Wednesday, October 21, 2015

डा० श्रीप्रसाद की बालकविताओं का रचनात्मक वितान - रमेश तैलंग

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हिंदी के सिरमौर बालकवि डा श्रीप्रसाद की बालकविताओं को पढ़ते हुए एक रोमांचक अनुभूति होती है। इन कविताओं में वे सभी विशिष्टताएं दिखती हैं जो एक बाल कविता को श्रेष्ठ बाल कविता बनाती हैं। इनमें से एक है — देशज शब्दों का मुक्त प्रयोग।
     श्रीप्रसाद जी देशज शब्दों का खुलकर प्रयोग करते हैं जो उनकी कविताओं मे एक अद्भुत चमत्कृति पैदा करता है। उदाहरण के लिये श्रीप्रसाद जी की सर्वाधिक लोकप्रिय बालकविता च्च्हाथी चल्लम चल्लमज्ज् को लें जो बच्चों के पाठ्यक्रमों में भी शामिल है, तो इसमें हौदा, चल्लम, हल्लम, फ़ट्टर-फ़ट्टर, थल्लर-थल्लर, धम्मम-धम्मम आदि ऐसे शब्द हैं जिनकी आवृत्ति तथा पुनरावृत्ति बच्चों को पढ़ते-सुनते समय एक अलग ही तरह का आनंद देती है। हाथी की विशाल काया और मस्त्ती भरी चाल को यह शब्दावली पूरी तरह से जीवंत कर देती है —
हल्लम-हल्लम हौदा, हाथी चल्लम-चल्लम
हम बैठे हाथी पर, हाथी हल्लम-हल्लम
लंबी-लंबी सूँड़ फ़टाफ़टे, फ़ट्टर-फ़ट्टार
लंबे-लंबे दाँत खटाखट, खट्टर-खट्टर
दिनभर घूमेंगे हाथी पर, हल्लर-हल्लर
हाथी दादा, जरा नाच्दो, थल्लर-थल्लर
अरे नहीं, हम गिर जाएंगे, घम्मम-घम्मम
हल्लम-हल्लम हौदा, हाथी चल्लम-चल्लम

और यही कविता क्यों? श्रीप्रसाद जी की अन्य कविताओं मे भी ऐसे कई प्रयोग है,  जैसे — भक्काटे, धिनधिनताम, कुइयाँ, गुइयाँ, धिनतका इत्यादि। ऐसे शब्दों का यथोचित प्रयोग वही बालकवि कर सकता है जिसकी जड़ें किसी भी रूप में ग्रामीण तथा संगीतात्मक पृष्ठ्भूमि से जुड़ी हुई हों। श्रीप्रसाद जी को जिन्होंने व्यक्तिगत रूप से देखा है वे उनकी वेश-भूषा, आचार-व्यवहार, मृदुभाषिता तथा विनम्रता से भली-भांति परिचित होंगे और उनके इस व्यक्तित्व की झलक कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं प्रच्छ्न्न रूप में उनकी रचनाओं मे भी मौज़ूद दिखाई देती है।
खेल-कूद, और मनोरंजन, श्रीप्रसाद जी की बाल कविताओं के प्रमुख विषय हैं। पतंगवाजी भी इन्ही खेलों मे से है, और यह शौक भला किस बच्चे को प्रिय नहीं होगा ? जब पन्द्रह अगस्त या अक्षय तृतिया का पर्व आता है तब तो पतंगों से संपूर्ण आकाश आच्छादित हो जाता है और वो काटा भक्काटा! की आवाजें दूर-दूर तक गुंजायमान होने लगती हैं। इस गूंज को भक्काटे कविता में बखूबी सुना जा सकता है —
पीली, लाल, गुलाबी, नीली, भक्काटे!/ऊपर उड़ती हैं चमकीली भक्काटे!
कटी एक तो शोर हो रहा भक्काटे!/हो-हो चारों ओर हो रहा भक्काटे!

