्यासकार और बालकथाकार के रूप में ही रही है पर यह देख कर आश्चर्य होता है कि उन्होंने भी कुछ बहुत ही सुन्दर बाल कवितायें रची हैं। भूप नारायण दीक्षित की रसगुल्ला पर लिखी यह बाल कविता भला किस बच्चे को प्रिय नहीं लगेगी-
तू धन्य-धन्य है रसगुल्ला/तुझमें रस है कोमलता है, नीरसता का है नाम नहीं/ तुझको खाने में रसगुल्ले, दांतों को कोई काम नहीं/ सब इसीलिये तुझ पर लट्टू, चाहे काजी हो या मुल्ला,
दीक्षित जी बाल मनोविज्ञान के पारखी रचनाकार थे, इसीलिये उनके बाल उपन्यास- ’खड-खड देव‘, ’बाल राज्य‘, ’नानी के घर टंटू‘, ’साहसी कौवा‘, हिंदी बाल कथासाहित्य की अमूल्य निधि हैं। बालसाहित्य के और प्रखर आलोचक, प्रकाश मनु का यह कहना सही है कि स्वातन्त्र्योत्तर काल के दीक्षित जी पहले हिंदी बाल उपन्यासकार हैं।
जहूर बख्श (ज. १८९७-१९६४ मछरवाही, गढाकोटा सागर) मूलतः कथाकार थे, उनकी लिखी बहुत सी बाल कहानियां आज भी मानक बाल कहानियों में गिनी जाती हैं। जिनमें प्रमुख हैं- ’तीन के तीन‘, ’आधी रोटी तीन करेला‘, ’सोने का पानी‘ (परी कथा) ’चुभती भूल‘ (आत्मकथात्मक कहानी) और उनकी चर्चित कथा पुस्तकें हैं- ’इतिहास की कहानियां‘, ’हवाई कहानियां‘, ’सोनपरी‘, ’हाय नागिन‘, ’घोडी की खेती‘, ’आदिवासियों की कहानियां‘, ’ईसप की कहानियां‘, ’मनोरंजक कहानियां‘, ’अनोखी कहानियां‘, ’मजेदार कहानियां‘, ’कथा माला‘ आदि, उनकी एक बेहद लोकप्रिय बाल कविता है- ’बढई‘- हमारे यह कहलाते, जंगल से लकडी मंगवाते... कुर्सी टेबल यही बनाते/ बाबू जिनसे काम चलाते..‘ एक और मनोरंजक बाल कविता है- ’’चल मेरे मटके टम्मक-टुं‘, जहूर बख्श यदि एक सांप्रदायिक दंगे की भेंट नहीं चढते तो उनका और भी बहुत सा बालसाहित्य आज हमारे सामने होता।
बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दो दशक (१९०१-१९२०)
इस कालखंड में जन्मे पुरोधा बालसाहित्यकारों की पंक्ति में कुछ उल्लेखनीय नाम हैं- ठाकुर श्रीनाथ सिंह (ज. १९०१-१९९६ मानपुर, इलाहबाद, ः प्रमुख कृतियां ः ’गुब्बारा‘, ’दोनों भाई‘, ’पिपहरी‘, ’बालभारती‘, ’लंबा-चौडा‘, ’मीठी तानें‘, ’खेलघर‘, ’बाल कवितावली‘), शम्भूदयाल सक्सेना (ज. १९०१-१९८६, फरूखाबाद ः प्रमुख कृतियां ः ’पालना‘, ’मधु लोरी‘, ’लोरी और प्रभाती‘, ’फूलों के गीत‘, ’चन्द्र लोरी‘, ’आ री निंदिया‘, ’रेशम झूला‘, ’शिशु लोरी‘, ’नाचो गाओ‘, ’बाल कवितावली‘), सभामोहन अवधिया ’स्वर्णसहोदर‘ (ज. १९०२-१९८०, शाहपुरा-मंडला ः प्रमुख कृतियां ः ’चगन-मगन‘, ’गिनती के गीत‘, ’नटखट हम‘, ’ललकार‘, ’लाल फाग‘, ’बाल खिलौना‘, ’वीर बालक‘, ’बादल‘, ’वीर हकीकत राय‘, ’शतमन्यु‘, ’बच्चों के गीत-४ भाग‘), सुभद्रा