Monday, November 20, 2017

मुंबई पर पहली कविता


दो वर्ष हो गए मुंबई में
अपरिचितों की तरह रहते हुए
सेन्ट्रल पार्क की चहलकदमी भी
कुछ ख़ास काम नहींआई

तभी एक दिन मुझे लगा-
शहर कोई भी हो
वह तब तक आपको नहीं अपनाता
जबतक आप स्वयं उसे नहीं अपनाते.

एक बार खुले मन से
कोशिश करके  तो देखें
फिर ऐसा हो ही नहीं सकता
कि कुछ मुस्कराहटें
आपकी झोली में न आ गिरें


मुंबई इतनी भी बेमुरब्बत नहीं
कि आप अपना हाथ मिलाने को आगे बढाएं
और वह तपाक  से
अपना हाथ पीछे खींच ले

- रमेश तैलंग






Wednesday, September 28, 2016

दो गीत




क्या होगा बावरे?
शीश-पांव ढक जाएं, 
बस इतना काफ़ी है;
और बड़ी चादर का
क्या होगा बावरे?

हाड़-तोड़ मेहनत के 
बाद मिलें दो रोटी;
जीवन सन्तोष-मय,
उम्र भले हो छोटी;
कंठ तॄषित तर जाएं, 
बस इतना काफ़ी है,
वैभव ले सागर का
क्या होगा बावरे?

इच्छाओं का यूं तो
कोई भी पार नहीं;
नैया चलती रहे,
सिर पर हो भार नहीं;
मुक्त-भाव मर जाएं, 
बस इतना काफ़ी है,
बंधन दुनिया भर का,
क्या होगा बावरे?
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सपने उदास  थे
वृक्ष, नदी, फ़ूल, पात
सभी आस-पास थे,
तू कैसे देखता,
तेरे नयनों में तो सपने उदास  थे।

सूरज आया-गया, पर तूने 
वातायन न खोले;
गूंजा संगीत प्रकृति का, तेरे 
अधर रहे अनबोले;

उत्सवमय दिवस-रात
सभी आस-पास थे
तू कैसे देखता,
तेरी सांसों में तो संचित संत्रास थे

जीवन के हर पल पर - दीनता,
मलिनता रही हावी;
वर्तमान खा गई, अतीत की
चिंता, होनी भावी;

खिले-खिले पारिजात
सभी आस-पास थे
तू कैसे देखता
तेरी मुट्ठी में तो दंशित मधुमास थे
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image courtesy: google.

