Friday, February 22, 2019

एक सक्षम फिल्म निर्देशक और सहृदय शायर  के रूबरू होना


- रमेश तैलंग : 22.02.2019




विवेक शर्मा की बात करें तो उनकी पहली पहचान तो फिल्म निर्देशक की ही रही  है। निर्देशक के रूप में उनकी पहली फिल्म भूतनाथ थी जो 2008 मे रिलीज हुई और जिसमें अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, जुही चावला, राजपाल यादव, और प्रियंशु चटर्जी जैसे दिग्गज अभिनेताओं के साथ  बाल कलाकार अमन सिद्दीकी (स्क्रीन नेम - बंकू ) ने  सभी दर्शकों का मन मोह लिया।  भूतनाथ वो फिल्म थी जिसने  विवेक शर्मा को हिन्दी सिनेमा के सफल फिल्म निर्देशकों  की पहली पायदान  पर खड़ा कर दिया हालांकि यहाँ यह भी बतादूँ कि इस फिल्म में  निर्देशन के अलावा स्क्रीन प्ले और डाइलॉग  लेखन में भी उनका महत्वपूर्ण अवदान था।

मैं कहना ये चाहता हूँ कि विवेक शर्मा  जितने सक्षम  फिल्म निर्देशक हैं उतने ही संवेदनशील,   सहृदय कवि, लेखक और स्क्रीन रायटर भी हैं।


यह इत्तेफाक ही है कि मेरी उनसे पहचान एक शॉर्ट फिल्म की स्क्रिप्ट के जरिये हुई जिसे मैंने उनके पास भेजा था  और जो अभी मुकम्मल फिल्म के रूप में आने की बाट जोह रही है। सोशल मीडिया पर तो मेरा विवेक से  निरंतर संवाद रहा है लेकिन उनसे जब  पहली व्यक्तिगत मुलाक़ात हुई तो उन्हे  देखकर मुझे लग गया था कि इनसे अपनी पटरी सही बैठेगी। एक तो वे जबलपुर मध्यप्रदेश के हैं इसलिए उसी प्रदेश का होने के नाते मेरा आत्मीय नाता उनसे जुड़ा हुआ है। दूसरे, खास बात यह है कि  फ़िज़िक्स में मास्टर डिग्री लेकर भी वे साहित्य के परम अनुरागी हैं. भूतनाथ के अलावा उनके खाते मेंअभी कुछ और फिल्में   हैं  जो निर्माणाधीन हैं लेकिन इतना तो तय है कि उनका cinematic vision और  dedication गजब का है। संवेदनशील होने के नाते उनका साहित्य से अनुराग स्वाभाविक है और यह महत्वपूर्ण इसलिए है कि वर्तमान में फिल्म और साहित्य का नाता अत्यधिक झीना हो गया है।

विवेक शर्मा की शायरी की पहली किताब "मोहब्बत उर्दू है" (नुक्तों की गैरमौजूदगी के लिए क्षमा करें) जब प्रकाशित हो कर सामने आई तो  उसकी सूचना और मानार्थ प्रति उन्होने अपने आत्मीय जनों मे शामिल कर मुझे भी दी। इस किताब से गुजरते हुए मैं  एक बात पहले ही रेखांकित  कर दूँ कि ये पंक्तियाँ विवेक शर्मा की शायरी की किताब की मुकम्मल समीक्षा नहीं है.। इस किताब की  कुछ विशेषताएँ हैं जिन्हें अपनी टिप्पणी के साथ मैं आपके समक्ष रखना चाहता हूँ।


पहली बात तो यह, कि इस किताब को शायरी के साथ रंगीन तस्वीरों के साथ बहुत ही खूबसूरती से सजाया गया  है। इस खूबसूरत संयोजन के कुछ फायदे भी हैं और नुकसान भी हैं _ "लफ़्ज़ जहां खामोश हुए तस्वीर वहाँ पर बोल उठी  "। आर्ट पेपर पर छपे   लगभग 60  प्रष्ठों में सिमटी इस किताब में  विवेक शर्मा ने अलग अलग "मूड्स" के साथ अपने दिली जज़्बातों को जुबान दी है। ये शायरी निश्चित रूप से मयारी  शायरी  नहीं है लेकिन