कुमारी चौहान (ज. १९०४-१९४८, निहालपुर, इलाहबाद, ः प्रमुख कृतियां ः ’कोयल‘, ’सभा का खेल‘), सोहनलाल द्विवेदी (१९०६-१९८८, बिन्दकी-फतेहपुर ः प्रमुख कृतियां ः ’दूध बताशा‘, ’बिगुल‘, ’शिशु भारती‘, ’बाल भारती‘, ’बांसुरी‘, ’हँसो-हँसाओ‘, ’शिशु गीत‘, ’बच्चों के बापू‘, ’गौरव गीत‘, ’बाल सिपाही‘, ’हम बलवीर‘, ’हुआ सवेरा‘, ’उठो-उठो‘, ’गीत भारती‘), महादेवी वर्मा (१९०७), रमापति शुक्ल (१९०८-१९९३ नारायणपुर, गोरखपुर ः प्रमुख कृतियां ः ’अंगुरों का गुच्छा‘, ’हुआ सवेरा‘, ’शैशव‘, ’राष्ट्र के बापू‘, ’मुन्नी की दुनिया‘, ’बच्चों के भावगीत‘), रामेश्वर दयाल दुबे (१९०८ लखनऊ, प्रमुख कृतियां ः ’अभिलाषा‘, ’चलो-चलो‘, ’डाल-डाल के पंछी‘, ’माँ यह कौन‘, ’कुकडूं कूं‘, ’फूल और कांटे‘, ’धरती के लाल‘) रामधारी सिंह दिनकर (१९०८-१९७४ सिमरिया-मुंगेर ः प्रमुख कृतियां ः ’धूप-छांह‘, ’मिर्च का मजा‘, ’सूरज का ब्याह‘),
आरसी प्रसाद सिंह (१९११-१९९६, पुरैख- दरभंगा, प्रमुख कृतियां ः ’चंदा मामा‘, ’चित्रों में लोरियां‘, ’ओनामासी‘, ’जादू की वंशी‘, ’कागज की नाव‘, ’बाल गोपाल‘, ’हीरा मोती‘, ’राम कथा‘, कन्हैयालाल मत्त (१९११-२००३-जर्खी-एत्मादपुर, आगरा, प्रमुख कृतियां ः ’लोरियां और बालगीत‘, ’अब है मेरी बारी‘, ’बोल री मछली कितना पानी‘, ’स्वर्ण हिंडोला‘, ’रजत पालना‘, ’खेल तमाशे‘, ’आटे-बाटे-सैर सपाटे‘), भवानी प्रसाद मिश्र (१९१३- तिगरिया, होशंगाबाद ः ’तुर्कों के खेल‘), शकुंतला सिरोठिया (१९१५-२००५ कोटा-राज. ’गा ले मुन्ना‘, ’चटकीले फूल‘, ’नन्ही चिडया‘, ’सोन चिरैया‘, ’कारे मेघा‘, ’पानी दे‘, ’आ री निंदिया‘, ’बालगीत‘), द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी (ज. १९१६-१९९८ रौहता-आगरा, प्रमुख कृतियां ः ’काटो और गाओ‘, ’बढे चलो‘, ’माखन मिश्री‘, ’हाथी घोडा पालकी‘ सहित अनेक बाल पुस्तकें), अमृतलाल नागर (ज. १९१६-१९९०, आगरा), कहानियां- ’अमृतलाल नगर बैंक लिमिटेड‘, ’लिटिल रेड इजिप्शिया‘, ’सात पूंछों वाला चीकू‘, उपन्यास- ’बजरंगी-नौरंगी‘, बजरंगी पहलवान, ’बजरंगी स्मगलरों के फंदे में ‘तथा ’अक्ल बडी या भैंस‘, नाटक- ’परी देश की सैर‘ और ’बालदिवस की रेल‘, अन्य- ’बाल महाभारत‘) निरंकार देव सेवक (१९१९-१९९४, बरेली, ’हिंदी बालगीत साहित्य इतिहास एवं समीक्षा‘, ’मुन्ना के गीत‘, ’धूप-छाया‘, ’चाचा नेहरू के गीत‘, ’दूध जलेबी‘, ’माखन मिसरी‘, ’रिमझिम‘, ’फूलों के गीत‘, ’मटर के दाने‘, ’महापुरुषों के गीत‘, ’शेखर के बालगीत‘, ’पपू के बालगीत‘, ’बिल्ली के गीत‘, ’आजादी के गीत‘, ’टेसू के गीत‘, ’बीन बजाती बिल्ली रानी‘, ’चिडयां रानी‘, ’गीत कथाएं सोने की‘ आदि कुल मिला कर लगभग तीस किताबें), शान्ति अग्रवाल (१९२० बरेली, प्रमुख कृतियां ः ’बाल वीणा‘, ’जागा हिंदुस्तान‘, ’अगडम-बगडम‘)।