Monday, October 26, 2015

मरु में भी खिलते हैं श्वेत कमल





इस बार बीते सितंबर में बीकानेर की यात्रा एक तरह से शोक-यात्रा थी। मेरे छोटे साले योगश गोस्वामी का हृदयाघात से असामयिक देहांत हो गया था। दशाह आदि की रस्मों के उपरांत शोकाकुल मन बदलने के लिहाज से कुछ परिजनों के साथ कोलायतजी और कोडमदेसर जाने का कार्यक्रम बन गया। कोडमदेसर तो पिछले वर्ष भी गया था जब योगेश और उसकी पत्नी अरुणा भी साथ थे पर इस बार योगेश की स्मृतियां ही साथ रहीं।
इससे पूर्व बीकानेर अनेक बार आया हूं पर कोलायतजी जाने का यह पहला अवसर था। परिसर में प्रवेश करते ही कोलायतजी के सरोवर में  बिखरी हरीतिमा और खिलते श्वेत कमलों का समूह देखा तो अनिर्वचनीय दिव्य आनंद की अनूभुति हुई। जांगलू प्रदेश के नाम से कभी विख्यात रही यह भूमि, जहां जल के स्थान पर रेत के ढूहे और वनस्पति के नाम पर खेजड़ा, नीम, बबूल और बेर की झाडि़यों की ही कल्पना की जा सकती है, वहां कोलायत जी के सरोवर में श्वेत कमलों को खिलते देखना मेरे लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था।
पिछले शताधिक वर्षों में बीकानेर अपने पारिस्थितिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक वातावरण के लिहाज से काफी कुछ बदला है पर उसकी मूल प्रकृति, जो शौर्य और कलासंपन्नता के साथ-साथ सांप्रदायिक सद्भाव की है, जस की तस रही है। बीकानेर का जन्म किस तरह हुआ इसकी लोकश्रुत कथा आगे कहूंगापर अभी जरा कोलायतजी की बात कर लूं।
कोलायतजी बीकानेर के दक्षिण पश्चिम में स्थित है। यहां कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को मेला लगता है। मेले में हजारों श्रद्धालु एकत्रित होते हैं जिनमें साधारणजन के अलावा नागा सन्यासी, त्रिदण्डी सतनामी आदि अनेक संप्रदायों के लोग भी होते हैं जो मिलकर कपिल महामुनि की समाधि की पूजा-अर्चना करते हैं। यहां एक विशाल सरोवर है जिसका उल्लेख पुराणों में बिन्दु सरोवर के नाम से मिलता है।लोकश्रुति है कि समुद्र के पीछे हट जाने अथवा सूखजाने से यह भूमि मरु में परिवर्तित हो गई। पहले इस भूमि पर कभी सरस्वती नदी प्रवाहित हुआ करती था। वह नदी तो अंतःसलिला बन चुकी पर राजस्थान में वर्षा-जल के भंडारण तथा संरंक्षण की जो पारंपरिक प्रविधियां शताब्दियों से प्रचलित रही हैं वे आज भी दुनिया को चमत्कृत करती हैं। पर्यावरणविद् श्री अनुपम मिश्र तथा राजेन्द्र सिंह के व्याख्यानों में राजस्थान की अनूठी जलसंरक्षण  प्रविधियों का उल्लेख कई बार हुआ है।
कोलायतजी में जिस बिंदु सरोवर का उल्लेख मैंने किया, उसी के किनारे पर परमयोगी सांख्याचार्य महामुनि कपिलदेव जी का मंदिर है। (तदवीरासीत पुण्यतम क्षेत्रं त्रैलोक्य विश्रुतम/नाम्ना सिद्धिपदं यत्र सा संसिद्धिमुपेयुषी/तस्मिन बिन्दुसरेवासीत् भगवान कपिलः किल। (श्रीमद्भागवत महापुराण)
ऐसी मान्यता है कि मां देवहुति को कपिलदेव जी ने इसी स्थान पर सांख्य दर्शन का उपदेश दिया था। (यः करुणाकरः कृपालु भगवान कपिलाः स्वकीये अत्यल्पे वयसि स्व मात्रये/देवहूत्यै जगदुद्धारकारकं सांख्ययोगं च सविस्तरम प्रोवाच उपदिष्टवान।(संदर्भ – वही)
धार्मिक दृष्टि से परे अब पर्यटन दृष्टि से भी कोलायतजी एक महत्वपूर्ण स्थान बन चुका है। वहां की प्राकृतिक सुंदरता सभी को आकर्षित करती है। वापस आते हुए कोडमदेसर रास्ते में ही था इसलिए वहां भी जाना हो गया। कोडमदेसर वही जगह है जहां बीकानेर के जन्मदाता राव बीका जी ने अपनेे पिता जोधपुर नरेश राव जोधा सिंह की व्यंग्योक्ति से आहत होने के बाद चाचा राव कांधाल के सहयोग से नया राज्य स्थापित कर अपने को राजा घोषित किया था।
इस संदर्भ में श्री गोपाल नाराण व्यास अपने लघु शोधग्रंथ .बीकानेर की साहित्यक संस्थाएं और उनकी हिंदी को देनमें इतिहासकार कैप्टेन पी. डव्ल्यू. पावलेट तथा गोरी शंकर हीराचंद ओझा द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के आधार पर इस घटना  का रोचकता के साथ उल्लेख करते हैं -
‘‘जोधपुर के राव जोधा अपने दरबार में अपनी सभा लगाए बैठे थे, उसी समय जोधा के पुत्र राव बीकाजी दरबार में कुछ देर से पधारे और आते ही अपने चाचा कांधलजी के कानों में धीरे-धीरे कुछ कहने लगे उनकी इस गुप्त मंत्रणा को देख कर जोधा जी ने पुत्र की हंसी उडाते हुए कहा कि आज तो चाचा भतीजे में गहरी सलाह हो रही है। क्या किसी नए राज्य की स्थापना की तैयारी हो रही है? बस फिर क्या था उसी दिन पिता के ताने से मर्माहत होकर राव बीका और उनके चाचा कांधलजी ने नए राज्य की स्थापना का दृढ़ निश्चय कर लिया।
दोनों वीरों ने सौ घोड़े और पांच सौ राजपूतों की एक सेना का संगठन किया एवं 30 सितंबर 14650 को जोधपुर से रवाना हुए। रास्ते में प्रथम पड़ाव मंडौर में डाला। वहां से वे देशनोक पहुंचे जहां उन्हें मां करणी के दर्शन हुए। उनका आशीर्वाद प्राप्त कर उनके आदेश के अनुसार दोनों ही वीर ससैन्य चण्डीसर में निवास करने लगे। कुछ दिनों बाद राव बीका कोडमदेसर पहुचे एवं अपने आपको राजा घोषित किया ....... सन 1478 में राव बीकाजी ने कोडमदेसर में एक गढ़ बनवाना आरंभ किया, किंतु उनका यह कार्य भाटियों को रुचिकर नहीं लगा। फलतः इन्हें भाटियो से युद्ध करना पड़ा। बीका जी विजित अवश्य हुए किंतु भाटियों की छेड़छाड़ बंद नहीं हुई। कांधलजी की सलाह से बीकाजी एक सुरक्षित गढ़ के निर्माण की योजना में थे जिसके फल स्वरूप आपने नापा सांखला से सलाह लेकर नये किले की नींव 14850 में राती घाटी पर डाली। इस किले के अवशेष आज भी हमें वर्तमान किले से दो मील दक्षिण-पश्चिम में दिखाई देते हैं। इसी किले के आस-पास बीकाजी ने 12 अप्रेल सन् 1488 को अपने नाम पर बीकानेर नगर बसाया।’’
बीकानेर स्थापना विषयक एक दोहा भी प्रसिद्ध है - पनरै से पैतालवे सुद वैशाख सुमेर/थावर बीज थरप्पियों बीके बीकानेर। पावलेट ने भी इसी प्रकार का उल्लेख गजेटियर ऑफ द बीकानेर स्टेट’ में किया है।
इस घटना से थोड़ी भिन्न एक घटना और भी सुनने में आती है। वह यह है कि जब राव बीकाजी अपने चुने हुए सैनिकों के साथ कोडमदेसर पहुंचे तो उनकी भेंट नेरिया जाट से हुई जो वहां अपनी बकरियां चरा रहा था। जब राव बीका जी ने गड़रिये को अपना मंतव्य बताया तो गड़रिया बोला- मैं आपको वो स्थान बता सकता हूं जो नए राज्य को स्थापित करने के लिए सबसे उपयुक्त है। लेकिन नए राज्य के साथ आपको मेरा नाम भी जोड़ना होगा। राव बीकाजी ने उसकी शर्त मान ली। तब नेरिया जाट राव बीकाजी को लेकर राती घाटी पहुंचा और एक स्थान पर जाकर कहा कि यही उपयुक्त स्थान है। राव बीकाजी ने नेरिया की सलाह मानकर उसी स्थान पर बीकानेर राज्य स्थापित करने के आदेश दे दिए। नेरिया जाट को दिए बचनानुसार प्रथम दो अक्षर स्वय के नाम से और अंतिम दो अक्षर नेरिया के नाम से लेकर राज्य का नामकरण बीकानेरकर दिया।