छंद के विधान पर श्रीप्रसाद जी की पूरी पकड़ है। इसीलिये उनकी बालकविताओं मे आरंभिक टेक, लय और गीतात्मकता का समुचित निर्वाह देखने को मिलता है। बाल कविताओं मे ध्वन्यात्मक शब्दों की बारंबारिता का अपना अलग प्रभाव होता है और ऐसी बाल कविताएँ बच्चों को याद जल्दी हो जाती हैं क्योंकि उनमें सामूहिकता का भाव भी अन्तर्विद्ध रहता है।
कुछ ऐसी ही बालकविताएँ देखिये –

जोर लगाएँ, ऊपर जाएँ, हैया हो!/आसमान में धूम मचाएँ हैया हो!/
चाँदी से चंदा पर खेलें, हैया हो! /वहाँ कठिन मौसम को झेलें हैया हो!/
****
गोल बनाकर आओ नाचें, झूमें गाएँ - ताकधिना/
दोनों हाथों को फ़ैलाकर हाथ मिलाएँ -ताकधिना!/
ओहोहो हम सब कितने हैं/सब आ जाएँ-ताकधिना/
ताली दे-देकर के नाचें/मिलकर गाएँ-ताकधिना!
****
पेड़ खड़े हैं जंगल में, धिनतका /पहलवान हैं दंगल में, धिनतका/
फ़ूल पेड़ पर आएँगे, धिनतका /पहलवान लड़ जाएँगे धिनतका/
****

भारत जैसे देश मे जहाँ बच्चों की बड़ी आबादी ग्रामीण परिवेश से आती है, उन्हें श्रीप्रसाद जी की बालकविताएँ पढ़ने-सुनने मे बिलकुल अपनी-सी लगें तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिये। बच्चों की कल्पना का आकाश कितना विस्तीर्ण हो सकता है यह उनकी इस बाल कविता मे स्पष्ट्त: देखा जा सकता है —

रसगुल्ले की खेती होती, बड़ा मजा आता/
चीनी सारी रेती होती, बड़ा मजा आता/
बाग लगे चमचम के होते बड़ा मजा आता/
शर्बत के बहते सब सोते बड़ा मजा आता/...
लड्डू की सब खानें होतीं बड़ा मजा आता/
घर मे दुनिया पेड़े बोती बड़ा मजा आता/
रुपये की दस किलो मिठाई बड़ा मजा आता/
होते रुपये पास अढ़ाई बड़ा मजा आता/

हां, इस कविता को पढ़्ते समय एक समस्या आजकल के पब्लिक स्कूल में पढ़ रहे बच्चों के सामने अवश्य आ सकती है और वह समस्या है च्च्अढाईज्ज् शब्द की। ऐसे समय में जब आठ आने और पचास पैसे के सिक्के चलन से बाहर हो गए हैं तब अढ़ाई रुपये को किस तरह बच्चे की समझ में डाला जाएगा यह बात कविता पढाने/सुनाने वाले को अवश्य परेशान करेगी! इन पंक्तियों के लेखक को भी अपना एक बालगीत च्च्टिन्नी जी ओ टिन्नी जी ये लो एक चवन्नी जी...ज्ज् इसी कारण चलन से बाहर होता दिखाई पड़ रहा है। पर साहित्य में नये शब्दों का प्रवेश और पुराने (निष्क्रिय हो गये) शब्दों का निष्कासन कोई नई बात नहीं है। ऐसा पहले भी होता रहा है और आगे भी होता रहेगा क्योंकि भाषा तो बहता नीर है। इसलिये मात्र इस बिना पर इस मजेदार कविता का रसभंग नहीं हो सकता. इसका मज़ा तो बच्चे और बड़े सभी लेंगे इसमें संदेह नहीं।
                कल्पना की ऐसी उड़ान  भरती हुई कुछ अन्य कविताएं भी हैं –

एक पेड़ पर विद्यालय हो/एक पेड् पर खाना
डाली-डाली पर हम बैठें/वहीं पढें मिल करके
बातें करें, हँसे हम बच्चे/फ़ूलों से खिल करके
बजे वहीं पढ़्ने का घंटा/कोयल गाए गाना
********