ठाकुर श्रीनाथ सिंह (ज. १९०१) के आरंभिक काल में अद्भुत बाल कवितायें लिखीं पर उनकी सबसे अधिक मनोरंजक बाल कविता मुझे ’नानी का संदूक निराला‘ ही लगती है-
नानी का संदूक निराला/पीछे से वह खुल जाता है। आगे लटका रहता ताला।
श्रीनाथ सिंह के अलावा इस दौर के शम्भू दयाल सक्सेना ने भी छोटी बहर की बडी ही सहज बाल कविताएं लिखी हैं, उदाहरण के लिए-
खिडकी है मकान की आँख/, लेते सभी उसी से झांक/आता जब कोई इस ओर, खिडकी तब कर देती शोर... या फिर उनकी ’सडक‘ कविता- कोई कहां गया था जिस दिन/जनम लिया था मैंने उस दिन/अब भी जहां कोई जाता/ मुझको अपना साथी पाता।
इसी तरह सभामोहन अवधिया ’स्वर्ण सहोदर‘ (१९०२-१९८०) ने बहुत सी ऐसी बाल कविताएं लिखी हैं जो बालकों के नटखट और चंचल स्वभाव का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करती है।
’झांसी की रानी‘ जैसी मशहूर वीर रस की लोकप्रिय कविता की रचयिता सुभद्रा कुमारी चौहान (१९०४-१९४८) किसी परिचय की मोहताज नहीं है, उन्होंने बच्चों के लिए काफी कवितायें लिखीं पर उन पर भी राष्ट्रीय कवयित्री का ठप्पा लगा रहा, ’वीरों का कैसा हो बसंत‘ उनकी इसी श्रेणी की कविता थी, पर बाल मन को छूने वाली तो उनकी ये ही कुछ कविताएं हैं-
’’मैं बचपन को बुला रही थी/बोल उठी बिटिया मेरी‘‘, या फिर ’’यह कदम्ब का पेड अगर माँ होता जमना तीरे/मैं भी इस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे‘‘, जिनके लिए उन्हें बाल कवयित्री के रूप में याद किया जाना चाहिए।
इस दौर के गांधीवादी पुरोधा बाल साहित्यकारों में सोहन लाल द्विवेदी (१९०६-१९८८) का नाम अविस्मरणीय है, हालांकि उन्हें उनकी राष्ट्रभक्ति की कविताओं की सीमाओं में ही सीमित कर दिया गया, पर ये कुछ बाल कविताएं उन्हें इस दौर बहुत बडे बालकवि के रूप में स्थापित करती हैं-
मैंने पाले बहुत कबूतर/भोले-भाले बहुत कबूतर/ढंग-ढंग के बहुत कबूतर/रंग-रंग के बहुत कबूतर/कुछ उजले, कुछ लाल कबूतर/चलते छम-छम चाल कबूतर/कुछ नीले, बैजनी
कबूतर/पहने हैं पैंजनी कबूतर/याद आ रहा वह घर अपना/लगता है, जैसे हो सपना।
‘ ‘ ‘
छायावाद की विख्यात कवयित्री महादेवी वर्मा (१९०७-१९८७) ने बडों के साहित्य के अलावा बच्चों के लिए भी पर्याप्त लिखा है। उनकी बाल कविताओं के दो संग्रह हैं, पहला- ’ठाकुरजी भोले हैं‘ और दूसरा- ’आज खरीदेंगे हम‘। ’कोयल‘ कविता का एक अंश-
घर में पेड कहां से लाए/ कैसे यह घोंसला बनाए/कैसे फूटे अंडे जोडे/किससे यह सब कहेगी/ अब यह चिडया कहां रहेगी ?