इन लोकश्रुतियों से आगे चलें तो एक बात यह भी प्रमाणित हो चुकी है  कि बीकानेर में वहां के सामंतशाहों रावराजाओं का साहित्य तथा कला के संबर्द्धन और संरक्षण में महत्वपूर्ण हाथ रहा है ख़ासकर राव कल्याणमल जी के पुत्र पृथ्वीराज (डिंगल भाषा की कृति-‘बेलि किसन रुक्मणि री’के प्रणेता) राव अनूप सिंह, राव गंगासिंह तथा राव शार्दूलसिंह जी का जो स्वयं भी साहित्य रचना किया करते थे। बीकानेर स्थित विश्व प्रसिद्ध अनूप संस्कृत लायब्रेरीराव अनूप सिंह की ही देन हैं। हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं में राजस्थान भारती तथा वातायन जैसी पत्रिकाओं ने  भी बीकानेर का गौरव बढ़ाया है । धर्मवीर भारती जिस तरह धर्मयुग का पर्याय बन गए थे ठीक उसी तरह हरीश भादानी भी वातायन का पर्याय बन चुके थे। उन जैसे प्रगतिशील कवि का चला जाना हिंदी साहित्य के लिए कम क्षति नहीं थी।
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बीकानेर में मेरा निवास ज्यादातर कोटगेट से लगी दाऊजी रोड पर गोस्वामी चौक ही रहा। यहां मेरी ननिहाल भी है और ससुराल भी। चौक के लोग बताते हैं कि बीकानेर की बसावट करते समय सामंतशाहों ने वहां अलग-अलग जातियों और वर्गो को बसाने के लिए विशिष्ट स्थान प्रदान किए हुए थे और कुछ लोगों ने स्वयं भी अपने सजाति वर्ग के बीच बसने का निर्णय ले लिया था। मोहता चौक, मूंधड़ों का चौक, तेलीबाड़ा, गोस्वामी चौक आचार्यो का मोहल्ला, रामपुरियों का मोहल्ला जैसे नाम इसी ओर संकेत करते है पर बीकानेर में अनेक लोगों के रहने के बावजूद सांप्रदायिक सदभावना का माहौल हर समय बना रहा यह कोई कम बड़ी बात नहीं है।
अपने गोस्वामी चौक की बात करूं तो मेरी अपनी अनेक यादे हैं जो वहां से जुड़ी हुई हैं, हालांकि आज का गोस्वामी चौक अब पुराना वाला गोस्वामी चौक नहीं रहा पूरे बीकानेर में फैली पाटा संस्कृति का चलन गोस्वामी चौक में भी बहुत समय तक रहा पर अब नई पीढ़ी के साथ यह सब लुप्त हो गया है। मेहरावोंदार पत्थर की चैखटें और छोटी ऊंचाई के दरवाजों वाले हवेलीनुमा मकानों की शक्ल-सूरत बदल गई है और मुख्य दरवाजों के आगे लगे पत्थर के ही पाटे भी इक्के-दुक्के रह गए हैं।
विगत बीस-तीस वर्षो में बिखरी मेरी स्मृतियां गोस्वामी चौक के जिन व्यक्तियों से जुड़ी हैं उनमें कार्टूनिस्ट पंकज गोस्वामी, सुधीर तैलंग सुधीर गोस्वामी अनूप गोस्वामी, संकेत गोस्वामी, लेखक-पत्रकार-कथाकार अशोक आत्रेय, प्रकाश परिमल, शशिकांत गोस्वामी, गोपी बल्लभ गोस्वामी, इंदूभूषण गोस्वामी, हमारे समय के प्रख्यात कवि और कलामर्मज्ञ हेमंत शेष, सभी शामिल हैं। इनमें से अनेक लोग वृत्ति के कारण अब या तो राजस्थान में अन्यत्र बस गए हैं या कुछ दिवंगत हो चुके हैं। ये प्रतिभा संपन्न व्यक्ति भी साहित्य सरोवर के खिलते श्वेत कमलों की भांति ही हैं।
गोस्वामी चौक की बात चली है तो यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि वह कार्टूनिस्टों का भी गढ़ रहा है। अपनी ओर से ज्यादा कुछ न कह कर मैं विकीपीडिया से कुछ पंक्तियां यहां साभार प्रस्तुत करना चाहूंगा-
‘‘ एक ही शहर के एक ही मोहल्ले में पचासों कार्टूनिस्ट एक साथ सक्रिय हों यह बात सुनने में अजीब तो है पर सच है। अकेले बीकानेर शहर के गोस्वामी चौक ने हिंदी पत्रकारिता को शताधिक व्यंग्यकार दिए हैं जिनके व्यंग्यचित्र अक्सर समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के माध्यम से पाठकों का ध्यानाकर्षित करते आ रहे हैं। व्यंग्यचित्र-कला को विस्तार देने में बीकानेर में अकेले दक्षिणात्य प्रवासी तैलंग समाज के कुछ व्यंग्य चित्रकारों का हिंदी की व्यंग्यचित्र कला के विकास में अनूठा योगदान रहा है।
कार्टून के Xक्षेत्रों में पद्मश्री सुधीर तैलंग, पंकज गोस्वामी, संकेत, सुधीर गोस्वामी इंजी’, सुशील गोस्वामी, शंकर रामचंद्रराव तैलंग, अनूप गोस्वामी आदि कई कलाकार हैं जिन्होंने न केवल इस कला को परवान चढ़ाया अपितु अपनी कला-साधाना से वैयक्तिक ख्याति भी अर्जित की। हिंदी क्रिकेट कमेंटेटर प्रभात गोस्वामी के कार्टून भी लगभग एक दशक पूर्व विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। इन दिनों राहुल गोस्वामी, अवनीश गोस्वामी, अलंकार गोस्वामी जैसे अनेक युवा व किशोर कलाकार लगभग अज्ञिप्त रह कर बतौर अभिरुचि व्यंग्यचित्र के मैदान में तूलिका चला रहे हैं।
                एक समय वह भी था जब संभवतः कार्टूनिस्ट पंकज गोस्वामी के प्रभाव और प्रेरणा से व्यंग्यचित्रा कला को ले कर बीकानेर के प्रसिद्ध गोस्वामी चौक में एक तूफानी उत्साह का दौर आ गया था, जब वहां का हर दूसरा तीसरा युवा व्यंग्यचित्र बनाता और छपवाता रहा था। इसी बात से प्रभावित हो कर विनोद दुआ ने बीकानेर के गोस्वामी चौक में बनाए जा रहे कार्टून और उनके कलाकारों पर केंद्रित एक रोचक वृत्तचित्र का निर्माण किया था.जिसका प्रसारण दूरदर्शन के विभिन्न चैनलों पर हुआ था’’
गोस्वामी चौक से आगे चलें तो बीकानेर के साहित्यिक क्षितिज पर यादवेन्द्र शर्मा चंद्र, नंदकिशोर आचार्य, मालचंद तिवाड़ी, हरदर्शन सहगल, बुलाकी शर्मा जैसे नामीगिरामी लेखक-चिंतक भी हैं जिन्होंने राजस्थानी तथा हिंदी दोनों भाषाओं को अपनी रचनाओं से समृद्ध किया है।  इस बार की यात्रा में हरदर्शन सहगल से मिलने उनके निवास के आस-पास पहुंचा तो पर मिलना संभव न हुआ, सिर्फ़ फोन पर ही बात हो सकी। उनकी आत्मकथा डगर-डगर पर मगर  रचनाकार की वेबसाइट पर पढ़ चुका था। हरदर्शन लेखन के प्रति किस तरह समर्पित हैं इसकी झलक उनके संस्मरण के इस अंश में बखूबी देखी जा सकती है -
‘‘... एक साहित्यिक कार्यक्रम में मुझे अध्यक्ष/मुख्यअ तिथि के रूप में बुलाया था और जैसा कि होता है, एक करोड़पति को भी। अभी हम मंच पर नहीं बैठे थे। उन्होंने बात-चीत शुरू कर दी- तो आप ही सहगल साहब हैं। आप को लिखने का शौक कब शुरू हुआ। न जाने मुझे क्या हुआ। मैं चिढ़ गया। बोला क्यों, यह शौक है ? उन्होंने जवाब में वही कहा-हां शौक ही तो होता है। अब की बार मेंने सहज होकर पूछा- क्या आप शौकिया सांस लेते हैं। शौकिया खांसते हैं। शौकिया गुस्सा होते है। अगर हां तब मैं भी शौकिया लिखता हूं, वरना लेखन मेरे जीवन का अंग है। कई लोग मुझ से पूछते हैं कि आपने लिखना कब से शुरू किया ? तो मेरा उत्तर होता है- जब दो साल का था तभी से लिख रहा हूं।...’’