 


उसमें एक कवि एक शायर की ईमानदारी हर जगह नज़र आती है। कुछ शेरों का मिजाज रूमानी है  तो कुछ शेर ज़िंदगी के फलसफे का  बयान करते हैं और किसी शेर मे  शायर की :ख़्वाहिश  अपने  बचपन में खो जाने की ओर इशारा करती है। ( बादलों में खोना चाहता हूँ/मैं कुछ होना चाहता हूँ/नहीं होना मुझे बड़ा/मैं बच्चों सा रोना चाहता हूँ/"

एक खास बात और  कि विवेक मोहब्बत को अलग अलग समय पर या अलग अलग मूड  में कभी उर्दू तो कभी खुशबू की मानिंद देखते हैं और कभी ये भी कह पड़ते हैं - " के लफ्जों से ये बयां नहीं होती /जहां मोहब्बत है वहाँ जुबां नहीं होती/"

माँ के प्रति विवेक शर्मा का अप्रतिम आदर और अनुराग है इसीलिए एक जगह वे कहते हैं -"मांग ले मन्नत कि ये जहां मिले/मिले वही गोद फिर वही माँ मिले/"


मेरा मानना है कि मुखतलिफ़ मूड्स  की ये मुखतलिफ़  शायरी आज के  युवा वर्ग को अवश्य पसंद आएगी, हाँ,  मयारी शेरो-शायरी के हुनर और फ़न के उस्तादों की, हो सकता है इस किताब के बारे मे अलग राय हो, पर यहाँ यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कवि या शायर के रूप मे  विवेक शर्मा की यह पहली किताब है। बेलाग शायरी के अलावा  अपनी साज-सज्जा मे  ये इतनी खूबसूरत है कि उसे देखकर ईर्ष्या होती है और मन मेँ सवाल उठता है कि हिन्दी/उर्दू के प्रकाशक  साहित्यिक iपुस्तकों  की साजसज्जा पर समुचित ध्यान देने मे कंजूसी क्यों करते हैं?

इस किताब के प्रकाशन पर , मैं विवेक शर्मा को हार्दिक शुभकामनायें देता हूँ और चाहता हूँ कि वे सिनेमा और साहित्य की दो धारी तलवार पर अपने कदम रखने से पीछे न हटें...हम जैसे साहित्य-प्रेमियों के लिए उनका यह महत्वपूर्ण  देय भी  होगा और प्रेय भी ।






Sunday, March 18, 2018

कोई ढूंढियो री!

कोई  ढूंढियो री!

कोई ढूंढियो री! अम्मां ढूंढियो री!
मेरे बस्ते ने चुरा ली, मेरे बस्ते ने चुराली
मेरी आँखों की नींद, 
मेरी रातों की नींद ,
कोई ढूंढियो री! अम्मां ढूंढियो री!

कोई ढूंढियो री! चाची! ढूंढियो री!
मेरी बुक्स  ने चुरा ली, मेरी बुक्स  ने चुराली
मेरी आँखों की नींद, 
मेरी रातों की नींद ,
कोई ढूंढियो री! चाची  ढूंढियो री!

कोई ढूंढियो री! भाभी! ढूंढियो री!
मेरे होमवर्क  ने चुरा ली, मेरे होमवर्क ने चुराली
मेरी आँखों की नींद, 
मेरी रातों की नींद ,
कोई ढूंढियो री! भाभी  ढूंढियो री!

कोई ढूंढियो री! मैडम  ढूंढियो री!
मेरे एग्जाम  ने चुरा ली, मेरे एग्जाम  ने चुराली
मेरी आँखों की नींद, 
मेरी रातों की नींद ,
कोई ढूंढियो री! मैडम! ढूंढियो री!

- रमेश तैलंग / 19/03/2018 

Thursday, March 15, 2018

पूर्णविराम



पूर्णविराम!

अम्मां, अपनी गली में है एक छेड़ूराम

आज धर दिया मैंने धप्पा
भागा करता पप्पा पप्पा
मैं भी गाती लारालप्पा
दे कर आई उसको अच्छा -सा  ईनाम.

