घायल हों परिंदे तो उड़ानें नहीं भरते
कमजोर इरादों से मु्कद्दर नहीं बनते
तारीख माँगती है लम्हे-लम्हे का हिसाब
तारीख के साए में बहाने नहीं चलते
अपनी ख़ताओं से जो सबक ले नहीं पाते
मौसम के आने पर भी वे शजर नहीं फलते
इस जिंदगी को जीने का सलीका चाहिए
इक उम्र गुज़र जाती है ये बात समझते
हम हैं अदीब, दर्द बांटने का काम भी
करते हैं तो एहसान की तरह नहीं करते
- रमेश तैलंग