यादवेन्द्र शर्मा चंद्र तो बहुत पहले चले गए पर उनकी एक दो आत्मीय स्मृतियां मेरे बीकानेर प्रवास में मुझे बार-बार विचलित करती रहीं। चंद्र जी एक दो बार मेरे दिल्ली स्थित निवास पर आए थे और अपने साहित्यिक संस्मरणों से हमें खूब समृद्ध करते रहे। इन संस्मरणों में उनके कुछ प्रकाशकों की बेईमानियों का भी उल्लेख था। जहां तक मेरी स्मृति साथ देती है। तब उनका कोई बेटा शायद शाहदरा के आसपास रहता था। चंद्रजी को ले कर मैं एक बार अपने लेखक मित्रा डा.प्रकाश मनु के फरीदाबाद स्थित निवास पर गया था। योजना यह थी कि चंद्रजी का एक लंबा साक्षात्कार लिया जाए और ऐसा हुआ भी। प्रकाश मनु ने मेरे साथ चंद्रजी से लंबी बातचीत की। एहतियातन मैं एक टेपरिकार्डर अपने साथ ले गया था पर दुर्घटना यह हुई कि जब बातचीत की जा रही थी तो पड़ोस में किसी शादी का शोर-शराबा कुछ ज्यादा ही हो रहा था। दूसरे कहीं कुत्तों का भी वाक्युद्ध चल रहा था जिसके चलते जब मैंने टेप को प्ले किया तो सिर पीट कर रह गया। वो तो भला हो प्रकाश मनु का जिन्होंने इस पूरी अलिखित बातचीत को सिलसिलेवार अपनी स्मृति से समेटा। बाद में वह साक्षात्कार मणिका मोहिनी द्वारा संपादित पत्रिाका वैचारिकी संकलन में विस्तार से छपा।
चंद्रजी जिस तरह के जिंदादिल इंसान थे वैसे बहुत ही कम लोग मुझे देखने को मिले। जब मिलते तो अपनी एक किताब अवश्य दे कर जाते। अपने गुलाबड़ी उपन्यास, जिस पर अशोक चक्रधर ने टेलीफिल्म बनाई, और अपनी चर्चित कहानियों की प्रतियां उन्होंने बड़े ही स्नेह से मुझे  दी थी। उनके पास गहन अनुभव थे, अनेक लेखकों के अनंत किस्से थे और लिखने की अपार ऊर्जा थी जो सभी को प्रेरित करती थी हालांकि आलोचकों ने उनके लेखन को उस गंभीरता से नहीं लिया जैसी अपेक्षा की जानी चाहिए।
हरदर्शन सहगल का अशोक आत्रेय से भी घनिष्ठ संबंध रहा है और उन्होंने अपने संस्मरणों में भी इसका विस्तार से उल्लेख किया है। एक अंश यहां प्रस्तुत कर रहा हूं - ‘‘अशोक ने गर्मजोशी से मुझसे हाथ मिलाया। और तत्काल मेरे साथ, अजय (अब्दुल गफूर अजय) ही की भांति, अग्रवाल क्वारर्टज वाले घर चल पड़ा। अजय वहीं रह गया। अजय ने मुझे अशोक के बारे में बताया था कि बहुत शानियर है। सिर्फ नई भाषा नए शिल्प की दुहाई देकर कथ्य विहीन कहानियों के दम पर अपने को बहुत बड़ा लेखक समझता है। - मगर फिर हाथों हाथ छपता क्यों  हैं ? मैंने अपने से पूछा। कुछ बात तो जरूर होगी, इस शख्स में। फिर एकदम से ऐसे मिल रहा है जैसा पुराना दोस्त हो। इससे जरूर लेखन के संबंध में पता चलेगा।
अशोक घर पर पहुंचते ही, मुझसे मेरी कहानियां सुनने को लालायित दिखा। कहने लगा- आपकी शैली में कुछ खास है। वाह एक ही वाक्य में तीन-तीन विचार। इसे तो मानना पड़ेगा। पर प्रस्तुतीकरण आज की कहानी से जरा दूर पड़ता है। फिर कहने लगा- अजय वजय के चक्कर में मत पड़ना। ये लोग पुरानी परिपाटी को घसीट रहे हैं। कहानियों के शीर्षकों को ही देख लो बहन की भाभी’ ‘भाभी की बहन’ ‘ईमानदार दुकानदार। फिर हंसने लगा। दूसरी बात उसने अजय वाली सी बताई थी कि यह लोग कोई साहित्यकार नहीं है। साहित्य की राजनीति करते हैं। दरअसल ये साहित्यिक गुंडे हैं। बाद में मैंने स्वयं देखा था कि अशोक ऐसे लोगों के मुंह पर उन्हें खरी-खरी सुना आया करता था कि तुम काहे के लेखक हो। तुम जिस पत्रिाका @ अखबार में दो कोड़ी के लिए लगे हो अगर तुम में स्वाभिमान जैसी कोई चीज है तो रिजाइन कर आए होते।
अशोक जैसे मेरा लंगोटिया यार हो गया। हां थोड़ी शान मारने से बाज नहीं आता। मैं कहता इतनी शान मारना तो इसका अधिकार होना चाहिए। जब कल्पना, माध्यम नई कहानियां जैसी पत्रिाकाओं में गल्पभारती कलकत्ता, रमेश बख्शी की आवेश जैसी पत्रिाकाओं में धड़ाधड़ छप रहा है तो इस नौजवान में थोड़ी अकड़ तो आएगी ही ना। इस अकड़ को बर्दाश्त  करो। और इससे कुछ सीखो। वह उम्र में मुझ से कुछ कम था। वह मुझे तथा मेरी पत्नी को बड़ा होने के नाते भी बहुत सम्मान देता। मैं कभी गाड़ी में जाता तो मेरा सामान भी उठाने में जैसे गर्व करता। फिर अशोक के साथ कुछ और युवक भी मेरे यहां आने लगे। जैसे शशिकांत गोस्वामी, पूर्णेन्दुे गोस्वामी। गोस्वामी की तो भरमार थी। गोस्वामी चौक में ही रहते थे। इनके अतिरिक्त सूरज करेशा, प्रमोद आदि। यह अशोक आत्रेय का प्रभामंडल था। वह कुछ चेले चाले भी बनाए रखने में विश्वास रखता था। उसके प्रशंसक भी शहर में काफी थे। खास तौर से उसके बड़े भाई साहब प्रकाश परिमल। वे विद्वान कलावादी, नई से नई कथावस्तु के पक्षधर थे। ये सात भाई थे। असल में गोस्वामी थे। पर तखल्लुस अलग-अलग। कोई प्रखरभी थे। कुछ भाई जयपुर आदि भी जा बसे थे। सभी गोस्वामी किसी न किसी कला के साधक थे। शाम के समय गोस्वामी चौक में खासी गहमागहमी रहती थी। बीच में एक मंदिर है। कोई मन्दिर जाकर गा रहा है। कोई पाटे पर बैठा सितार हारमोनियम बजा रहा है। धीरे धीरे मेरे परिचय का दायरा बढ़ता चला गया। किंतु मैं ठहरा एक संकोची जीव। अपने को छोटा नगण्य और दूसरों को बड़ा साथ ही विद्वान मानने वाला। खूब गोष्ठियां होतीं कभी यहां तो कभी वहां। वहां पर, अगर, मेरी ड्यूटी आड़े नहीं आती, तो कुछ सीखने के उद्देश्य से अवश्य  पहुंचता। परन्तु अशोक आत्रेय वाला आत्मविश्वास कहां से लाऊं ? सो दुबक कर पीछे कहीं सबकी नजरों से खोया सा रहता।’’
अशोक आत्रेय ही क्या, इस बार मेरा मन तो बहुत लोगों से मिलने का था पर जैसा कि हरदर्शन सहगल ने भी लिखा है, प्रकाश परिमल, अशोक आत्रेय, लक्ष्मण सौमित्र, हेमंत शेष, ये सभी अब जयपुर में बसे हुए हैं अस्तु यह इच्छा बीकानेर की इस यात्रा में पूरी नहीं हुई। हां, शशिकांत गोस्वामी से अवश्य मुलाकात हुई। एक जमाना था जब शशिकांत गोस्वामी की कहानियां सारिका में बडी सजधज के साथ छपती थीं और बीकानेर के युवा कथाकारों में उनका नाम चर्चित हो गया था। कमलेश्वर ही नहीं, उन्हें अज्ञेय का भी सान्निध्य और स्नेह मिला। आजकल शशि गोस्वामी चौक में ही रह रहे हैं। रेडियों-दूरदर्शन के लिए भी उन्होंने काफी लिखा पर लगता है अब उनका लेखन थम सा गया है। काश यह प्रतिभावान कथाकार पहले की तरह आज भी सतत रचनारत रहता तो हिंदी साहित्य को और भी बहुत कुछ श्रेष्ठ दे पाता। 000
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रमेश तैलंग
संपर्क ः
09211688748



