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Saturday, October 17, 2015

माफ़ कीजिये, मैं नहीं लौटा रहा हूं अपना अकादमी सम्मान


गत कुछ दिनों से अखबार की सुर्खियां पढ़ कर मेरा मन भी मीडिया में उछलने का कर रहा था। लेकिन अपनी मज़बूरी है। पता नहीं आप समझेंगे या नहीं । इसलिए थोड़ा-सा खुलासा कर रहा हूं जो कुछ तिक्त भी है और कुछ सच भी, वरना अपनी जांघ उघाड़ने का उपक्रम कौन करता है।
दरअसल, जब मुझे साहित्य अकादमी सम्मान मिला था तब उसके साथ कुछ अर्थ की प्राप्ति भी हुई थी जो मेरे जैसे अदना लेखक के लिये आड़े वक्त में बहुत बड़ी राशि थी और जिससे मैंने न केवल बहुत पुराने ऋण का कुछ अंश चुकता किया बल्कि दो-चार दिनों की दाल-रोटी भी खा ली थ। (अब तो दाल भी इतनी मंहगी है कि दाल की जगह हवा से काम चलाना पड़ेगा बशर्ते, पानी की तरह कल हवा भी न बिकने लगे) इसलिए उस सम्मान राशि को एक बार गृहण कर के दोबारा लौटा पाना मेरे लिये संभव नही।  यह काम वे करें जो तथा कथित संभ्रांत-जन हैं, जिनके भरे हुए पेट हैं,और जो अपने कृतित्व से ज्यादा अपने व्यक्तित्व, पद, और संपर्क के कारण चर्चा में हैं।
पुरस्कार या सम्मान लौटाना सिर्फ़ कागज का पत्र या धातु का स्मृति-चिन्ह लौटाना नहीं हैं। उसके साथ मिली उस खुशी का भी लौटाना है जो आपके साथ-साथ आपके परिजनों को भी मिली थी। उस धन-राशि का लौटाना भी है जिसे लौटाने  के लिये हो सकता है फ़िलहाल आपकी जेब खाली हो पर अपनी अहंतुष्टि के लिए आप ब्याज पर कोई ऋण उठालें। और क्या आप समझते हैं कि अकादमी या कोई भी सरकारी संस्था इस सम्मान राशि के बहाने अपनी खुद की कमाई का हिस्सा आपको सौंपती है? जी नहीं जो पैसा आपको मिलता है या मिला है वह भी आपकी कमाई से ही करादि के रूप में सरकार द्वारा वसूल किया गया धन है। इसलिए जो पैसा मेरा ही था या है उसे वापस सरकार या सरकारी संस्थान को लौटाने का तो सवाल ही नहीं उठता।
हां, यदि मुझे अपनी आत्मा कुछ ज्यादा ही झकजोरती है और मुझे अपनी ज़िद ही पूरी करनी है (फ़िर चाहे अपने घर के बर्तन बेच कर ये काम करना पड़े) तो यह पैसा मैं सरकार को वापस न कर के उन हत-आहत परिवारों को ही क्यों न दूं जो सांप्रदायिक हिंसा का शिकार हुए हैं। क्या यह प्रतिरोध का जायज़ तरीका नहीं हो सकता? क्या अकादमियों के काम में अब सांप्रदायिक हिंसा को रोकने और व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी भी शामिल करनी होगी? क्योंकि उनके द्वारा दिये गये सम्मान को उन्हें लौटाने का अर्थ तो यही हुआ न कि देश के किसी कोने में भी साम्प्रदायिक हिंसा होती है तो ठीकरा सीधे आप उन के माथे पर फ़ोड़ सकते हैं।
हो सकता है, आपको मेरा यह तर्क लचर या जन विरोधी लगे पर ज़रूरी तो नहीं कि एक जो करे वही बाकी भी सभी करें। और अकादमी या पद्म सम्मान लौटाने से सब कुछ ठीक हो सकता है तो आप लौटाने की जगह यह संकल्प ही क्यों नहीं ले लेते कि सरकार कोई भी क्यों न हो  उससे न तो जीवनपर्यंत कोई सम्मान लेंगे, न वृत्ति लेंगे और न ही विशिष्ट श्रेणी (पत्रकार-लेखक) के लिये दिये जाने वाले आरक्षित अनुग्रह लेंगे। (संतन को कहा सीकरी सों काम.. वशर्ते आप संत हों) आपका निर्णय और  अन्याय के प्रतिरोध का तरीका सार्वकालिक होना चाहिए, अवसरवादी नहीं।
      हमारे एक बड़े लेखक भाई ने यदि यह कह दिया है कि आप जिस सम्मान को लौटाने की घोषणा मीडिया में उछल-उछल कर रहे हैं उसके साथ उस और उस कीर्ति को भी लौटाईये जो आप उस सम्मान के बाद  भोग चुके हैं और भुना चुके हैं,  तो शायद आपको बुरा लग रहा है? लेकिन गुड़ खाएं और गुलगुलों से परहेज करें, यह तो ठीक नहीं
      इसलिए, माफ कीजिये, मैं अपने साहित्य अकादमी का सम्मान (बाल-साहित्य की श्रेणी में है तो क्या) को लौटाने की स्थिति में अपने को नहीं पा रहा हूं।  क्योंकि यह अकादमी का ही नहीं मेरी अपने रचनाकर्म का भी अपमान है। मेरे इस नकार के पीछे  केवल मेरी आर्थिक  विवशता ही नहीं बल्कि उस छ्द्म को अस्वीकार करने की ज़िद भी है जिसे कुछ नामी-गिरामी लोग आवेश, भावुकता, दल-विधान या लोभवश अपने कमजोर क्षणों मे ओढ़ लेते हैं।