रमापति शुक्ल (ज. १९११) इस दौर के अनूठे बाल कवि हैं, उनकी इस बाल कविता का तो कोई जवाब ही नहीं जो घरेलू चीजों को केंद्र में रखकर ऐसे सवाल खडे करती है जिन्हें सुन कर बच्चे तो बच्चे, बडे-बडे भी दांतों तले उंगली दबा लें-
आलपीन के सर होता पर बाल न होता उस पर एक/कुर्सी के दो बांहें हैं पर गेंद नहीं सकती वह फेंक/कंघी के हैं दांत मगर यह चबा नहीं सकती खाना/गला सुराही का है पतला, किन्तु न गा सकती गाना।
एक तरह से देखा जाए तो ये वे कवि हैं जिनके पास अनेक श्रेष्ठ बाल कविताएं हैं पर जो अपनी इक्की-दुक्की श्रेष्ठ कवितओं के बल पर ही बालसाहित्य के पुरोधाओं की पंक्ति में शामिल हो सकते हैं। यहां प्रश्न संख्या का न होकर की गुणात्मकता का है। गुलेरी जी की मात्र तीन कहानियां ही उन्हंे अग्रिम पंक्ति के कथाकरों में खडा कर देती हैं।
रामेश्वर दयाल दुबे (ज. १९०८, हिन्दपुर, मैनपुरी) की ’खोटी अठन्नी‘ एक कथात्मक कविता है जिसका एक अंश यहां प्रस्तुत है-
आओ तुम्हें सुनाएं अपनी बात बहुत ही छोटी/किसी तरह आ गई हमारे पास अठन्नी खोटी/ साग और सब्जी लेने में उसे खूब सरकाया। कभी सिनेमा की खिडकी पर मैंने उसे चलाया... किन्तु कहूं क्या ’खोटी‘ कहकर सबने ही लौटाई। बहुत चलाई, नहीं चली वह, लौट जेब में आई।
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर (१९०८) की ’झंगोला‘ बाल कविता का यहां जिक्र न किया जाए तो यह आलेख अपनी सम्पूर्णता को नहीं पा सकता, दिनकर जी चन्द्रमा को ही बच्चा, बना देते हैं जो माँ से अपने लिए एक झंगोला सिलने के लिए कहता है और माँ उलटे शिकायत करती है कि तू तो कभी कभी घटता है तो कभी बढता है, फिर तेरे लिए किस नाप का झंगोला सिलूं, कुल मिलाकर यह बहुत ही प्यारी बाल कविता है जो दिनकर जी को पुरोधा बालकवियों में खडा करती है।
आरसी प्रसाद सिंह (१९११) इस दौर के ऐसे बाल कवि हैं जिन्होंने बाल कविताओं को गजल का शिल्प दिया और अलग ढंग की बाल कविताएं लिखीं।
तुकबंदी करने में और तुकबंदी बच्चों को सिखाने में आरसी प्रसाद सिंह का जवाब नहीं। देखिये- ’’गांधी से आंधी मिलती है, मिलता काला से ताला, गंगा से दरभंगा मिलता, मिलती लाल से माला, इसी तरह चांदी से बंदी, कोना से मिलता सोना, तुकबंदी में मंदी मिलती, खोना में मिलता रोना।‘‘ कन्हैयालाल मत्त (१९११) इस काल खंड के दिग्गज और सबसे निराले बाल कवि हैं।
चुटीले शिशुगीत और रंग-बिरंगी बाल कविताओं के रचयिता मत्त जी की एक किताब है। ’बाजार की सैर‘ जिसमें उनकी एक लम्बी कविता है और कविता क्या है पूरी बाजार की सैर है , तरह तरह के पकवान, तरह-तरह की चीज सबका इतना रोचक वर्णन है कि हैरानी होती है - अरे, एक बाल कविता में ऐसी भी चीजों को समेटा जा सकता है.. मत्त जी ने हिंदी बाल काव्य को इतना अधिक समृद्ध किया है कि उन्हें पुरोधा बाल कवि की संज्ञा देना सर्वथा उचित लगता है।
वेशभूषा से सौम्य-संत दिखने वाले गांधीवादी लेखक, बालसाहित्यकार विष्णु प्रभाकर (१९१२) का हिंदी बाल साहित्य के लिए भी महत्त्वपूर्ण योगदान है, ’’पहाड चढे गजनन्दन लाल, दक्खन गए गजनन्दन लाल।‘‘ ’बाबू जी बरात में‘ उनकी बहुत ही मजेदार बाल कहानियां हैं जिनमें हास्य और विनोद का गहरा पुट है, इनके अलावा विष्णु जी ने बच्चों के लिए अनेक एकांकी नाटक लिखे हैं जिनका कई बार मंचन भी हुआ है।