 गुज़रा ज़माना : गर्भनाल से साभार 

Sunday, October 25, 2015

एक धुनी, और गुनी साहित्यकार की सोहबत में पच्चीस वरस

गुज़रा ज़माना –गर्भनाल से सभार




प्रख्यात कवि, कथाकार, आलोचक तथा बालसाहित्यकार डा. प्रकाश मनु से मेरी मुलाकात 1989 के आसपास कस्तूरबा गान्धी मार्ग- नई दिल्ली स्थित हिंदुस्तान टाइम्स हाउस के तृत्तीय तल पर हुई थी और वह भी मेरे वरिष्ठ साहित्यकार मित्र देवेंद्र कुमार (नंदन पत्रिका के तत्कालीन सहायक संपादक) के माध्यम से। तीनों के मिलने का नतीजा था हिदी के नये बालगीत जिसमें हम तीनों मित्र कवियों की चुनी हुई बालकविताएं शामिल थीं। इसका प्रकाशन हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा दी गई अनुदान राशि से संभव हुआ था और इस पुस्तक के आवरण सहित सभी मनमोहक चित्र प्रख्यात चित्रकार, लेखक, हरिपाल त्यागी ने बनाए थे
त्यागीजी के सादतपुर निवास पर जाने के लिये प्रकाश मनु के साथ तब मैने काफ़ी पदयात्रा की थी। हालांकि त्यागी जी से हमारी यह पहली मुलाकात थी पर उन जैसे सरलचित्त कलाकार से मिलकर हमें अच्छा बहुत लगा था उन्होंने अपनी कुछ कलाकृतियां भी हमें दिखाई थीं और दाल-रोटी का स्वादिष्ट देसी भोजन भी कराया था। यह एक संयोग ही था कि उस दिन वहां बाबा नागार्जुन भी आ गए थे और  उनसे सभी की बतकही शुरु हो गई थी। मैंने अपनी डायरी उनके सामने रखते हुए कहा था -बाबा आप इसमें अपनी हस्त्लिपि में कुछ लिख दीजिये तो उन्होंने स्नेहवश अपनी एक मशहूर कविता की तीन पंक्तियां लिख दीं – अगर कीर्ति का फल चखना  है, कलाकार ने फिर-फिर सोचा,  आलोचक को खुश रखना  है
       कुल मिलाकर यह एक सुखद दिन बीता था। प्रकाश मनु से हुई एक-दो मुलाकातों में ही मुझे लगने लगा था कि मनु अतिवादी व्यक्ति हैं। मेरी यह धारणा आज भी कमोबेश रूप में बरकरार है। चाहे लिखने की ऊर्जा हो या फ़िर बोलने की, चाहे आक्रोश की मुद्रा हो  या फ़िर विनम्रता की, चाहे फ़कीराना वेशभूषा हो या फ़िर शाहाना (शाहाना शब्द से यहाँ जिसको कछु नहीं चाहिये वह है शहंशाह वाला भाव ग्रहण करें तो आसानी होगी) मनु अपनी उपस्थिति का एहसास सामने वाले को अवश्य कराते रहते हैं। आज के तथाकथित भद्र समाज में  करीब-करीब मिसफ़िट मनु देखने-दाखने मे सचमुच फ़िट लगते हैं पर उनके पूरे व्यक्तित्व को समझना टेढ़ी खीर है।  वे क्षणे तुष्टा-क्षणे रुष्टा की मुद्रा साधे रहते है। आक्रोश निकालते हैं तो सामने वाले को बोलने भी नहीं देते और विनम्र होते हैं तो उन्हें खोजने के लिए सूक्ष्मदर्शी की ज़रूरत पड़्ती है।
मनु ने उपन्यास, कहानी, कविता, आलोचना, और बालसाहित्य सभी विधाओं मे विपुल लेखन किया है। पर मेरी अपनी दृष्टि में मनु का गद्य उनकी कविताओं से ज्यादा प्रभावित करता है। इसका यह अर्थ नहीं कि उनकी कविताएं सामान्य स्तर की हैं पर गद्य में वे कविताओं से ज्यादा खुलते है, खासकर अपनी तेजतर्रार समीक्षाओं में जिनके कारण उन्होंने न जाने कितने स्वनामधन्य साहित्यकारों को कुपित किया। समीक्षा कर्म कोई बहुत भला काम नहीं। अच्छी-बुरी, हल्की-भारी सभी तरह की रचनाओं को पढ़ना पड़ता है और स्वयं की रचनात्मकता की भी बलि देनी पड़ती है। मनु ने एक बार बताया था कि शैलेश मटियानी की भारी-भरकम किताब बर्फ़ की चट्टानें पर समीक्षा लिखने के लिए एक प्रतिष्ठित पत्र ने (जो दुर्भाग्य से अब बन्द हो चुका है) सिर्फ़ पचहत्तर रुपये भेजे थे। एक किताब, जिसको पचाने में मनु ने अपनी तीन रातें जलाकर खाक कर दीं उसका पारिश्रमिक एक संपन्न घराने के पत्र द्वारा पचहत्तर रुपये आंकना आश्चर्य में डालता है। पर एक तरह से यह उन पत्रों से ठीक था जो संसाधनों तथा आर्थिक स्रोत के होते हुए भी लेखक के पारश्रमिक को दबा जाते हैं। खैर, यह एक इतर विषय है और इस पर चर्चा करना यहाa समीचीन नहीं है।
       मनु के बारे में, उनके अंतरंग मित्रों की धारणा है कि वे किसी काम पर जुटते हैं तो धुनी की तरह जुटते हैं। देवेन्द्र सत्यार्थी पर किया गया उनका काम  इसका प्रमाण है। कहने को सत्यार्थी जी पर प्रकाशित उनकी अनेक पुस्तकें संपादित हैं पर उनमें लिखी गईं लंबी-लंबी भूमिकाएं स्वयं में एक किताब से कम नहीं  जो सत्यार्थी जी के अंतरंग जीवन की कितनी ही अंधेरी-उजली परतें उघाड़ती हैं। हालांकि मनु ऐसा कोई दावा नहीं करते पर देवेन्द्र सत्यार्थी के साहित्य को पुनर्जीवित करने में निश्चित रूप से मनु की बहुत बड़ी भूमिका रही है। एक बार जब उनसे पूछा गया कि वे सत्यार्थी जी पर कब तक लिखते रहेंगे तो उनका कृतग्यता भाव से भरा उत्तर था – जीवन भर!
       मनु को उनके वयस्कसाहित्य तथा बाल-साहित्य दोनों के लिये अनेक शीर्ष पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है पर आरंभ से ही वे पुरस्कारों से (खासकर सरकारी संस्थाओं के या फ़िर उन गैरसरकारी संस्थाओं के जो आदान-प्रदान की छद्म नीति की आड़ में पुरस्कृत करते हैं) बचते रहे हैं! उनकी काव्यकृति छूटता हुआ घर को जब स्व- गिरिजा कुमार माथुर की स्मृति में स्थापित प्रथम पुरस्कार के लिये चुना गया तो मनु को यूं लगा जैसे पुरस्कार के लिए उन्हें घेर लिया गया हो। आनन-फ़ानन में उन्होंने घोषणा कर डाली कि वे इस पुरस्कार की संपूर्ण राशि का दबे-पिसे, संघर्षशील नये कवियों के काव्यसंकलन को प्रकाशित करने के लिये उपयोग करेंगे और उन्होंने सदी के आखिरी दौर में (जो दस नये, लगभग अनजान कवियों की कविताओं का संकलन था) निकाल कर ऐसा किया भी।
       मनु का पहला उपन्यास ये जो दिल्ली है जब लिखा जा रहा था तो उनसे उपन्यास की विषयवस्तु, पात्रों तथा उपन्यास के परिवेश पर घंटों का संवाद मेरी स्मृति में अभी भी ताजा है। सत्यकाम, राजधानी प्रेस और न जाने कितने नामों की सीढियां लांघता अंत में ये जो दिल्ली है पर आकर अटक गया यह उपन्यास। धराशायी होते पत्रकारिता के मूल्यों और मानदंडों पर लिखा गया यह एक विवादास्पद उपन्यास साहित्यिक अखाड़ेवाजी में उस तरह चर्चित नहीं हुआ जिस तरह होना चाहिए था। ऐसा नहीं कि मनु को इस सबसे पीड़ा नहीं होती पर वे इसे प्रकट न करते हुए एक मुकाम पर पहुंचने के बाद दूसरे की खोज में निकल पड़ते हैं। यही कारण है कि लाख निराशाओं के बीच घिरे रहने के बावजूद वे हताश नहीं होते।
उनके बाद के दो उपन्यास कथा सर्कस, और पापा के जाने के बाद भी, जो क्रमश: साहित्य एवं कलाजगत में व्याप्त अनेक चालाकियों पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी तथा एक संघर्षशील कलाकार के स्वाभिमान तथा मृत्योपरांत उसकी पारिवारिक पीड़ा को मार्मिकता से अभिव्यक्त करते है, आज लगभग गुमनामी का दंश झेल रहे हैं।
       मनु ने अपनी साहित्यिक यात्रा के बीच अनेक नामी-गिरामी साहित्यकारों के साक्षात्कार लिये हैं जो मणिका मोहिनी के सम्पादन में निकल रही पत्रिका वैचारिकी संकलन में प्रकाशित हुए थे। बाद में इनका प्रकाशन मुलाकातें नाम से अभिरुचि प्रकाशन द्वारा पुस्तक रूप में भी हुआ। इनमें से कुछ मुलाकातों में मैं भी मनु का सह्भागी और साक्षी रहा। मुझे याद है, एक बार सन 1996 में हम दोनों जगदीश चतुर्वेदी का साक्षात्कार लेने उनके लारेंस रोड नई दिल्ली स्थित निवास पर गए थे। पूरा दिन बिताकर जब हम शाम को पांच बजे उठे तो सोचा, चलो, अब हम दोनों ठीक समय पर अपने-अपने घर पहुंच जाएंगे। लेकिन मनु जी कमरे से निकलते-निकलते भी दरवाजे पर ही घंटों बतियाते रहे और मेरी टोका-टोकी को नजर अंदाज करते रहे। समय निकलता गया और जब हम चतुर्वेदी जी के निवास से बाहर आए तो मनु जी को चिंता लगी कि हज़रत निज़ामुद्दीन पहुंचने तक उनकी फ़रीदाबाद जाने वाली  आखिरी लोकल ट्रेन भी कहीं न निकल जाए। और फ़िर हुआ भी वही। अब उन्हें अपनी पत्नी सुनीता तथा दो बच्चियों के घर पर अकेले होने की चिंता लग गई। आखिर अपने आग्रह पर मैं उन्हें उस रात्रि, ये आश्वस्ति देकर कि सुबह_सुबह मैं उन्हें फ़रीदाबाद की पहली गाड़ी पकड़ा दूंगा, अपने घर शकरपुर ले आया। भोजनोपरांत जब हम बिस्तर पर पड़े तो मनु जी शायद ही पूरी रात सो सके हों। सुनीता का बच्चियों के साथ अकेले रहना उन्हें लगातार चितित कर रहा था। ठंड का मौसम था, सुबह कोहरा बना हुआ था पर मनु जी ने मुझे ठीक पांच बजे उठा दिया. हाथ मुंह धोकर मैं उन्हें वेस्पा स्कूटर पर बैठाकर मिन्टो ब्रिज स्टेशन के लिये निकल पड़ा. सर्दी के कारण हाथ लकड़ी की तरह अकड़े जा रहे थे। राउज अवेन्य़ु (दीनदयाल उपाध्याय मार्ग) पर सड़क के बीच मैनहोल सतह से नीचे होने के कारण स्कूटर कई बार उछलता जा रहा था, और आसपास कुछ वाचाल कुत्ते भी भूंक रहे  थे। बहरहाल, हम किसी तरह गंतव्य पर पहुंचे और मनु जी ने सुबह-सुबह की अपनी गाड़ी पकड़ी। इस बात का हमें संतोष हुआ था पर सर्दी के कारण उस कोहरीली सुबह में मेरी जो हालत हुई थी उसके लिये मैं मनु जी को आज भी कुछ कोफ़्त के साथ याद करता हूं।