आठ फ़ीट की टांगें होतीं/चार फ़ीट के हाथ बड़े
तो मैं आम तोड़कर खाता/ धरती से ही खड़े-खड़े
कान बड़े होते दोनों ही/दो केले के पत्ते से
तो मैं सुन लेता मामा की/ बातें सब कलकत्ते से
****
बच्चों का संसार सिर्फ़ माता-पिता, घर-परिवार तक सीमित नहीं होता, उस संसार में पशु, पक्षी, पेड़, फ़ूल, हवा, पानी, बादल, बिजली, पठन-पाठन, खेल-कूद सभी शामिल होते हैं। श्रीप्रसाद जी ने अपने बालकाव्य में इन सभी को समेटा है और यही कारण है कि उनकी बालकविताएं एक विस्तृत फ़लक पर खड़ी नज़र आती हैं। पारंपरिक खेल तो वैसे भी हमारे समाज से विदा ले चुके हैं और उनके साथ-साथ पारंपरिक खेलगीत भी स्मृति से लुप्त हो गए हैं इसलिये बालसाहित्य मे जब इक्के-दुक्के खेलगीत कहीं दिखाई देते हैं तो लगता है जैसे सूखी मिट्टी पर पानी का छिड़्काव हो गया हो और उसकी महक पूरे वातावरण में फ़ैल गई हो। श्रीप्रसाद जी के कुछ खेल गीतों के अंश यहां देखिये –

 छुक-छुक गाती बढ़्ती जाती रेल हमारी
डिब्बों में बैठी हँसती हर एक सवारी
*****
तीन कुर्सियाँ आगे रक्खीं
पीछे रक्खी एक, हमारी घोड़ागाड़ी!
पीछे की कुर्सी पर बैठे
दादा लाठी टेक हमारी घोड़ागाड़ी!
तीनों घोड़े चले दौड़कर
सरपट-सरपट चाल, हमारी घोड़ागाड़ी!
चट से नानी के घर पहुँचे
कैसा किया कमाल हमारी घोड़ागाड़ी!
 
****

आओ आओ, आओ, खेलें/आओ खेलें गुइयाँ
छत पर खूब चाँदनी छाई/ जैसे उतरा चंदा/
गाना मीठा-सा गाएगी / नन्ही-नन्ही नंदा
सोने के गोटे की साड़ी पहने आई टुइयाँ
*******

श्रीप्रसाद जी उस पीढ़ी के बालकवि हैं जिन्होंने परतंत्रता और स्वतंत्रता दोनों का समय देखा है और जिस तरह पं सोहन लाल द्विवेदी, द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी जैसे प्रभृति कवियों ने देशप्रेम और प्रयाण के गीत लिखे हैं उसी तरह श्रीप्रसाद जी ने भी अनेक ऐसी बाल कविताएं लिखी हैं। जिनमें से कुछके अंश यहां प्रस्तुत हैं :

चलो सिपाही, वीर चलो तुम/आगे चलो सिपाही/
मिलकर चलो, मिलेगी मंजिल तुमको तब मनचाही/

****

सिर ताने, सीना ताने/हम चले वीर मस्ताने
हम चले हवा की गति से/हम चले एक ही मति से/
गाते साहस के गाने/हम चले वीर मस्ताने!
****

भारत अपना देश, देश की मिट्टी कितनी प्यारी
भारत बने महान, कामना रहती यही हमारी

परियां यथार्थ मे हों न हों पर बच्चों की कल्पना में वे अवश्य होती हैं, और उन बच्चों को सबसे अधिक आकर्षित करती हैं जो अकेलेपन क अभिशाप झेलते हुए किसी ऐसे सहारे को खोज रहे होते है. जो उनसे दोस्त की तरह बात-चीत कर सके, और उनके निराश मन को आशा के भाव से भर सके !
एक परी है नीली -नीली/एक परी है हरी-हरी/एक परी है पीली, जिसकी/फ़ूलों से है फ़्राक भरी
तीनों परियाँ गाना गातीं/नाच दिखाती छम-छम-छम/आओ, आओ, इन तीनों/सुंदर परियों को देखें हम।

हाशिये पर पडे बच्चों और खासकर लड़्कियों पर बहुत कम कवियों ने कलम चलाई है फ़िर लड़कियों में भी कामवाली की बेटी हो तो वह और भी ज्यादा उपेक्षित होती है.........
पर श्रीप्रसाद जी की नज़र ऐसे पात्रों पर भी नहीं चूकी है —

लड़की अंतरिक्ष में जाती/साहस इतना भारी/लड़की खेल रही खतरों से/लड़की कभी न हारी
यह प्रकाश लेकर निकली है/मिटा रही है अंधियारी/लड़्की अंतरिक्ष में जाती/साहस इतना भारी
*****
आई है महरिन की बेटी/महरिन आज नहीं आएगी
यही आज मांजेगी बरतन/झाड़ू करके घर जाएगी..
नाम रमोला है लड़की का/कोयल जैसा स्वर पाया है
एक बार गाया था गाना/लगा, स्वर्ग नीचे आया है
*****