-          रमेश तैलंग
-          rtailang@gmail.com

-           




Friday, December 12, 2014

आज बस इतना ही .........13 दिसंबर, 2014


ये माना, उनमें बड़ी जान हुआ करती है।
समुंदरों को भी थकान हुआ करती है।

उछाल भरती हुई लहरें आसमां छू लें
ये चार पल की दास्तान हुआ करती है

शिखर पे जा के खुशी हो बुरा नहीं लेकिन
शुरु वहीं से हर ढलान हुआ करती है।

जो ज़ुल्म सह के भी चुप हैं, ये भूल मत जाना
कि उनके मुँह में भी ज़बान हुआ करती है।

वो दूसरों का दर्द अपना ही समझते हैं
अदीबों की यही पह्चान हुआ करती है।

- रमेश तैलंग

आज बस इतना ही.......12 दिसंबर, 2014




चढते हुए दरिया में हाथ-पाँव मार कर
धुन रह्ती है सवार यही एक- "पार कर!"

जितना सँभालता हूँ ज़िंदगी के सिरों को
चल देती हैं ये आँधियाँ सब तार-तार कर

कंधों को जैसे पड़ गई है रोज की आदत
रखता हूँ नया बोझ पुराना उतार कर

इंसान के बस मे नहीं होता है सभी कुछ
पड़ता है कभी बैठना भी मन को हार कर

जब टूटता है हौसला, कहता हूं ये उससे -
"करना है जो भी अब तू ही परवरदिगार कर!"

- रमेश तैलंग


Saturday, December 6, 2014

आज बस इतना ही ---- 7 दिसंबर, 2014


फ़ल में ही बीज था और बीज में फ़ल था।
इस आज में आता हुआ, जाता हुआ कल था।

जब गौर से देखा तो, चुधियां गईं आंखें
जल में थी अगन और अगन में छुपा जल था।

जिस सूत्र को लोगों ने हंसी में उड़ा दिया
उस सूत्र में जगत का रूप अष्टकमल था।

गूंगे में थी वाचालता, वाचालता में मौन
ये सत्य था कि दृष्टिभ्रम या और ही छल था।

बेचैन रहा जिसको पकड़ने में, सदा मैं
गतिमान काल में कहीं ठहरा हुआ पल था।

- रमेश तैलंग

Friday, June 27, 2014

आज बस इतना ही …28 जून, 2014

pic. credit : google



आज बस इतना ही …28 जून, 2014

आधी उमर गुज़ार आए ख्वाब संजो के
बाकी गुज़ार दी पुरानी यादों में खो के

मंजिल तो मिल सकी न ज़िंदगी के सफ़र में
हम रह गए बस जैसे  रास्तों के ही होके

पांवों की जलन ने किया बेचैन जब हमें
आराम ढूंढ्ते रहे दामन को भिगो के

ऐसे जियो, वैसे जियो, सौ मुंह, सौ सलाहें
पर न मिली निज़ात दुखों से, कभी रो के

कुछ दर्द चाह कर भी बयां हो नहीं पाते
थकने लगे हैं कधे भी जज्बातों को ढो के 

लग जायेगी जब नींद किसी दिन तो देखना
बिस्तर से न उठेंगे  एक बार भी सो के

- रमेश तैलंग

Tuesday, June 24, 2014

आज बस इतना ही…24 जून, 2014


PIC.CREDIT - GOOGLE 

बहुत से रिश्ते बस जताने वाले होते है।
उनमें दो-चार ही निभाने वाले होते हैं।

हवा के साथ उड़ते तिनकों का भरोसा क्या,
वो कहां आशियां बनाने वाले होते हैं?

उतार लेते हैं आंखों में अक्स चेहरों का
जो रोज दिल पे चोट खाने वाले होते हैं।

उजाले बीच कहीं भी नज़र नहीं आते,
वो हाथ, जो दिये जलाने वाले होते हैं।

हज़ार दुख हैं सभी को यहां इस दुनिया में
न सोच, दुख भी आने-जाने वाले होते हैं।


- रमेश तैलंग

Sunday, April 13, 2014

आज बस इतना ही ....14 अप्रैल, 2014



मलवे का तसला सिर पर ढोते देखा
उस औरत को  हमने न रोते देखा 

कभी मोम की गुडिया कहलाती होगी 
आज उसे लोहा-पत्थर होते देखा 

जिनमें बहती थी आंसू की नदी कभी 
उन आँखों में अब सपने बोते देखा 

रोज उजड़ना, बसना उसकी  कथा रही 
जब देखा विस्थापित ही होते देखा 

जीवन में जाने क्या-क्या खोया उसने 
स्वाभिमान की धज को न खोते देखा

-रमेश तैलंग

pic.credit: Google  search  




Wednesday, March 26, 2014

IT IS NOW TIME TO ACT UPON .........

APPEAL TO THE ACADEMY OF LETTERS (SAHITYA AKADEMI)
NEW DELHI.
On behalf of the members of the World of Children's Literature Group I appeal to the Governing Body of the Sahitya Akademi, New Delhi to note the following points for consideration:
1. To strengthen the relationship of children with good reads, the Academy should increase its budget for publication of quality children books in all genres and enrich its library with a special section devoted to children books in all indian languages with more impetus on Hindi which is our National language.
2. The eminent children writers be encouraged to undertake the project of writing History of children's literature in all indian languages with all out support by Sahitya Akademi.
3. More and More events are supposed to be organised on national/international level to discuss and promote Indian Children Literature and if possible, a bimonthly journal may also be planned to be published by S.A. in due course which carry important articles on creative as well as critical children's literature.
4. Translation of world's modern/contemporary children literature into Indian languages and vice-versa needs to given importance with immediate effect because as of now the children's literature is getting international focus and being the apex literary body of the country S.A. should make its initiative in this direction .
5. Eminent children writers from all important indian languages be invited to form a body of consultants with other govt/non.govt.officials to work on the blue print of the future plans to link up the literature with children's education and their overall personality development. Because Children are the back bone of any civilised society .
With warm regards,
RAMESH TAILANG
09211688748/rtailang@gmail.com
Modrtr: FB GROUP : W.O.C.L.