       लेकिन उनका आभारी भी हूं कि साहित्य की दुनिया में थोड़े-बहुत पैर जमाने मे जिन शख्सियतों ने मेरी मदद की उनमें देवेन्द्र कुमार और प्रकाश मनु दो मित्रों का बहुत बड़ा हाथ रहा है। हम तीनों ने हिंदुस्तान टाइम्स हाउस के आसपास एक साथ इतनी दोपहरें और शामें बिताई हैं कि हमारा आत्मिक संबन्ध अनेक अंतर्विरोधों के बावजूद आज भी यथावत अटूट बना हुआ है।
देवेंद्र सत्यार्थी मनु के कथागुरु रहे हैं और मनु उनके स्नेह्भाजक भी। मनु के ज़रिये ही मेरी भी सत्यार्थी जी से उनके जीवन काल में यदा-कदा भेंट हुई है। एक बार दुर्ग से प्रकाशित सापेक्ष पत्रिका के संपादक महावीर अग्रवाल के आग्रह पर मुझे सत्यार्थी जी से कबीर पर साक्षात्कार लेना था। ज़ाहिर है कि यह कार्य मनु के सहयोग से ही संपन्न हो सका था। उन्होंने सलाह दी थी कि सत्यार्थी जी से सीधे-सीधे सवाल-जवाब की आशा मत रखना  बल्कि उन्हें अपने आप ही बोलने देना। फ़िर उसी में से सवाल-जवाब बना लेंगे। मनु जी की बात को ध्यान में रखते हुए मैं सत्यार्थी जी के रोहतक रोड स्थित निवास पर जा पहुंचा। सत्यार्थी जी उस समय बीमार चल रहे थे और उन्हें ज्यादा बोलने में भी तकलीफ़ हो रही थी। सत्यार्थी जी की पत्नि श्रीमति शांति सत्यार्थी, जो लोकमाता के नाम से प्रसिद्ध थीं, उनकी सेवा-सुश्रूषा में लगी थीं। ऐसे माहौल में वह साक्षात्कार शुरु हुआ और मनु जी की चेतावनी भी वहीं सच हो गई। बीच-बीच में वह बोलते हुए पटरी से उतरते रहे और कबीर की जगह वह मुझे लाहौर की अनारकली की सैर कराते रहे, डा. इकबाल और साहिर के किस्सों के बीच घुमाते रहे। जब मैंने उन्हें कबीर के बारे में चेताया तो बोले –हां मै उन्हीं के बारे में ही कह रहा था.... और फ़िर ये अनोखा साक्षात्कार आदिग्रंथ तथा खुशबंत सिंह के संदर्भों के साथ संपन्न हुआ. इस बीच वे बार-बार पूछ्ते रहे – मनु के क्या हालचाल हैं...आप हिंदुस्तान टाइम्स हाउस की किस मंजिल में बैठते हैं...मेरी तबीयत आजकल ठीक नहीं रहती है...क्या आपके पास भीष्म साहनी की नाट्य रचना- कबिरा खड़ा बाजार में की कापी है, हो तो भिजवा देना। मैं उसे पढ़ना चाह्ता हूं
मनु के ऊपर देवेंद्र सत्यार्थी और शैलेश मटियानी के व्यक्तित्व का काफ़ी प्रभाव पड़ा है इससे इन्कार नहीं किया जा सकता। यह जो दिल्ली है के नायकीय चरित्र सत्यकाम में कुछ हिस्सा सत्यार्थी जी के चरित्र का भी रहा हो तो आश्चर्य नहीं हालांकि कथा साहित्य में सृजित चरित्र बहुत ही संश्लिष्ट होते हैं और उनमें किसी व्यक्ति का आरोपण करना दूर की कौड़ी फ़ेंकने से ज्यादा नहीं होता।
एक और घटना याद आ रही है, जब मनु, मैं और शैलेन्द्र चौहान कथापुरुष शैलेश मटियानी से दिल्ली के गोविन्द वल्लभ पंत अस्पताल में बातचीत करने गये थे। यह शायद जगदीश चतुर्वेदी से लिये गए साक्षात्कार के लगभग एक महीने पहले का समय रहा होगा यानी नवंबर, 1996 का कोई दिन। मटियानी जी उस समय भयंकर मानसिक पीड़ा के आघात से थोड़ा-सा उबरे थे और बातचीत करने के लिये मनु को शायद स्वयं ही आमंत्रित कर लिया था। इसलिये यह साक्षात्कार उस सुखद माहौल में नहीं हुआ था जैसी सुखद स्थिति चतुर्वेदी जी के साक्षात्कार के समय रही थी.। कारण स्पष्ट थे। चतुर्वेदी जी के साथ गुज़रा दिन ठहाकों से भरा था और मटियानी जी के साथ का समय उत्तेज़नाओं तथा कुछ-कुछ विषाद मे लिपटा हुआ। मटियानी जी को अस्पताल में जो कमरा मिला था उसमें मटियानी जी की पत्नि तथा बेटा राकेश भी साथ थे। मटियानी जी ने उस साक्षात्कार में अपनी रचनाओं, तथा साहित्यिक अनुभवों के साथ-साथ अपनी जानलेवा बीमारी एवम जीवन के कुछ अछूते निजी प्रसंग हम सब से साझा किये थे। मनु तथा शैलेन्द्र चौहान की तो शायद मटियानी जी से  मुलाकात पहले भी हो चुकी थी पर मेरी उनसे यह पहली मुलाकात थी और उसी दिन मुझे पता चला था कि मनु को वे कितना अगाध स्नेह और सम्मान देते थे। बचपन से ही संघर्ष और पलायन की विपदा झेलने वाले शैलेश मटियानी, जो अपने रचनाकर्म के बल पर (आत्म्श्लाघा वश नहीं) स्वयं को प्रेमचंद के बाद का सबसे बड़ा कहानीकार मानते थे, से मिलना हमारे लिये एक विरल अनुभव था। हालांकि, देवेन्द्र सत्यार्थी, नागार्जुन आदि की तरह मटियानी जी द्वारा की गई परिवार की उपेक्षा से उनकी पत्नि तथा पुत्र दोनों ही दुखी दिखे लेकिन पंत अस्पताल में बीत रहे वे दिन सेवा करने के दिन थे गिले-शिकवे करने के नहीं। मनु स्वयं बहुत भावुक हैं। और हम दोनों भी इसके अपवाद नहीं थे, इसलिये मटियानी जी जब भी अपनी विक्षिप्तावस्था, असहनीय मानसिक पीड़ा तथा पारिवारिक चिंताओं की चर्चा करते तो हम सब की आंखें भर आतीं!
विपरीत परिस्थितियों में हमारी सह्भागिता सहित मनु द्वारा लिया गया मटियानी जी का यह साक्षात्कार उनके द्वारा लिये गए साक्षात्कारों मे सबसे अधिक लंबा था। मुलाकातपुस्तक के 57-58 प्रष्ठ घेरे थे उसने। यह वह समय था जब प्रकाश मनु द्वारा लिये गए साहित्यकारों के लंबे-लंबे साक्षात्कार, वह भी बिना रेकार्ड किये,  काफ़ी चर्चा का विषय बन चुके थे और जिनसे मनु की एक अलग ही पह्चान बनी थी।
एक दो साक्षात्कारों पर विवाद भी खडा हुआ था। एक बड़े साहित्यकार ने तो अपने साक्षात्कार में कही गई कुछ बातों को सिरे से नकार दिया था और सारा दोष मनु की भंग-स्मृति पर डाल कर मुक्त हो गये थे। इससे मनु कुछ दिनों तक काफ़ी विचलित रहे थे। इस संदर्भ मे मुझे कन्हैयालाल नंदन द्वारा लिये गए जैनेंद्र कुमार के एक साक्षात्कार का स्मरण भी आ रहा था जिसमें जैनेंद्र जी द्वारा नकारी गईं कुछ बातों का प्रमाण नंदन जी ने जैनेंद्र जी द्वारा हस्ताक्षरित पांडुलिपि को प्रकाशित कर के दिया था। जबकि मनु ने ऐसी सावधानी शायद कभी नही बरती और न ही उनके किसी साहित्यकार से प्रकटत: ज़रूरत से ज्यादा कटु संबंध बने।
बीस-पच्चीस वरस पहले के और आज के प्रकाश मनु को देखता हूं तो मुझे दोनों में काफ़ी कुछ परिवर्तन नज़र आता  है। ज्यों-ज्यों मनु का रचनात्मक कद बढा है, उनके अंदर की विध्वंसात्मक ऊर्ज़ा शांत होती गई है। एक परिवर्तन यह भी आया है कि वे जबसे बालसाहित्य सृजन की ओर उन्मुख हुए हैं, उन्होंने अपने आप को बालसाहित्य की धारा में ही संपूर्णत: बहा दिया है।
बालसाहित्य की लगभग सभी विधाओं में मनु ने विपुल मात्रा में लेखन किया है और अभी भी कर रहे हैं। आलोचना के क्षेत्र मे हिंदी बाल कविता का इतिहास, हिंदी बाल साहित्य-नई चुनौतियां और संभावनाएं जैसी गंभीर विवेचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं और शीघ्र ही उनके द्वारा कई वर्षों तक लिखा गया हिदी बाल साहित्य का इतिहास भी अब पाठकों के सामने आने वाला है।
मनु की अथक रचनात्मक ऊर्जा के पीछे उनकी लेखिका  पत्नी डा- सुनीता की सतत शक्ति रही है, और मनु की रचनाओं की सबसे पहली पाठक और आलोचक भी वे ही रही हैं। मनु की रचनाओं की तुलना में सुनीता की प्रकाशित कृतियां कम हैं पर उनमें जो गंवई महक और पारिवारिक जीवन के आत्मीय सम्बंधों की झलक है वह मनु की रचनाओं में मुझे कम दिखती है। एक में अनुभवों की समृद्धि का आधिक्य है तो दूसरे में अनुभूतियों की सघनता का।
मनु अबतक जीवन के 65 वसन्त देख चुके हैं और वय में वे मुझसे लगभग तीन-चार वर्ष छोटे हैं पर वे (और डा- सुनीता भी) मुझे हमेशा छोटा भाई मानकर ही व्यवहार करते हैं और इसमें सचमुच मुझे सबसे बड़ा सुख मिलता है। उम्र जैसे-जैसे बढती जाती है, वैसे-वैसे आत्मीयजनों और अपनी चीजों से मोह भी बढ़ता जाता है, जबकि ऐसा होना नहीं चाहिए। बच्चन जी ने शायद ऐसी ही मनस्थिति में कभी लिखा होगा - अंगड़-खंगड़ मोह सभी से क्या बांधूं क्या छोड़ू रे/ जिसका सारा माल मता है उससे नाता जोड़ूं रे। ****