भवानी प्रसाद मिश्र (ज. १९१३-टिगरिया, होशंगाबाद) की बाल कवितायें बच्चों के लिए कौतुक की तरह हैं। वे सहज शब्दों में बातचीत के लहजे में ही कविता रच देते हैं जो बच्चों को सहज रूप से ग्राह्य हो जाती हैं। वे जितने बडे वयस्कों के कवि हैं उतने ही सहज बच्चों के कवि हैं, उदाहरण के लिए उनकी यह छोटी-सी कविता देखिए-
अक्कड-मक्कड, धूल में धक्कड/ दोनों मूरख, दोनों अक्खड/हाट से लौटे, ठाट से लौटे/एक साथ एक बात से लौटे।
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साल शुरू हो दूध दही से/साल खत्म हो शक्कर घी से/पिपरमेंट, बिस्किट, मिस्री से/ रहे लबालब दोनों खीसें।
शकुंतला सिरोठिया (१९१५ कोटा) ने मधुर बाल कविताएं और लोरियां लिखी हैं। उनकी कुछ कविताएं प्रस्तुत हैं- ’’हाथी आता झूम के/ धरती-मिट्टी चूम के,‘‘ या फिर ’’चंदा मामा ठहरो थोडा/कहां चले तुम जाते हो..... खेल रहे क्या आँख मिचौनी/बादल में छिप जाते हो।‘‘
इस दौर के पुरोधा बाल कवि द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी (१९१६-१९९८) ने विपुल बाल साहित्य रचा, जो कालांतर में उनकी समग्र रचनावली के रूप में प्रकाशित हुआ। उनकी कुछ बाल कविताएं ओज से ओतप्रोत हैं तो कुछ बाल मनोरंजन का अद्भुत उदाहरण हैं, जैसे-
वीर तुम बढे चलो/धीर तुम बढे चलो/आज प्रातः है नया/ आज साथ है नया/आज राह है नई/आज चाह है नई।
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यदि होता किन्नर नरेश मैं राजमहल में रहता/सोने का सिंहासन होता, सर पर मुकुट चमकता।
अमृतलाल नागर (ज. १९१६-१९९०, आगरा) बीसवीं शताब्दी के दिग्गज कथाकार माने जाते हैं। उनका प्रमुख क्षेत्र कथा का ही रहा, पर बच्चों के लिए उन्होंने पद्यकथाओं के साथ-सभी विधाओं में लिखा और ऐसा लिखा कि उसका कोई सानी नहीं। नागर जी के पास एक सशक्त भाषा, विनोदी शैली तथा किस्सों का अनंत भंडार सभी कुछ था। इसलिए उनकी बाल कहानियां हों या बाल उपन्यास सभी बच्चों को बहुत ही भाते हैं। उनकी कुछ प्रमुख रचनाओं के नाम हैं- बालकहानियां- अमृतलाल नगर बैंक लिमिटेड, ’लिटिल रेड इजिप्शिया‘, ’सात पूंछें वाला चीकू‘, बाल उपन्यास- ’बजरंगी-नौरंगी‘, ’बजरंगी पहलवान‘, ’बजरंगी स्मगलरों के फंदे में‘ तथा ’अक्ल बडी या भैंस‘, नाटक- ’परी देश की सैर‘ और ’बालदिवस की रेल‘, अन्य- ’बाल महाभारत‘, इधर नागर जी की सम्पूर्ण बालरचनाएं भी एक पुस्तक के रूप में लोकभारती प्रकाशन इलाहबाद से प्रकाशित हुई है जो सभी के लिए उपयोगी सद्ध होगी।
स्वतंत्रता प्राप्ति काल तक (१९२१-१९४७)
इस इस दौर की एक जानी-पहचानी कवयित्री सरोजिनी कुलश्रेष्ठ (ज. १९२३, दधेरा-मथुरा) हैं। भूकंप पर लिखी उनकी यह बालकविता बच्चे के मन में सवाल भी उठाती है और उसके परिणामों को मार्मिकता से दर्शाती है-
माँ, धरती क्यों डोल रही थी, घुर-घुर करती बोल रही थी/... लोग मर गए इतने सारे, / बिछुड गए आफत के मारे/कुछ रोते रह गए बेचारे/ घर भी टूट गए हैं सारे/ क्यों इतना विष घोल रही थी।