Friday, February 28, 2014

जुगलबंदी (कुछ दोहे कुछ गीत) 1 मार्च, 2014



pic.credit : google search

:: गीत ::

क्या कासी, क्या मथुरा, बरसाना!
मन रमे जहां, वहीं रम जाना.

सिर पर 
लादे-लादे सरदारी 
बहुत दिन
निभा ली दुनियादारी 
उलझता गया हर ताना-बाना.

चूर-चूर 
थकन से भरी पांखें 
देख-देख 
छलकती रहीं आंखें
भीगता रहा हर पल सिरहाना.

कब हुआ,  
वसंत सा वसंत लगा
जीवन भर
दुःख ही जीवंत लगा 
लौट-लौट खूंटे से बंध जाना. 

- रमेश तैलंग 




Wednesday, February 26, 2014

जुगलबंदी : ( कुछ दोहे कुछ गीत) 27 फरवरी, 2014


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तीन गीत


-1-
खुरदरे चरित्रों की
स्मृति-कथाएं तो होती हैं
पर उनके अभिनंदन-ग्रंथ नहीं होते हैं.

जानबूझ कर वे सीधी-सपाट
जिंदगी का रास्ता नहीं चुनते
झूठी प्रशस्तियों  के वास्ते
ताने-बाने प्रपंच के वे नहीं बुनते

उनके जीवन का बस
इतना-सा हासिल है
जितना पाते हैं उससे ज्यादा खोते हैं.

उनकी आँखों में जब भी देखो
हरा-भरा  जंगल ही दिखता है,
कितनी भी कडुवी वाणी बोलें
पर उसमें मंगल ही दिखता है

दुनियादारी में वे
भले मात खा जाएँ,
दुःख की हिस्सेदारी में आगे होते हैं.


-2-

कागज़ पर पानी की बूँद पड़े,
लिखा-पढ़ा सब कुछ धुल जाएगा,
बंधु रे, भूल नहीं जाना

कंधों पर जितना बोझा
हर दिन लादे तू  फिरता है,
और लडखडाते क़दमों से तू
चलते-चलते जैसे गिरता है,

बटमारों की बस्ती में,प्यारे!
पलक झपकते सब लुट जाएगा.
बंधु रे, भूल नहीं जाना.

स्मृति पर विस्मृति
देखो कैसे  डाल रही है  डेरा,
सिर पर का सूरज
ढलने को है संध्या ने आ घेरा,

अब ये पल-पल मारा-मारी क्यों,
हर सुख के पीछे दुःख आएगा..
बंधु रे, भूल नहीं जाना.

-3-


झूठी पड़ जाएंगीं सब भविष्यवाणियां
मेघों का अहंकार टूटेगा जिस पल भी 
धरती से अंकुर तो फूटेगे, फूटेंगे.

कैसी भी हो सर्जन की परंपरा
पूरी तरह न मरती है,
लचकदार बेल, तेज आंधी  की
धमकी से रोज कहाँ डरती है,

शब्द तो जटायु हैं,जब तक हैं शेष प्राण,  
वे अंतिम सांस तक जूझेंगे, जूझेंगे.

वे जो व्यापारी है, भाव-ताव
तय करते फिरते  हैं,
तिनकों जैसे  ऊपर चढ़ते हैं,
बूंदों जैसे नीचे  गिरते हैं

उनके भी चेहरों से उतरेगी हर नकाब
उनके भी मनसूबे डूबेंगे, डूबेंगे,


- रमेश तैलंग 

Tuesday, June 25, 2013

देवेन्द्र कुमार देवेश द्वारा सम्पादित पुस्तक “रवीन्द्रनाथ ठाकुर का बालसाहित्य”




रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बालसाहित्य पर बहुआयामी विमर्श

रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बालसाहित्य पर आलोचकीय दृष्टि से जितना काम बांगला  भाषा में हुआ है उसका शतांश भी हिंदी में नहीं हुआ है. इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो देवेन्द्र कुमार देवेश द्वारा सम्पादित समीक्ष्य पुस्तक रवीन्द्रनाथ ठाकुर का बालसाहित्य इस जड़ता को तोडने वाली एक महत्वपूर्ण कृति है.रवीन्द्रनाथ ने अपने जीवन काल में विपुल साहित्य का सृजन किया और उनकी ख्याति देश-rदेशांतर की सीमाओं का अतिक्रमण करती  हुई  पूरे विश्व में फैली, यह किसी से छुपा हुआ तथ्य नहीं है पर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने  बालसाहित्य सृजन के क्षेत्र में भी एक ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया जिस तक शायद ही कोई और अन्य  लेखक/कवि पहुँच सका हो. उन्होंने बालसाहित्य की लगभग  सभी विधाओं में लिखा और ऐसे समय में जब बालसाहित्य अपने अनगढ़ स्वरुप में स्कूली पाठ्यपुस्तकों तक ही सीमित था, ऐसी स्तरीय रचनाएं दीं जो आज भी शिशु/बाल/किशोर वय के पाठकों के बीच लोकप्रिय एवं पठनीय बनी हुई हैं.
      देवेश की इस पुस्तक में, विभिन्न विद्वानों द्वारा रवीन्द्रनाथ के बाल साहित्य के विविध पक्षों को उद्घाटित करने वाले, बीस लेख शामिल है जिनमें कुछ हिंदी में ही लिखे गए हैं, तो कुछ अंग्रेजी से और  कुछ बांगला से सीधे हिंदी में अनूदित किये गए  हैं. स्वतंत्र मिश्र के अनुवाद में कई जगह वाक्यविन्यास और लिंगभेद (पुल्लिंग/स्त्रीलिंग) की छोटी-बड़ी  खामियां हैं  जो सहजता से पढने में वाधा डालती हैं जबकि कल्लोल चक्रवर्ती द्वारा किया गया अनुवाद उनकी अपेक्षा ज्यादा स्तरीय है.
      जहाँ तक पुस्तक में शामिल लेखों का प्रश्न है, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का शिशु संबंधिनी रचना अपने आप में एक दस्तावेज है जो न केवल रवीन्द्रनाथ के शिशुकाव्य की रचनात्मक महत्ता को रेखांकित करता है बल्कि  उदाहरण  सहित बाल-मन की अनेक गुत्थियों को भी अनावृत्त करता है. लीला मजूमदार का बच्चों के लेखक के रूप में रवीन्द्रनाथ gagaygaya भी अंतर्दृष्टि के साथ लिखा  गया लेख है. लीला जी रवि बाबू के बालसाहित्य की गहन अध्येता रही हैं और उनके तथा क्षितिज राय के संयुक्त संपादन में  रवींद्रनाथ का बाल साहित्य भी दो खंडो में प्रकाशित हो चुका है. उनका लेख रवि बाबू की बाल साहित्य सृजन प्रतिभा तथा बाल साहित्य से जुड़े अनेक मुद्दों पर विस्तृत प्रकाश डालता है. सुकांत चौधरी अपने लेख babaabaaरवीन्द्रनाथ का lबाल साहित्य”  में एक अति महत्वपूर्ण बात कहते हैं  - रवीन्द्रनाथ अपने समय की शिक्षा व्यवस्था से बहुत नाखुश थे अपने स्कूल में उन्होंने यह निश्चित करने की कौशिश की कि सीखना और पढना सुकून और आनंद पहुंचा सके....उन्होंने बहुत सारी स्कूली  किताबें खुद ही तैयार की थी.
      डॉ. हरिकृष्ण देवसरे का मानना है कि रवीन्द्रनाथ के  बालसाहित्य में बालमन की उन्मुक्तता और स्वच्छंदता के दर्शन होते हैं. प्रकाश मनु लिखते हैं कि उनकी बाल कवितायें ऐसी हैं जिनमें बालमन कि इतनी सरल जिज्ञासा और इतना कौतूहल प्रकट हुआ कि इनको पढ़ते हुए हम पुनः बच्चे बन जाते हैं.अरुणा भट्टाचार्य का मानना है –टैगोर ऐसे पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने बच्चों की मानसिकता को अनिवार्य कारक के taurतौर पर  गंभीरतापूर्वक लिया. सुरेन्द्र विक्रम इस बात को रेखांकित करते हैं कि उन्होंने (रवीन्द्रनाथ) जितना बच्चों के लिए लिखा उतना ही बच्चों के विषय में भी लिखा. 
इन लेखों के अलावा रवीन्द्रनाथ  के बाल नाटकों, उनके बाल साहित्य में बच्चे, बाल चरित्र  उनकी  चिट्ठियों, जीवन स्मृति पर भी अनेक विद्वानों ( खगेन्द्रनाथ मित्र, रेखाराय चौधरी, इतिमा दत्त, तनूजा मजूमदार, समीरण चटर्जी, एस कृष्णमूर्ति, कानाई सामंत, ए.वी.सूर्यनारायण एवं के.चंद्रशेखरन) ने विमर्श प्रस्तुत किया है.
ओम प्रकाश कश्यप ने रविबाबू की पुस्तक छेल बेला को केंद्र में रख कर उनके बचपन के अनेक आयाम उद्घाटित किया हैं. वे लिखते हैं रवीन्द्रनाथ की प्रतिभा बहुआयामी है. लेकिन जब हम उनके जीवन का अध्ययन करते हैं तो यह साफ़ नज़र आने लगता की इसमें उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि से अधिक योगदान उनके परिवेश का था जिसमें समाज के तरह-तरह के लोगों की बहुतायत है.
पुस्तक का एक महत्वपूर्ण लेख है अमर गोस्वामी का जिसमें उन्होंने रवि बाबू के बाल/किशोर कथा साहित्य का आकलन किया है. गोस्वामी जी लिखते हैं –रवीन्द्रनाथ के बाल और किशोर-कथासाहित्य को तीन प्रकार से विभाजित किया जा सकता है – पहले प्रकार में ‘गल्पगुच्छ में संग्रहीत वे कहानियां हैं, जो यद्यपि बच्चों के लिए नहीं लिखी गेन, पर कथा नायक के किशोरे होने या बाल-किशोरे मनोविज्ञान पर आधारित होने के कारण उन्हें किशोरे कथाओं के संग्रह में संग्रहकर्ता शामिल करते रहे हैं. इसी तरह से ‘गल्पशल्प जिसका अनुवाद मैंने (अमर गोस्वामी ने) दद्दू की कहानियां नाम से किया है ....इन सारी कहानियों vavah में बतकही का जो मजा है, वह बांगला साहित्य में अन्य कथाकारों की कहानियों में दुर्लभ है
रवीन्द्रनाथ की दूसरे प्रकार की कहानियां वे हैं जिन्हें उन्होंने छोटे बच्चों की पाठ्यपुस्तकें तैयार करते हुए लिखी हैं....तीसरे प्रकार की कहानियों में ऐसी कहानियाँ मुख्य है, जो रूपकथा की शैली में लिखी गई हैं.
पुस्तक का अंतिम आलेख स्वयं संपादक देवेश का है जिसमें उन्होंने इस बात को गंभीरता से रेखांकित किया है कि रवीन्द्रनाथ की सार्वदेशिक लोकप्रियता का एक कारण यह भी है की वे अपने पाठकों को उसके बचपन और किशोरी में ही अपना बना लेते हैं, जिस अवस्था का  नेह-नाता पहले प्रेम की तरह आजीवन बना रहता है.
सारांश में यह पुनः कहा जा सकता है रवीन्द्रनाथ के बालसाहित्य प्रेमियों के लिए आलोचनात्मक दृष्टि से यह एक महत्वपूर्ण पुस्तक है जिसका स्वागत होना चाहिए.#
-          रमेश तैलंग
-          समीक्ष्य पुस्तक : रवीन्द्रनाथ ठाकुर का बालसाहित्य
-          संपादक –देवेन्द्र कुमार देवेश
-          प्रकाशक – विजय बुक्स
-          १/१०७५३ सुभाष पार्क, गली न. ३
-          नवीन शाहदरा, दिल्ली- ११००३२
-          प्रथम संस्करण – २०१३, मूल्य – ३५०/- रुपये 