rtailang@gmail.com
 



Wednesday, October 21, 2015

डा० श्रीप्रसाद की बालकविताओं का रचनात्मक वितान - रमेश तैलंग

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हिंदी के सिरमौर बालकवि डा श्रीप्रसाद की बालकविताओं को पढ़ते हुए एक रोमांचक अनुभूति होती है। इन कविताओं में वे सभी विशिष्टताएं दिखती हैं जो एक बाल कविता को श्रेष्ठ बाल कविता बनाती हैं। इनमें से एक है देशज शब्दों का मुक्त प्रयोग।
     श्रीप्रसाद जी देशज शब्दों का खुलकर प्रयोग करते हैं जो उनकी कविताओं मे एक अद्भुत चमत्कृति पैदा करता है। उदाहरण के लिये श्रीप्रसाद जी की सर्वाधिक लोकप्रिय बालकविता च्च्हाथी चल्लम चल्लमज्ज् को लें जो बच्चों के पाठ्यक्रमों में भी शामिल है, तो इसमें हौदा, चल्लम, हल्लम, फ़ट्टर-फ़ट्टर, थल्लर-थल्लर, धम्मम-धम्मम आदि ऐसे शब्द हैं जिनकी आवृत्ति तथा पुनरावृत्ति बच्चों को पढ़ते-सुनते समय एक अलग ही तरह का आनंद देती है। हाथी की विशाल काया और मस्त्ती भरी चाल को यह शब्दावली पूरी तरह से जीवंत कर देती है
हल्लम-हल्लम हौदा, हाथी चल्लम-चल्लम
हम बैठे हाथी पर, हाथी हल्लम-हल्लम
लंबी-लंबी सूँड़ फ़टाफ़टे, फ़ट्टर-फ़ट्टार
लंबे-लंबे दाँत खटाखट, खट्टर-खट्टर
दिनभर घूमेंगे हाथी पर, हल्लर-हल्लर
हाथी दादा, जरा नाच्दो, थल्लर-थल्लर
अरे नहीं, हम गिर जाएंगे, घम्मम-घम्मम
हल्लम-हल्लम हौदा, हाथी चल्लम-चल्लम

और यही कविता क्यों? श्रीप्रसाद जी की अन्य कविताओं मे भी ऐसे कई प्रयोग हैजैसे भक्काटे, धिनधिनताम, कुइयाँ, गुइयाँ, धिनतका इत्यादि। ऐसे शब्दों का यथोचित प्रयोग वही बालकवि कर सकता है जिसकी जड़ें किसी भी रूप में ग्रामीण तथा संगीतात्मक पृष्ठ्भूमि से जुड़ी हुई हों। श्रीप्रसाद जी को जिन्होंने व्यक्तिगत रूप से देखा है वे उनकी वेश-भूषा, आचार-व्यवहार, मृदुभाषिता तथा विनम्रता से भली-भांति परिचित होंगे और उनके इस व्यक्तित्व की झलक कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं प्रच्छ्न्न रूप में उनकी रचनाओं मे भी मौज़ूद दिखाई देती है।
खेल-कूद, और मनोरंजन, श्रीप्रसाद जी की बाल कविताओं के प्रमुख विषय हैं। पतंगवाजी भी इन्ही खेलों मे से है, और यह शौक भला किस बच्चे को प्रिय नहीं होगा ? जब पन्द्रह अगस्त या अक्षय तृतिया का पर्व आता है तब तो पतंगों से संपूर्ण आकाश आच्छादित हो जाता है और वो काटा भक्काटा! की आवाजें दूर-दूर तक गुंजायमान होने लगती हैं। इस गूंज को भक्काटे कविता में बखूबी सुना जा सकता है
पीली, लाल, गुलाबी, नीली, भक्काटे!/ऊपर उड़ती हैं चमकीली भक्काटे!
कटी एक तो शोर हो रहा भक्काटे!/हो-हो चारों ओर हो रहा भक्काटे!

छंद के विधान पर श्रीप्रसाद जी की पूरी पकड़ है। इसीलिये उनकी बालकविताओं मे आरंभिक टेक, लय और गीतात्मकता का समुचित निर्वाह देखने को मिलता है। बाल कविताओं मे ध्वन्यात्मक शब्दों की बारंबारिता का अपना अलग प्रभाव होता है और ऐसी बाल कविताएँ बच्चों को याद जल्दी हो जाती हैं क्योंकि उनमें सामूहिकता का भाव भी अन्तर्विद्ध रहता है।
कुछ ऐसी ही बालकविताएँ देखिये

जोर लगाएँ, ऊपर जाएँ, हैया हो!/आसमान में धूम मचाएँ हैया हो!/
चाँदी से चंदा पर खेलें, हैया हो! /वहाँ कठिन मौसम को झेलें हैया हो!/
****
गोल बनाकर आओ नाचें, झूमें गाएँ - ताकधिना/
दोनों हाथों को फ़ैलाकर हाथ मिलाएँ -ताकधिना!/
ओहोहो हम सब कितने हैं/सब आ जाएँ-ताकधिना/
ताली दे-देकर के नाचें/मिलकर गाएँ-ताकधिना!
****
पेड़ खड़े हैं जंगल में, धिनतका /पहलवान हैं दंगल में, धिनतका/
फ़ूल पेड़ पर आएँगे, धिनतका /पहलवान लड़ जाएँगे धिनतका/
****

भारत जैसे देश मे जहाँ बच्चों की बड़ी आबादी ग्रामीण परिवेश से आती है, उन्हें श्रीप्रसाद जी की बालकविताएँ पढ़ने-सुनने मे बिलकुल अपनी-सी लगें तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिये। बच्चों की कल्पना का आकाश कितना विस्तीर्ण हो सकता है यह उनकी इस बाल कविता मे स्पष्ट्त: देखा जा सकता है