हिंदी के बाल रंगमंच से जिनका नाता और जुडाव रहा है वे रेखा जैन (१९२४) के व्यक्तित्व और कृतित्व से अपरिचित नहीं होंगे। बच्चों की दुनिया में पूरी तरह रची बसी रेखा जैन ने अभिनय-कला , नाट्य-लेखन और बाल रंगमंच को अपने अनुभव और प्रतिभा से जोडकर नई ऊंचाइयां दीं और नाटक की शिक्षा में कितनी महत्त्वपूर्ण भूमिका हो सकती है इसका भी प्रमाण प्रस्तुत किया। वे शिक्षा को उसकी जड प्रकृति से हटाकर मनोरंजन की ओर उन्मुख करती रहीं और ’गणितदेश‘ जैसा नाटक रचकर उन्होंने गणित जैसे विषय की दुरूहता को भी आसान कर दिया।
१९२४ में कानपुर में जन्मे चंद्रपाल सिंह यादव ’मयंक‘ ने अपने लगभग सात दशकों के रचना काल में अनेक बाल कवितायें लिखीं और हिंदी के पुरोधा बाल कवियों में अपनी जगह स्वयं बनाई। उनकी प्रमुख पुस्तकें है- ’जागृति-गीत‘, ’किसान-गीत‘, ’परियों का नाच‘, ’दूध मलाई‘, ’हिम्मत वाले‘, ’बज गया बिगुल‘, ’राजा बीटा‘, ’हम देश की मुस्कान‘, ’जंगल का राजा‘, ’हिंदी गीत माला १-२‘, ’बन्दर की दुल्हन‘, ’मुनमून‘, ’सर्कस‘ मयंक जी आज की विख्यात बाल साहित्य लेखिका डॉ. उषा यादव के पिता थे और मयंक जी की बाल कविताओं ने अपने जमाने की श्रेष्ठ बाल पत्रिका ’पराग‘ सहित अनेक पत्र-पत्रिकाओं में धूम मचा रखी थी, हालांकि उनकी सभी बाल कवितायें ’श्रेष्ठ‘ की श्रेणी में नहीं आतीं, पर यह उक्ति किसी भी रचनाकार पर लागू की जा सकती है।
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना (ज.१९२७-१९८३, पिकौरा-बस्ती,) की गणना हिंदी के बडे लेखकों, और कवियों में की जाती है पर न केवल उन्होंने श्रेष्ठ और नए मुहावरे से युक्त बाल कवितायें लिखी हैं, बल्कि उनकी बाल कहानियों तथा लोकप्रिय बाल नाटकों ने भी अपनी अमिट छाप छोडी है, शायद इसीलिए उन्हें हिंदी के पुरोधा बालसाहित्यकारों में शामिल करना उचित लगता है। ’इब्ने बतूता‘, ’महंगू की टाई‘ जैसी अनूठी बाल कविताएं, ’अपना दाना‘, ’सफेद गुड‘, ’जून चाट पानी लाल‘ और ’टूटा हुआ विश्वास‘, जैसी जीवन मूल्यों से ओतप्रोत बाल कहानियां और ’भों-भों खोंखों‘, ’लाख की नाक‘ जैसे लोकप्रिय बाल नाटकों के कारण वे अपनी पूरी पीढी में सबसे अलग खडे नजर आते हैं। हिंदी बालसाहित्य को आधुनिक सन्दर्भों से जोडकर उन्होंने उसे नई गरिमा प्रदान की है।
इस दौर के तीन उल्लेखनीय वरिष्ठ कवि सीताराम गुप्त (१९२७), प्रेमनारायण गौड (१९२७), नारायणलाल परमार (१९२७) हैं, जिन्होंने कई दशकों तक लिखकर हिंदी बालकविता को समृद्ध किया है, सीताराम गुप्त की एक बहुत ही पुरानी बाल कविता बचपन में ’पराग‘ में पढी थी- ’उड चली गगन छूने पतंग‘ इस कविता की अब पहली ही पंक्ति याद रह गई, प्रेम नारायण गौड और नारायणलाल परमार भी काफी समय से बालकवितायें लिख रहे हैं और उन्होंने हिंदी बाल साहित्य में बहुत कुछ नया जोडा है।
राम निरंजन शर्मा ’ठिमाऊ‘ (१९२८-पिलानी, प्रमुख कृतियां ः ’बालोत्सव‘, ’बाल कवितावली‘), ठिमाऊ जी बहुत ही सहज शब्दावली में लिखने वाले बाल कवियों में से थे पर उनकी कविताओं के सन्दर्भ समसामयिक हुआ करते थे, उदाहरण के लिए उनकी महंगाई पर केन्दि्रत यह बाल कविता देखिये - पप्पू ने दीदी से पूछा क्या होती महंगाई/सभी इसी की चर्चा करते, चली कहां से आई ?/हम दोनों के गुल्लक दीदी, मम्मी ने क्यों खोले, बिल वाले के आज कान में, पापा जी क्यों बोले? इस पूरी कविता में एक मध्यवर्गीय परिवार की मुश्किलों और बच्चे के मन में उठते सवालों का मार्मिक चित्रण है।