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संपर्क:
५०६ गौर गंगा-१, सेक्टर-१, वैशाली,गाज़ियाबाद -२०१०१२


  

Saturday, May 25, 2013

दो नई ग़ज़लें




-१-


कुरेद देता हूं तो एक पल भभकती हैं.
ये वो चिंगारियां हैं, बुझती हैं न जलती हैं.

मशाल बनने की हसरत न हुई पूरी तो
ये गीली लकड़ियां रह-रह के धुआं करती हैं.

जिन्हें इतिहास में जगह न मिली थोड़ी-सी,
वो  अब भूगोल बदलने की बात करती हैं.

गज़ब तो ये कि कंगूरों पे है बहस ज़ारी
जहां इमारतों  की नीवें ही दरकती हैं .
  
हजारों ज़ख्म रिस रहे हैं ज़िस्म पर अब भी
कहाँ हैं वो हथेलियां, जो मरहम रखती हैं?

-२-

इस तरह मिल कि ये दिल बाग-बाग हो जाए
ऐसा भी मिलना क्या कि फूस आग हो जाए.

हथेली मेरी अगर छू ले हथेली उसकी,
महक मैं फूल की तो वो पराग हो जाए.

अषाढ़ चढ़ने लगादेखदेहरी सावन की
मेघ के साथ अब मल्हार राग हो जाए.

किसी के आने का संकेत है येशायद सच
अभी मुंडेर पे बोला है कागहो जाए|

दिल की आवाज सिर्फ दिल को ही सुनाई दे
ऐसा कुछ कर अभी बेबस दिमाग हो जाए.



Sunday, May 12, 2013

किसी बहाने सही




किसी बहाने  सही, याद मेरी आया करे. 
खुदा कभी भी उसे मुझसे न पराया करे.

ये रिश्ते भी बड़ी  नायाब चीज़  होते हैं 
दुआ करो कि इन्हें यूं न कोई ज़ाया करे.

शज़र लगाऊं जहां भी कहीं मोहब्बत का 
मैं चाहता हूं वो हर एक सर पे छाया करे.

भरा हो आंखों में सैलाब जब दुखों का तो 
ये ज़रूरी है कोई आ मुझे  रुलाया करे.

मैं हूं इंसान, हैं मुझमें भी हजारों कमियां
मेरी इस बात पे कोई तो यकीं लाया करे.

- रमेश तैलंग 


(चित्र सौजन्य: गूगल -हेमंत शेष)

Monday, February 11, 2013

तीन गीत




अगन में अगन 

जल में जल मिल जइहै,
अगन में अगन प्यारे!
रोके से न रुकिहै,
करो सौ जतन प्यारे!

वाणी है संतन की 
वेदन, पुरानन की.
का है जरूरत अब
भटकन, भटकावन की.

बंद द्वार खुल जइहैं
होई मुकत मन प्यारे!

परम शान्ति में एक दिन
होगी जब गति भंग
श्वेत-श्याम चादर यह
होगी सब एक रंग

माटी में माटी फिर
पवन में पवन प्यारे!

*

मन पत्थर का 

एक पाट  बुद्धि का
एक पाट उदार का.
दोनों के बीच ह्रदय 
धड़के बित्ता भर का.

भूख भुला दे सबको
अपना ईमान धरम.
और बुद्धि अहंकार-
का लहराए परचम.

डर है, न कर डाले
मन कहीं पत्थर का.

द्वन्द्व भरे जीवन की
अनदेखी गहराई 
पार करे कैसे
कोई गहरी ये खाई

एक भरोसा है बाकी
बस अपने अंदर का.

*

बतियाँ बिसर गईं.

बतियाँ बिसर गईं
बूढ़े-पुरानों की
कितनी कहानियाँ 
कितने जमानों की.

आगत, अनागत,
संभव, असंभव को,
काल धराशायी
करता गया सबको,

गूंजें-अनुगूंजें भी
शक्तिहीनों के रहीं 
न रहीं शक्तिवानों की.

विस्मृति के दंश खा
स्मृति को मांजना
दुहकर हो गया, योग
दोहरा ये साधना

पाकर भी क्या होगा  
सपने वीरानों के,
सुधियाँ वीरानों की.

(अक्षरम संगोष्ठी से साभार)
pic. credit : google search 

Monday, November 12, 2012

आज बस इतना ही....'दीप-पर्व' आपको मंगलमय हो.





एक बेल रोशनी की जब से चढी है छत पर
छत ले रही बलैयां बाहों में उसे भर-भर.

कोई खुशी अचानक उतरी है आसमां से 
बच्चे के हाथ आए जैसे पतंग कट कर.

