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Friday, June 27, 2014

आज बस इतना ही …28 जून, 2014

pic. credit : google



आज बस इतना ही …28 जून, 2014

आधी उमर गुज़ार आए ख्वाब संजो के
बाकी गुज़ार दी पुरानी यादों में खो के

मंजिल तो मिल सकी न ज़िंदगी के सफ़र में
हम रह गए बस जैसे  रास्तों के ही होके

पांवों की जलन ने किया बेचैन जब हमें
आराम ढूंढ्ते रहे दामन को भिगो के

ऐसे जियो, वैसे जियो, सौ मुंह, सौ सलाहें
पर न मिली निज़ात दुखों से, कभी रो के

कुछ दर्द चाह कर भी बयां हो नहीं पाते
थकने लगे हैं कधे भी जज्बातों को ढो के 

लग जायेगी जब नींद किसी दिन तो देखना
बिस्तर से न उठेंगे  एक बार भी सो के

- रमेश तैलंग

Sunday, April 13, 2014

आज बस इतना ही ....14 अप्रैल, 2014



मलवे का तसला सिर पर ढोते देखा
उस औरत को  हमने न रोते देखा 

कभी मोम की गुडिया कहलाती होगी 
आज उसे लोहा-पत्थर होते देखा 

जिनमें बहती थी आंसू की नदी कभी 
उन आँखों में अब सपने बोते देखा 

रोज उजड़ना, बसना उसकी  कथा रही 
जब देखा विस्थापित ही होते देखा 

जीवन में जाने क्या-क्या खोया उसने 
स्वाभिमान की धज को न खोते देखा

-रमेश तैलंग

pic.credit: Google  search  




Sunday, May 12, 2013

किसी बहाने सही




किसी बहाने  सही, याद मेरी आया करे. 
खुदा कभी भी उसे मुझसे न पराया करे.

ये रिश्ते भी बड़ी  नायाब चीज़  होते हैं 
दुआ करो कि इन्हें यूं न कोई ज़ाया करे.

शज़र लगाऊं जहां भी कहीं मोहब्बत का 
मैं चाहता हूं वो हर एक सर पे छाया करे.

भरा हो आंखों में सैलाब जब दुखों का तो 
ये ज़रूरी है कोई आ मुझे  रुलाया करे.

मैं हूं इंसान, हैं मुझमें भी हजारों कमियां
मेरी इस बात पे कोई तो यकीं लाया करे.

- रमेश तैलंग 


(चित्र सौजन्य: गूगल -हेमंत शेष)

कभी अब्र बन के ...

आज बस इतना ही........12 मई, 2013

(foto credit : google)


कभी अब्र बन के बरस गए, कभी धूप बन के बिखर गए.
वो अजीब किस्म के लोग थे जो मिले तो दिल में उतर गए.

उन्हें फुर्सतों की कमी न थी, उन्हें चाह कोई बड़ी न थी,
रखा हाथ सर पे तो यूं लगा जैसे बोझ सारे उतर गए.

वो फ़कीर हो के अमीर थे, वो ग़मों में सबके शरीक थे,
वहीं चार  महफ़िलें जोड़ लीं,जहां चार पल को ठहर गए.

भले कितनी थी दुश्वारियां,नहीं तोड़ीं  यारों से यारियां,
वहीं बन गए नए रास्ते, वो जिधर-जिधर से गुजर गए.

वो नज़र से दूर जो जा बसे, तो हमारी यादों में आ बसे,
वो अभी थे आंखों के सामने, वो अभी-अभी लो, किधर गए?

- रमेश तैलंग 



Thursday, May 9, 2013

जुलुम की मारी रधिया



आज बस इतना  ही.... 10 मई 2013

जुलुम  की मारी रधिया अब थाने जाने से डरती है.
एक कहानी है उसकी पर बतलाने से डरती है.

बाहर की दुनिया का जबसे दंश देह पर खा बैठी
हर पल अपने हीं अंदर के वीराने से डरती है.

गोकुल, मथुरा, जहां गई निश्शंक रही, जी न धडका,
पर अब देखो, अपने ही घर बरसाने से डरती है.

चढ़ जाती थी पेड़ों पर, खेतों में कूद लगाती थी,
उलझा पग झरबेरी में तो फल खाने से डरती है.

निर्भयता, निश्छलता जैसे शब्द सुने थे उसने भी
अर्थ खो गए जबसे उनके हर माने से डरती है

घाव खुले हों तो शायद लड़ने की ताकत आ जाए,
यही सोच कर अब ज़ख्मों के भर जाने से डरती है|

मरना  ही होता तो शायद कब की पहले मर जाती,
जगा हौसला थोड़ा-सा तो मर जाने से डरती है.

(चित्र सौजन्य: गूगल- bumbir.com)