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Wednesday, December 3, 2014

आज बस इतना ही…… 3 दिसंबर, 2014





घायल हों परिंदे तो उड़ानें नहीं भरते
कमजोर इरादों से मु्कद्दर नहीं बनते


तारीख माँगती है लम्हे-लम्हे का हिसाब
तारीख के साए में बहाने नहीं चलते


अपनी ख़ताओं से जो सबक ले नहीं पाते
मौसम के आने पर भी वे शजर नहीं फलते


इस जिंदगी को जीने का सलीका चाहिए
इक उम्र गुज़र जाती है ये बात समझते


हम हैं अदीब, दर्द बांटने का काम भी
करते हैं तो एहसान की तरह नहीं करते


- रमेश तैलंग

Sunday, May 12, 2013

किसी बहाने सही




किसी बहाने  सही, याद मेरी आया करे. 
खुदा कभी भी उसे मुझसे न पराया करे.

ये रिश्ते भी बड़ी  नायाब चीज़  होते हैं 
दुआ करो कि इन्हें यूं न कोई ज़ाया करे.

शज़र लगाऊं जहां भी कहीं मोहब्बत का 
मैं चाहता हूं वो हर एक सर पे छाया करे.

भरा हो आंखों में सैलाब जब दुखों का तो 
ये ज़रूरी है कोई आ मुझे  रुलाया करे.

मैं हूं इंसान, हैं मुझमें भी हजारों कमियां
मेरी इस बात पे कोई तो यकीं लाया करे.

- रमेश तैलंग 


(चित्र सौजन्य: गूगल -हेमंत शेष)

कभी अब्र बन के ...

आज बस इतना ही........12 मई, 2013

(foto credit : google)


कभी अब्र बन के बरस गए, कभी धूप बन के बिखर गए.
वो अजीब किस्म के लोग थे जो मिले तो दिल में उतर गए.

उन्हें फुर्सतों की कमी न थी, उन्हें चाह कोई बड़ी न थी,
रखा हाथ सर पे तो यूं लगा जैसे बोझ सारे उतर गए.

वो फ़कीर हो के अमीर थे, वो ग़मों में सबके शरीक थे,
वहीं चार  महफ़िलें जोड़ लीं,जहां चार पल को ठहर गए.

भले कितनी थी दुश्वारियां,नहीं तोड़ीं  यारों से यारियां,
वहीं बन गए नए रास्ते, वो जिधर-जिधर से गुजर गए.

वो नज़र से दूर जो जा बसे, तो हमारी यादों में आ बसे,
वो अभी थे आंखों के सामने, वो अभी-अभी लो, किधर गए?

- रमेश तैलंग