ढलते ही शाम सूनी देहरी के भाग जागे,
कोई अभी गया है नन्हा-सा दीप रख कर.

ओ चांद, मेरे वीरा, अब तो जरा बता दे,
मेले में खो गया तू हमसे कहां बिछड़ कर?

दरवाजा खोले चौपट है नाच रही बिटिया 
आएंगी लच्छमी घर, आएंगी लच्छमी घर.

-रमेश तैलंग 



चित्रा सौजन्य: गूगल 

Wednesday, November 9, 2011

तितली उड़ी

-रमेश तैलंग


चंकी! बारह साल का लड़का। बिलकुल तुम्हारी तरह, थोड़ा नटखट और शैतान।
हर रोज सुबह होते ही वह कंपनी बाग की ओर निकल जाता। चंकी के मम्मी-पापा सोचते, अच्छा लड़का है। सबेरे से उठता है, घूमने जाता है। साथ में किताबें भी ले जाता है। सुबह की ताजी हवा में तन-मन दोनों स्वस्थ रहते हैं। स्मरण शक्ति भी ठीक काम करती है। फिर चंकी है भी पढ़ाई-लिखाई में तेज। पर यहां उसकी पढ़ाई-लिखाई की बात थोड़े ही हो रही है। यहां तो बात हो रही है उसके पागलपन तक आए शौक की। शौक भी कैसा? तितलियां पकड़ने का।
चंकी को रंग-बिरंगी तितलियां ज्यादा ही लुभातीं। वह उन्हें पकड़ने के लिए उनके पीछे-पीछे भागता। पर तितलियां क्या ऐसे हाथ आती हैं भला? चंकी उन्हें पकड़ने के लिए जैसे ही हाथ बढ़ाता, वे फुर्र से उड़ जातीं इधर से उधर। हां, कभी-2 इक्की-दुक्की तितली हाथ आ भी जाती चंकी के। फिर जानते हो, चंकी क्या करता उसका? झट से अपनी किताब के पन्नों के बीच में दबा देता। च्च। च्च। च्च! बेचारी तितली। पन्नों के बीच में दबते ही प्राण-पखेरु उड़ जाते उसके।
तुम पूछोगे, चंकी को दुख नहीं होता तितली के मरने का? बिलकुल नहीं। उसे तो खुशी होती कि उसकी किताब के पन्नों के बीच एक नहीं, दो नहीं, पूरी पच्चीस तितलियां बंद हैं। मर गई तो क्या हुआ? उसका जब मन करता है, उनके रंग-बिरंगे पंख तो छू कर देख लेता है वह।

तितलियों वाली किताब चंकी को सबसे छुपा कर रखनी पड़ती घर में। यहां तक कि गुड्डी को भी उसकी खबर नहीं होती। उस दिन की बात चंकी भूला थोड़े ही था जब एक बार वह गुड्डी को भी ले गया था कंपनी बाग में। गुड्डी को चंकी का तितलियां पकड़ना और उन्हें किताब में कैद कर लेना बिलकुल अच्छा नहीं लगा था। उल्टा उसने तो चंकी को टोका था- ‘छिः ! छिः! भैया, ऐसे जीव हत्या करने से तो पाप लगेगा तुम्हें।’ चंकी ने गुड्डी को झड़प कर चुप कर दिया था- ‘अच्छा, अच्छा रहने दे अपना भाषण। कल से मत आना तू मेरे साथ।’
उस दिन के बाद से चंकी अकेला ही कंपनी बाग आता। लेकिन गुड्डी की ओर से उसे खटका बना ही रहता। कहीं तितलियां पकड़ने की बात उसने मम्मी-पापा का बता दी तो? पटाने के चक्कर में चंकी कभी-कभी टाॅफियां, बिस्कुट भी देता रहता गुड्डी को। इधर गुड्डी भी चंकी को धमकी देने के अंदाज में बोल देती- ‘क्या भैया, हर बात ये सस्ती टाॅफियां पकड़ा देते हो। आज तो केडबरीज मिल्क चाॅकलेट ही दिलानी पड़ेगी।’ गुड्डी की यह फरमाइश चंकी को भारी पड़ जाती। अपने जेबखर्च में कटौती करके उसे गुड्डी का मंुह बंद रखना पड़ता।
पर वो कहावत है न कि चोरी और झूठ छुपाए नहीं छुपते। बस, यही हुआ चंकी के साथ। एक दिन चंकी की देहरादून वाली बुआ छुट्टियों में आ पहुंची घर। पब्लिक स्कूल में पढ़ाती थीं वे, इसलिए सभी उन्हें टीचर बुआ कह कर पुकारते थे। वे एक दिन बैठक में झाड़-पोंछ कर रही थी, तभी सोफा-कवर के नीचे रखी कोई सख्त चीज महसूस हुई उन्हें। यह वही किताब थी जिसमें चंकी ने मरी हुई तितलियां कैद कर रखी थीं। टीचर बुआ को जब गुड्डी से सारा किस्सा मालूम हुआ तो शाम को उन्होंने चंकी को बुला कर पूछा-‘‘चंकी, तुम्हें तितलियां बहुत पसंद हैं?’
‘बहुत, टीचर बुआ!’ चंकी ने उत्तर दिया।
‘मुझे भी बहुत पसंद हैं।’
‘सच, टीचर बुआ?’
‘और नही ंतो क्या मैं झूठ बोल रही हूं? अच्छा सुनो चंकी, कल सुबह मैं, तूम, गुड्डी तीनों कंपनी बाग चलेंगे।’
‘प्रोमिज, टीचर बुआ? चंकी खुशी से उछल पड़ा सुन कर।’
प्रोमिज।’
अगले दिन टीचर बुआ, चंकी और गुड्डी तीनों सुबह-सुबह कंपनी बाग पहुंच गए। जैसी कि चंकी की आदत थी, तितली को देखते ही चंकी ने उसे पकड़ने की कोशिश की पर उससे पहले ही टीचर बुआ ने चंकी का हाथ पकड़ लिया और बोलीं-‘ठहरो, चंकी, आज हम तितलियों को हाथ से नहीं पकड़ेंगे बल्कि उन्हें बिना पकड़े ही कैद करेंगे।’
‘वा कैसे टीचर बुआ? चंकी खीझने लगा था टीचर बुआ पर।
‘ऐसे’! टीचर बुआ अब तक पर्स के अंदर से डिजिटल कैमरा निकाल चुकी थी और तितली पर निशाना साध कर उन्होंने ‘शटर’ दबा दिया था। इसके बाद चंकी और गुड्डी ने भी उड़ती तितलियों के कई चित्र खींचे थे। चंकी यह सोच कर खुश था कि उसके पास तितलियों क ेअब बहुत से खूबसूरत चित्र होंगे।
छुट्टियां खत्म होने पर जाते-जाते टीचर बुआ अपना कैमरा चंकी को दे गई थीं और अंग्रेजी में समझा गई थीं-‘शूट एवरी थिंग माय चाइल्ड, बट विद कैमरा, नाॅट वाय गन।’
चंकी ने टीचर बुआ की बात गांठ बांध कर रख ली थी।