रसगुल्ले की खेती होती, बड़ा मजा आता/
चीनी सारी रेती होती, बड़ा मजा आता/
बाग लगे चमचम के होते बड़ा मजा आता/
शर्बत के बहते सब सोते बड़ा मजा आता/...
लड्डू की सब खानें होतीं बड़ा मजा आता/
घर मे दुनिया पेड़े बोती बड़ा मजा आता/
रुपये की दस किलो मिठाई बड़ा मजा आता/
होते रुपये पास अढ़ाई बड़ा मजा आता/

हां, इस कविता को पढ़्ते समय एक समस्या आजकल के पब्लिक स्कूल में पढ़ रहे बच्चों के सामने अवश्य आ सकती है और वह समस्या है च्च्अढाईज्ज् शब्द की। ऐसे समय में जब आठ आने और पचास पैसे के सिक्के चलन से बाहर हो गए हैं तब अढ़ाई रुपये को किस तरह बच्चे की समझ में डाला जाएगा यह बात कविता पढाने/सुनाने वाले को अवश्य परेशान करेगी! इन पंक्तियों के लेखक को भी अपना एक बालगीत च्च्टिन्नी जी ओ टिन्नी जी ये लो एक चवन्नी जी...ज्ज् इसी कारण चलन से बाहर होता दिखाई पड़ रहा है। पर साहित्य में नये शब्दों का प्रवेश और पुराने (निष्क्रिय हो गये) शब्दों का निष्कासन कोई नई बात नहीं है। ऐसा पहले भी होता रहा है और आगे भी होता रहेगा क्योंकि भाषा तो बहता नीर है। इसलिये मात्र इस बिना पर इस मजेदार कविता का रसभंग नहीं हो सकता. इसका मज़ा तो बच्चे और बड़े सभी लेंगे इसमें संदेह नहीं।
                कल्पना की ऐसी उड़ान  भरती हुई कुछ अन्य कविताएं भी हैं

एक पेड़ पर विद्यालय हो/एक पेड् पर खाना
डाली-डाली पर हम बैठें/वहीं पढें मिल करके
बातें करें, हँसे हम बच्चे/फ़ूलों से खिल करके
बजे वहीं पढ़्ने का घंटा/कोयल गाए गाना
********

आठ फ़ीट की टांगें होतीं/चार फ़ीट के हाथ बड़े
तो मैं आम तोड़कर खाता/ धरती से ही खड़े-खड़े
कान बड़े होते दोनों ही/दो केले के पत्ते से
तो मैं सुन लेता मामा की/ बातें सब कलकत्ते से
****
बच्चों का संसार सिर्फ़ माता-पिता, घर-परिवार तक सीमित नहीं होता, उस संसार में पशु, पक्षी, पेड़, फ़ूल, हवा, पानी, बादल, बिजली, पठन-पाठन, खेल-कूद सभी शामिल होते हैं। श्रीप्रसाद जी ने अपने बालकाव्य में इन सभी को समेटा है और यही कारण है कि उनकी बालकविताएं एक विस्तृत फ़लक पर खड़ी नज़र आती हैं। पारंपरिक खेल तो वैसे भी हमारे समाज से विदा ले चुके हैं और उनके साथ-साथ पारंपरिक खेलगीत भी स्मृति से लुप्त हो गए हैं इसलिये बालसाहित्य मे जब इक्के-दुक्के खेलगीत कहीं दिखाई देते हैं तो लगता है जैसे सूखी मिट्टी पर पानी का छिड़्काव हो गया हो और उसकी महक पूरे वातावरण में फ़ैल गई हो। श्रीप्रसाद जी के कुछ खेल गीतों के अंश यहां देखिये

 छुक-छुक गाती बढ़्ती जाती रेल हमारी
डिब्बों में बैठी हँसती हर एक सवारी
*****
तीन कुर्सियाँ आगे रक्खीं
पीछे रक्खी एक, हमारी घोड़ागाड़ी!
पीछे की कुर्सी पर बैठे
दादा लाठी टेक हमारी घोड़ागाड़ी!
तीनों घोड़े चले दौड़कर
सरपट-सरपट चाल, हमारी घोड़ागाड़ी!
चट से नानी के घर पहुँचे
कैसा किया कमाल हमारी घोड़ागाड़ी!
 
****

आओ आओ, आओ, खेलें/आओ खेलें गुइयाँ
छत पर खूब चाँदनी छाई/ जैसे उतरा चंदा/
गाना मीठा-सा गाएगी / नन्ही-नन्ही नंदा
सोने के गोटे की साड़ी पहने आई टुइयाँ
*******

श्रीप्रसाद जी उस पीढ़ी के बालकवि हैं जिन्होंने परतंत्रता और स्वतंत्रता दोनों का समय देखा है और जिस तरह पं सोहन लाल द्विवेदी, द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी जैसे प्रभृति कवियों ने देशप्रेम और प्रयाण के गीत लिखे हैं उसी तरह श्रीप्रसाद जी ने भी अनेक ऐसी बाल कविताएं लिखी हैं। जिनमें से कुछके अंश यहां प्रस्तुत हैं :

चलो सिपाही, वीर चलो तुम/आगे चलो सिपाही/
मिलकर चलो, मिलेगी मंजिल तुमको तब मनचाही/

****

सिर ताने, सीना ताने/हम चले वीर मस्ताने
हम चले हवा की गति से/हम चले एक ही मति से/
गाते साहस के गाने/हम चले वीर मस्ताने!
****

भारत अपना देश, देश की मिट्टी कितनी प्यारी
भारत बने महान, कामना रहती यही हमारी

परियां यथार्थ मे हों न हों पर बच्चों की कल्पना में वे अवश्य होती हैं, और उन बच्चों को सबसे अधिक आकर्षित करती हैं जो अकेलेपन क अभिशाप झेलते हुए किसी ऐसे सहारे को खोज रहे होते है. जो उनसे दोस्त की तरह बात-चीत कर सके, और उनके निराश मन को आशा के भाव से भर सके !
एक परी है नीली -नीली/एक परी है हरी-हरी/एक परी है पीली, जिसकी/फ़ूलों से है फ़्राक भरी
तीनों परियाँ गाना गातीं/नाच दिखाती छम-छम-छम/आओ, आओ, इन तीनों/सुंदर परियों को देखें हम।

हाशिये पर पडे बच्चों और खासकर लड़्कियों पर बहुत कम कवियों ने कलम चलाई है फ़िर लड़कियों में भी कामवाली की बेटी हो तो वह और भी ज्यादा उपेक्षित होती है.........
पर श्रीप्रसाद जी की नज़र ऐसे पात्रों पर भी नहीं चूकी है

लड़की अंतरिक्ष में जाती/साहस इतना भारी/लड़की खेल रही खतरों से/लड़की कभी न हारी
यह प्रकाश लेकर निकली है/मिटा रही है अंधियारी/लड़्की अंतरिक्ष में जाती/साहस इतना भारी
*****
आई है महरिन की बेटी/महरिन आज नहीं आएगी
यही आज मांजेगी बरतन/झाड़ू करके घर जाएगी..
नाम रमोला है लड़की का/कोयल जैसा स्वर पाया है
एक बार गाया था गाना/लगा, स्वर्ग नीचे आया है
*****

                इन कविताओं के अलावा  और भी विविध विषय है जिन पर श्रीप्रसाद जी ने अपना कमाल दिखाया है। उनके सैंकड़ों शिशुगीत हैं जिन पर विस्तृत टिप्पणी की जा सकती है, पर यह एक इतर विषय है। बच्चों की कविताएं आकार में छोटी हों तो उनकी ज़बान पर आसानी से चढ़ती हैं। इस बात से श्रीप्रसाद जी भी सहमत है. तभी तो वे लिखते हैं

बच्चे छोटे हैं, जिनकी हैं छोटी-छोटी कविताएँ/छोटे मुँह से बच्चे अपनी छोटी कविताएँ गाएँ
छोटी बात अगर अच्छी है, अगर सही, है बात बड़ी/समय बड़ा है जिसे बताती/बिल्कुल छोटी एक घड़ी/

फ़िर भी कतिपय जगहों पर श्रीप्रसाद जी की कुछ बालकविताएं आकार में थोड़ी बड़ी हो गई हैं और कुछ ऐसी भी हैं जो अपने रचाव-कसाव में सामान्य हैं पर यह बात उनकी श्रेष्ठ कविताओं को प्रभावित नहीं करती और वे हर तरह से आधुनिक हिंदी बालकविता के शीर्ष प्रणेताओं में ही शुमार होते हैं। ***

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