Friday, December 5, 2014

आज बस इतना ही ---- 6 दिसंबर, 2014




हम बीच सफ़र में हैं अभी क्या भला देंगे।
लौटेंगे किसी रोज़, तो अपना पता देंगे।

आरामगाहों में जो बैठे हैं क्या करेंगे
देंगे दिलासा गमज़दों को, गमज़दा देंगे।

दहशतगरों की फ़ितरत होती ही है कुछ ऐसी
बुझते हुए शोलों को जब देंगे, हवा देंगे


आतंक के साये से अब दूर रहे दुनिया
बस बार-बार दिल से हम एक दुआ देंगे

 
टूटे हुए सपनों को ज़िंदा न कर सके तो
हम याद में उनकी एक शम्मा तो जला देंगे

 
- रमेश तैलंग

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