चित्र सौजन्य: गूगल सर्च

किस्सा बनो बुआ का

किस्सा बनो बुआ का
-रमेश तैलंग




बनो बुआ की गप्प मंडली और खिलखिलाती हंसी दोनो ही सारे मोहल्ले में मशहूर थीं। उनके मोती जैसे दांत जब चमकते ता बिजली सी कौंध जाती आंखों के आगे। पर हाय री किस्मत! एक दिन उनका पैर सीढ़ी से क्या फिसला, चारों खाने चित्त हो कर पड़ गईं बनो बुआ। दायीं टांग और कमर में तो चोट आयी ही, आगे के चार दांत टूट कर गिर गए सो अलग।
अब असली दांत टूट गए तो या तो नकली दांत लगवाती बनो बुआ या फिर इस तीस साल की उम्र में छोटे-बड़ों से ‘बोंगी बुआ’, ‘बोंगी बुआ’ कहलवाती खुद को।
सोच में डूबी बनो बुआ कुछ फैसला नहीं कर पा रही थीं कि सलमा चाची ने उनके दिल के घावों को और हरा कर दिया। बोलीं- ‘ हाय बनो! तुम्हारी तो चांद सी सूरत ही बिगड़ गई। सुना है अब नकली दांत लगबाओगी तुम! मेरी मानो तो ये मसाले के दांत मती लगवाना, पता नहीं मरे क्या गंद-संद मिलावे हैं मसाले में। वो क्या कहें, आजकल तो सोने के दांत भी बन जावे हैं, वही लगवाना। दमक उठेगा ये मुखड़ा।’
सलमा चाची की बात बनो बुआ के कलेजे में सीधी उतर गई। उन्होंने निश्चय कर लिया कि लगवाऊंगी तो सोने के दांत ही लगवाऊंगी। बस, घर में जो थोड़ा-बहुत सोना था लगा दिया ठिकाने और बनवा लिये सोने के दांत।
कुछ दिन ही बीते थे कि सलमा चाची ने फिर एक उल्टा पांसा फेंक दिया। बोलीं-‘अरी बनो! ये क्या सुबह-शाम खीं ..खीं ..कर हंसती रहे है। सोने के दांत हैं, सबकी नजर में आते हैं। किसी दिन किसी चोर उचक्के की नीयत बिगड़ गई देख कर तो सीधा टेंटुआ दबा देगा। मैं कहूं हूं जरा मुंह बंद रखा कर अपना।’
सलमा चाची की बात सुन कर बनो बुआ के बदन में काटो तो खून नहीं। ये तो और मुसीबत मोल ले ली सोने के दांत लगवा कर। अब मोहल्ले की औरतें, बच्चे हंसी-ठठ्ठा करेंगे तो बनो बुआ क्या मुंह पर ताला लगा कर बैठेगी? हंसी के मौके पर हंसी तो आयेगी ही, हंसी आयेगी तो मुंह खुलेगा ही और मुंह खुलेगा तो सोने के दांत भी चमकेंगे चम-चम। पर किसी की नीयत सच में खराब हो गई तो? किसी ने सचमुच लालच में आकर गला दबा दिया तो। इन सवालों ने बनो बुआ की हंसी-खुशी सब छीन ली।
बनो बुआ को गुस्सा आता सलमा चाची पर। आखिर उन्ही के कहने पर तो लगवाये थे सोने के दांत। अब वो ही बातों-बातों में जान-माल का खतरा जता गईं।
पशोपेश में फंसी बनो बुआ एक दिन आईने के सामने बैठी थीं कि खुद को देख कर हैरान रह गईं। चेहरे पर आधा बुढ़ापा झलक आया था कुछ ही दिनों में। जब हंसी ही चली गई रूठ कर तो बनो बुआ की जवानी किसके बल पर ठहरती?
बस........बैठे-बैठे ही बनो बुआ को न जाने क्या सूझा कि उन्होंने एक झटके से अपने मुंह में फंसे सोने के दांत निकाल लिए और कमरे में पड़ी पेटियों के पीछे फेंक कर खुद से ही बोली- ‘ ले बनो! खत्म हुआ ये बबाल। अब खूब हंसा कर।
खिल-खिल...खिल।
बनो बुआ की गप्प मंडली, जिसमें अब सलमा चाची को छोड़ कर मोहल्ले की लगभग सभी औरतें और बच्चे हाते, फिर पहले की तरह जुड़ने लगीं। खूब चुहलबाजियां होतीें, मजाब होते और बनो बुआ जी खोल कर हंसतीं। बनो बुआ का बोंगा मुंह देख कर बच्चे भी खुश होते और बार-बार कहते- ‘बनो बुआ! और हंसो! बेंगी बुआ, और हंसो!’ बच्चों के साथ बनो बुआ हंसती ही चली जाती, खिल...खिल...खिल...खिल!