मनोहर वर्मा (ज. १९३१-अजमेर, प्रमुख कृतियां ः ’भुलक्कड बिल्ली‘, ’हम सब एक हैं‘, ’मेरी प्रिय बाल कहानियां‘, सहित एक सौ से ऊपर पुस्तकें), इस दौर के एक वरिष्ठ बाल साहित्यकार हैं जो लेखन और सम्पादन दोनों में सिद्धहस्त रहे हैं, आत्मप्रचार से सर्वथा परे रहकर वे मौन साधनारत रहे हैं और उन्होंने एक-से-एक बढकर श्रेष्ठ बाल कहानियां हिंदी जगत् को दी हैं, उनकी कहानियों का एक महत्त्वपूर्ण संग्रह - ’मेरी प्रिय बाल कहानियां‘ है जिसमें उनकी बत्तीस बाल कहानियां संगृहीत हैं, उत्कृष्ट बाल लेखन के लिए वे अनेक सम्मानों और पुरस्कारों से अलंकृत हुए हैं और अब तक उनकी एक सौ पचास से अधिक बाल कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं। वे न केवल राजस्थान के साहित्य गौरव के रूप में समादृत हैं बल्कि देश के प्रमुख वरिष्ठ हिंदी बालकथाकारों में गिने जाते हैं, ’नन्हा जासूस‘, ’मन के लड्डू लाख के‘, ’दोस्ती का तमाशा‘, ’ननकू की कमीज‘, ’दादा जी की बत्तीसी‘, ’आंधी में उडा कागज‘, ’मामला एक सोने की चेन का‘, ’सर्कस में एक रात‘ उनकी स्मरणीय कहानियां कही जा सकती हैं।
’बांकी-बांकी धूप‘ और ’दामोदर अग्रवाल की १०१ बाल कवितायें‘ के रचयिता दामोदर अग्रवाल (ज. १९३२-२००१, वाराणसी) अपनी पीढी में सबसे अलग और सबसे निराले बाल कवि हैं जिनका कोई सानी नहीं, उन्होंने नई काट की और नए बिम्बों के लेकर ऐसी बाल कविताएं रची हैं जो बालमन की अतल गहराइयों को भी छूती हैं और बाल कल्पनाओं की ऊंची-से ऊंची उडान भी भरती हैं, शायद वे अकेले ऐसे कवि हैं जिनकी बाल कविताओं की उठान सबसे अनूठी और ताजी है और उन कविताओं के साथ उनका नाम भी नहीं चिपका हो तो भी उनकी पहचान छुपती नहीं, आँख मूंद कर वे पहचानी जा सकती हैं कि ये रचनाएं दामोदर अग्रवाल की हैं, पुरोधा का अलंकरण बाल लेखकों को सिर्फ उनकी बडी वय से ही नहीं मिलता है, वह मिलता है, उनके बडे और अप्रतिम काम से फिर वह संख्या में भले कम क्यों न हो।
कमलेश्वर (ज. १९३२-२००७ मैनपुरी) ने यद्यपि अपना अधिकांश लेखन वयस्कों के लिए ही किया पर उनकी कुछ बाल कहानियां और बाल नाटक हिंदी बाल साहित्य में उनका अप्रतिम स्थान बनाते हैं, कमलेश्वर अद्भुत प्रतिभा के धनी लेखक तो थे ही वे बालमन के भी बडे पारखी थे। उनकी प्रमुख रचनाओं में बालकहानी- ’होताम के कारनामे‘ और बाल नाटक- ’पैसों का पेड‘, ’समुद्र का पानी‘, ’जैसी करनी वैसी भरनी‘, ’जेब खर्च‘ आदि शामिल हैं।
डॉ. श्रीप्रसाद (१९३२- ’चिडयाघर की सैर‘, ’साथी मेरा घोडा‘, ’मेरी प्रिय बाल कहानियां‘, ’मेरे प्रिय शिशुगीत‘ सहित अनेक पुस्तकें,) का नाम जुबान पर आते ही न केवल एक वरिष्ठ पीढी का सौम्य, मृदुभाषी व्यक्तित्व नजरों के सामने आ जाता है बल्कि उनके द्वारा जीवन पर्यन्त अनेक विधाओं में रचा गया बालसाहित्य भी स्मरण हो आता है, शिशुगीतों के तो वे सिरमौर रचयिता थे, हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि हिंदी में ज्यादातर शिशुगीत बिल्ली और चूहे को केंद्र में रख कर लिखे गए और हिंदी में ही क्यों अंग्रेजी बाल साहित्य में भी ऐसे शिशुगीतों की भरमार है, पर श्रीप्रसाद की कुछ बाल कवितायें और शिशुगीत इतर विषयों पर भी हैं।