छोटी हूँ पर इतनी भी ना
सुनूं मनचलों की, बोलूँ ना
आना जाना मैं  रोकूँ ना
आये-गए बिना चलता है किसका काम?

भैया भैया बोलो उनको
फिर भी समझ न आए उनको
गुस्स्सा है  अब बहुत अपुन को
कोमा से तो भला, लगा दूं पूर्णविराम .

- रमेश तैलंग /16-03-2018
चित्र सौजन्य : google  

नक्को! नक्को!


नक्को! नक्को!

बिस्तर बोला- सोजा, सो जा
मैं बोली नक्को! नक्को!
उठी, सैर को चलदी,लौटी
भरे ताजगी फिर  घर को.

सूरज ने सिंदूर दिया जो,
एक पुडिया में बाँध लिया
मिला धूप का छौना, उसको
गोदी में भर प्यार किया
कहा फूल ने - कल फिर आना, 
मैं बोली -  पक्को! पक्को!

छत के नल को बहते देखा,. 
उसका पानी बंद किया
घर वालों के संग बैठी  फिर 
छुट्टी का आनंद लिया

काम बटाया सबका थोडा
बदन हुआ -थक्को! थक्को!
 
- रमेश तैलंग /12/03/2018


Friday, January 19, 2018

आइये चलें, लल्लनटॉप डॉट काम के अड्डे ,पर








द लल्लनटॉप की वेबसाईट से मेरा साबका कुछ महीनों पहले ही पडा और देखते ही  मैं इसका मुरीद हो गया. इसके कारण भी अनेक थे. पहला इसका  खांटी देसी नाम जो पहली ही नज़र में  आपको आकर्षित करता है.दूसरा, इसके एंकर/ संपादक श्री सौरभ द्विवेदी का अंदाज़ेबया जो अपने को ज्यादा ही भा गया. एक तो वे ओरई के हैं जो बुन्देलखंड का  हिस्सा है और अपन भी बुन्देलखंड टीकमगढ़ के ठहरे  तो एक रिश्ता बन ही जाता है भले ही अबतक  अपना सीधा संवाद  सौरभ से स्थापित न हुआ हो. उनके नाम का पहला हिस्सा सौरभ मुझे अपने बहुत ही अज़ीज़ इलाहाबादी मित्र और बेवाक  पत्रकार प्रदीप सौरभ की भी याद दिलाता है जिनके साथ हिंदुस्तान टाइम्स प्रकाशन समूह में मेरे काफी अच्छे बुरे दिन बीते. बहरहाल यह अलग प्रसंग है.

लल्लनटॉप की वेबसाईट पर जाएँ तो आपका स्वागत एक अजीबोगरीब लल्लन टॉप  लोग्लाइन से होता है : " मम्मी कसम मिलेगा मारक मज़ा" इस मारक मज़ा को मैंने कई बार ज़रूरतमंद हो कर तो कभी गैर ज़रूरतमंद हो कर लिया है . हो सकता है आपको इस  लोग्लाइनकी भाषा  संभ्रांत श्रेणी की न लगे लेकिन अगला मम्मी की कसम खा रहा है तो फिर मज़ा लेने में संकोच क्यों.

तो सबसे पहले मैं लल्लन टॉप के स्टूडियो में सौरभ द्विवेदी द्वारा लिए गए एक विशेष ज़मात के बॉलीवुड सेलेब्रिटीज  के इंटरव्यूज की बात करूंगा . सेलेब्रिटीज की इस ज़मात को जोड़ने और उनसे बातचीत करने से पहले सौरभ  अपना होमवर्क काफी अच्छी तरह से करते हैं  और जिन सेलेब्रिटीज को वे बुलाते हैं या जो सेलेब्रिटीज उनके स्टूडियो में आते हैं वे ज्यादर युवा वर्ग के होते हैं और इन इंटरव्यूज को देखकर-सुनकर आप सचमुच में तृप्त होते हैं.