चित्र सौजन्य: गूगल सर्च

Monday, November 7, 2011

मेरी चार ग़ज़लें

(व्यंग्य-यात्रा-नवंबर २०११ अंक से साभार )

१.
साठ-सत्तर फीसदी दर पर खरीदी जाएंगी
और फिर ताबूतों में सब बंद कर दी जाएंगी.

वाह री किस्मत, किताबें हिंदी में साहित्य की
अब दहाई में बड़ी मुश्किल से बेचीं जाएंगी.

ज़िन्दगी अपनी खपा कर चल दिए लिख-लिख के जो,
खावाहिशें उनकी सुना है बस अधूरी जाएंगी.

चार, छह तमगे, समोसे, चाय और कुछ तालियाँ
लेखकों के साथ अब ये चंद चीजें जाएंगी.

सोचता हूं, क्या करेगा आदमी बाज़ार में
जब सभी संवेदनाएं जब्त कर ली जाएंगी.

२.

वह कहता था, वह शब्दों की खेती करता है.
और ज़िन्दगी जीते-जीते, पल-पल मरता है.

खुद्दारी पहचान बनी जब से उसकी, तब से
हर आईना उससे नज़र मिलाते डरता है.

अस्पताल में एक दिन शैया पर वह पड़ा हुआ
लगा पूछने -'खोटा सिक्का कब तक चलता है?

उसको अक्सर ही दौरे आते ठे अजब-अजब,
जिन्हें ज़माना बहुत बड़ा पागलपन कहता है.

बुरे वक्त में एक कलम की पूँजी थी उसकी,
पास अदीबों के इससे ज्यादा क्या रहता है?

३.

सच कहा साहित्य से रोटी नहीं चलती.
क्या करूँ, मन पर ज़बरदस्ती नहीं चलती.

ज़िन्दगी में दुःख लिखे हैं तो चलो ये ही सही,
ज़िन्दगी में हर समय मस्ती नहीं चलती.

वो नदी हो या समंदर पर सुना हमने यही
हौसलें टूटे हों तो कश्ती नहीं चलती.

शौक से पाला है जिसने भी जुनूँ फनकारी का
उसके पेशे में कभी ज़ल्दी नहीं चलती.

जिसको जो देना था उसने वो खुशी से दे दिया
उसके आगे आपकी मर्ज़ी नहीं चलती.

४.

वो जहां होगा मचायेगा वहां पर शोर ही.
रोशनी को खींच कर लाएगा कोई और ही.

देख लो इतिहास का पन्ना कोई भी खोल कर
इंकलाबी पहला होगा बस कोई कमज़ोर ही.

रहनुमाई में रखा है मुझको जब से आपने
जानलेवा लग रहा है अपने मुंह का कौर ही.

वो तरक्की क्या संवारेगी हमारी ज़िन्दगी
जो हमें लगती रही ताउम्र आदमखोर ही.

-रमेश तैलंग
09211688748









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Sunday, July 10, 2011

विश्व की महान क्लासिक कृतियों का संक्षिप्त हिंदी रूपांतर


गत कुछ वर्षों में विश्व की गिनी-चुनी महान क्लासिक कृतियों का देवेन्द्र कुमार एवं रमेश तैलंग द्वारा किशोरों के लिए किया गया संक्षिप हिंदी रूपांतर बच्चों की प्रिय मासिक पत्रिका "बाल भारती" में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुआ था. उसके पश्चात यह रूपांतर दो पुस्तकों के रूप में कृमशः -अमर विश्व किशोर कथाएं -प्रकाशक ए.आर.पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली तथा विश्व प्रसिद्ध किशोर कथाएं ओरिएंट क्राफ्टपब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली से मुद्रित हो कर भी आया. अब इसका डिजिटल टेक्स्ट रूप मेरे दो ब्लोगों कृमशः : nanikichiththiyan.blogspot.com और vishwabalsahitya.wordpress.com पर भी जिज्ञासु पाठकों के लिए उपलब्ध कराया जा रहा है. आशा है आप सब इसे पसंद करेंगे और अपनी प्रतिक्रिया से हमें जरूर अवगत कराएँगे. हमारा मेल आई.डी. है: rtailang@gmail.com, devendrakumar123@hotmail.com

इस श्रंखला में सबसे पहली कृति हाईडी है. बस जरा-सी प्रतीक्षा करें.

रमेश तैलंग.

image courtesy: google search

Sunday, May 22, 2011

बाल गीत - अम्माँ की रसोई में

हल्दी दहके, धनिया महके,
अम्माँ की रसोई में ।

आन बिराजे हैं पंचायत में
राई और जीरा ।
पता चले न यहाँ किसी को
राजा कौन फकीरा ।
सिंहासन हैं ऊँचे सबके
अम्माँ की रसोई में ।

आटा-बेसन, चकला-बेलन,
घूम रहे हैं बतियाते ।
राग-रसोई बने प्यार से
ही अच्छी, ये समझाते ।
रूखी-सूखी से रस टपके
अम्माँ की रसोई में ।

थाली, कड़छी और कटोरी,
को सूझी है मस्ती।
छेड़ रही है गर्म तवे को
दूर-दूर हँसती-हँसती।
दिखलाती हैं लटके-झटके
अम्माँ की रसोई में।