इस काल के एक और स्मरणीय कवि राम बचन सिंह ’आनंद‘ (ज. १९३२, अरा, बिहार), ने बहुत ही सहज बाल साहित्य रचा, उनकी प्रमुख कृतियां, ’गाओे गीत सुनाओ गीत‘, ’बढे चलो तुम नन्हे राही‘, ’दीप और तारा‘, ’टेलेफोन‘ पर उनकी एक बहुत ही मनोरंजक बालकविता है-
सुन लो पंडत पोंगा/बिना तार अब चोंगा/चलता-फिरता कौर्द्लेस/लो बतियाता टेलेफोन।
’बाल भूषण‘, ’कंतक थैया घुनु मनईया‘, ’नाचो-गाओ‘, ’राष्ट्रप्रेम के गीत‘, ’टेसू की भारत यात्रा‘, ’अब्बा की खांसी‘ सहित अनेक बालोपयोगी पुस्तकों के जनक डॉ, श्रीकृष्ण चन्द्र तिवारी ’राष्ट्रबंधु‘ (१९३३-सहारनपुर) हमारे समय के पुरोधा बालसाहित्यकारों में से एक हैं। उन्होंने स्वयं तो विपुल बाल साहित्य रचा ही साथ ही नई पीढी के अनेक युवा, प्रतिभाशाली बालसाहित्यकारों को ’भारतीय बाल कल्याण संस्थान-कानपुर‘ के जरिये सम्मानित और प्रोत्साहित करके आगे बढाया। इस मायने वे सही अर्थों में हमारे पुरोधा बालसाहित्यकारों में गण्यमान हैं। ’कंतक थैया घुनु मनईया‘ में शामिल उनकी बाल कवितायें ग्राम्य और लोक शब्दावली का अद्भुत सामंजस्य प्रस्तुत करती हैं, शिशुगीतों में भी उनका अप्रतिम योगदान रहा है।
राष्ट्रबंधु की ही पीढी के विष्णुकांत पाण्डेय (१९३३) ने भी पशु-पक्षियों पर कुछ अद्भुत शिशुगीत रचे हैं और एक जमाना था जब ’धर्मयुग‘ तथा ’साप्ताहिक हिंदुस्तान‘ के बाल पृष्ठों पर उनके शिशुगीतों को बडे ही आदर के साथ छपा जाता था, उनका एक स्मरणीय शिशुगीत देखिये-
घोडा नाचे, हाथी नाचे, नाचे सोनचिरैया/ किलक-किलक कर बन्दर नाचे, भालू ता-ता थैया/ठुमक-ठुमककर खरहा नाचे, ऊंट, मन्ना गैया/आ पहुंचा जब शेर नाचने, मची-’हाय रे दिया।
बुलंदशहर, उत्तरप्रदेश में जन्मे रत्नप्रकाश शील (ज. १९३५), ने बच्चों के लिए ढेर सारा हास्य और जासूसी बाल साहित्य रचा है जिसमें बाल उपन्यास, बाल कहानियां, बाल कवितायें, चित्रकथाएं शामिल हैं अपने जमाने की मशहूर बालपत्रिका ’मिलिंद‘ के वर्षों तक संपादक रहने के बाद वे काफी समय तक ’नंदन‘ पत्रिका से जुडे रहे और भारत में जादूगरी को एक वैज्ञानिक कला का स्तर दिलवाने में भी उन्होंने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया, शील जी की प्रमुख रचनाओं में ’नन्हे जासूस‘ बाल उपन्यास श्ाृंखला काफी लोकप्रिय रही है।
हिंदी बाल कविता को जिन वरिष्ठ और वर्तमान कवियों ने नए तेवर और नया शिल्प दिया है उनमें बालस्वरूप राही (१९३६-दिल्ली, प्रमुख कृतियां- ’हम जब होंगे बडे‘, ’दादी अम्मा मुझे बताओ‘, ’सूरज का रथ‘) का नाम प्रमुख है, पारंपरिक ढंग से रची जाने वाली बाल कविताओं से वे दो कदम आगे जाकर नई सोच वाली बाल कविताएं रचते हैं जिनकी ताजगी और लयात्मकता देखते ही बनती है।
चुटीले शिशुगीतों और एक से एक मनोरंजक बालकविताएं रचने वाले डॉ. शेरजंग गर्ग (१९३७, देहरादून) हमारे वर्तमान वरिष्ठ बाल कवियों में से एक हैं, वयस्कों के लिए वे जितनी तीक्ष्ण और मारक व्यंग्य रचनाओं के लिए ख्यात हैं उतनी ही ख्याति उनकी बच्चों की नई सोच और नई काट की बाल कविताओं के लिए रही है।