तृप्त इस मायने में क्योंकि यहाँ जो कुछ  भी  घटता है वह इतना अनौपचारिक ढंग से सामने आता है कि आपको लगता है जैसे आप भी इस पूरे कार्यकलाप के एक अंग बन गए हैं. चहारदीवारी वाली  ग्लेमर की दुनिया भी यहाँ आकर आपको  अपनी सी लगने लगती है और वे सेलेब्रिटीज जिन्हें परदे पर आप देखते और सराहते हैं, आपकी अपनी दुनिया के हिस्सा बन जाते हैं.  यहाँ  अर्णव गोस्वामी, राजीव मसंद, कोमल नाहटा , तरन आदर्श, अनुपमा चौपडा, जैसाअभिजात्य नज़र नहीं आता और न ही कोई औपचारिक खांचे में डाले हुए सवाल. लल्लनटॉप पर सब  कुछ बड़े ही सहज और स्वाभाविक ढंग से संपन्न होता है.

हाल ही में सौरभ द्वारा मुक्काबाज फिल्म की टीम, जिसमें अनुराग कश्यप, विनीत कुमार सिंह और जोया हुसैन शामिल हैं, से  लिया गया एक इंटरव्यू याद आ रहा है. इंटरव्यू संपन्न होते-होते रात का एक बज रहा है. बैड पर सौरभ द्विवेदी के सामने रजाई/कम्बल औढे तीन शख्स बैठे हैं - अनुराग, विनीत और जोया. बातचीत, हंसी मज़ाक, कटाक्ष, कविता, गीत सब कुछ इतना सहज ढंग से चल रहा है कि आप पूरी तरह एंगेज हो जाते हैं.

लल्लनटॉप के स्टूडियो के अलावा लल्लनटॉप का एक अड्डा भी है जिस के ज़रिये मेरी वर्चुअल मुलाकात  बॉलीवुड की अनेक हस्तियों से हो चुकी  है इनमें  पीयूष मिसहरा , स्वानंद किरकिरे, स्वरा भास्कर, सुधीर मिसहरा , वरुण ग्रोवर, जयदीप  साहनी, पंकज त्रिपाठी,  अनुपम खेर, इरफ़ान, नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी, संजय मिश्रा, अनुष्का शर्मा, रणवीर हुड्डा,  अनुराग कश्यप, विनीत सिंह, जोया हुसैन, राधिका आप्टे, सिंगर कम्पोजर रचिता, गायिका पावनी, इरशाद कामिल, आदि सभी शामिल हैं.

सौरभ द्विवेदी, दुनिया में घट रही सभी प्रमुख घटनाओं की पूरी खबर रखते हैं और दिग्गज पोलिटिकल लीडर्स के इंटरव्यू भी  करते रहते हैं, राजनीतिक मामलों पर उनकी पकड़ गहरी है और देश में घट रही घटनाओं से रूबरू होते हुए उन पर  अपने ढंग से  टीका टिपण्णी भी करते हैं.

कुल मिलाकर इस वेबसाईट पर यह मेरी पहली ही प्रत्रिक्रिया है ..आगे भी चर्चा होती रहेगी. फिलहाल लल्लनटॉप डॉट कॉम की पूरी टीम को जीवंत बने रहनेऔर हमें भी जीवंत रखने  के लिए आभार और अनेक शुभकामनाएं.

रमेश तैलंग / 9211688748   



Thursday, November 23, 2017

द्विपदी.........




वही चुनावी पैंतरे, वही पुराने झूठ
छाया,फल की आस क्या, उनसे जो हैं ठूंठ
जो दुख मारें और के, वे ही हैं अरिहंत
जो अपना स्वारथ भरें वे काहे के संत
अधर लपेटे चाशनी, ह्रदय धरें दुर्भाव
भरें न पूरी जिन्दगी कटु बैनन के धाव
ज्ञान अहम् का जनक है, विनय ज्ञान का रत्न
जानें जो मानें नहीं सबसे बड़े कृतघ्न
कुए, बावड़ी, ताल सब जितने थे जलस्रोत
मरे शरम से देखकर, बोतल पानी ढोत
विद्या के मंदिर बने जबसे धन की खान
कलपुर्जों में ढल गये सब जीवित इंसान
हुआ दस गुना मूल से बढ़ते-बढ़ते सूद
देते-देते हो गया खुद का खत्म वजूद
संघर्षों का आदि है, मगर नहीं है अंत
एक अकेला आदमी, चिंता घणी अनंत

- रमेश तैलंग