                इन कविताओं के अलावा  और भी विविध विषय है जिन पर श्रीप्रसाद जी ने अपना कमाल दिखाया है। उनके सैंकड़ों शिशुगीत हैं जिन पर विस्तृत टिप्पणी की जा सकती है, पर यह एक इतर विषय है। बच्चों की कविताएं आकार में छोटी हों तो उनकी ज़बान पर आसानी से चढ़ती हैं। इस बात से श्रीप्रसाद जी भी सहमत है. तभी तो वे लिखते हैं –

बच्चे छोटे हैं, जिनकी हैं छोटी-छोटी कविताएँ/छोटे मुँह से बच्चे अपनी छोटी कविताएँ गाएँ
छोटी बात अगर अच्छी है, अगर सही, है बात बड़ी/समय बड़ा है जिसे बताती/बिल्कुल छोटी एक घड़ी/

फ़िर भी कतिपय जगहों पर श्रीप्रसाद जी की कुछ बालकविताएं आकार में थोड़ी बड़ी हो गई हैं और कुछ ऐसी भी हैं जो अपने रचाव-कसाव में सामान्य हैं पर यह बात उनकी श्रेष्ठ कविताओं को प्रभावित नहीं करती और वे हर तरह से आधुनिक हिंदी बालकविता के शीर्ष प्रणेताओं में ही शुमार होते हैं। ***

सम्पर्क :

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देखी तेरी दिल्ली-1



गर्भनाल से साभार-

देखी तेरी दिल्ली-1



नई दिल्ली इलाके में जहां आज पालिका बाज़ार है, वहां 70-80 के दशक में कभी थिएटर कम्युनिकेशन बिल्डिंग और काफ़ी हाउस हुआ करते थे। काफ़ी हाउस में नामचीन लेखकों, कलाकारों का जमघट लगा रहता था और साहित्य-कला-संस्कृति-राजनीति पर बहस-मुबाहसे चलते रहते थे। थियेटर कम्युनिकेशन बिल्डिंग में हिंदी साहित्य सम्मेलन दिल्ली का भी शायद कार्यालय था और कभी-कभार वहां साहित्यिक गोष्ठियां होती रहती थीं। ऐसी ही एक गोष्ठी में मैंने डा. रवीन्द्र भ्रमर का नवगीत पाठ सुना था। कनाटसर्कस में रीगल बिल्डिंग से सटा गेलार्ड रेस्ट्रां और उससे सटा हुआ टी हाउस साहित्यिकारों-पत्रकारों का एक और स्थायी अड्डा था जिसकी जमघटों का पूरा ब्योरा बलदेव बंशी द्वारा संपादित किताब “ एक था टी हाउस” में मौजूद है। साहित्यकारों-पत्रकारों, जिनमें-चुप्पे हुड़दंगे, पियक्कड़-चिपक्कड़ सभी तरह के व्यक्तित्व थे, के हर शाम मिलने के लिये ’टी हाउस” जैसी जगह दिल्ली के इतिहास में शायद न तो दूसरी थी और न ही कभी होगी। सुप्रसिद्ध गांधीवादी लेखक-नाटककार विष्णु प्रभाकर के लिये तो वहा एक टेबल सुरक्षित ही रहती थी।  हर शाम उन्हें अजमेरी गेट से कनाटप्लेस तक पैदल आते-जाते अक्सर देखा जा सकता था। वेशभूषा- वही खादी का कुर्ता-पायजामा, सफ़ेद टोपी, कंधे पर लटका झोला और चेहरे पर हमेशा की तरह सौम्य भाव।
उन्हीं दिनों कादंबिनी पत्रिका में प्रूफ़रीडर के पद पर कार्यरत स्वामीशरण स्वामी से मेरा परिचय हुआ जो जनवादी कविताओं का एक संकलन संपादित कर रहे थे। उस संकलन में अनेक कवियों की रचनाओं के साथ मेरे भी दो गीत और एक गज़ल शामिल किये गए थे। स्वामीशरण स्वामी नाटे कद और श्याम वर्ण के व्यक्ति थे वे हिंदुस्तान टाइम्स की यूनियन की मीटिंगो में सक्रिय कार्यकर्ता बनकर अक्सर जनवादी/क्रांतिकारी कविताएं टेबलनुमा मंच से सुनाया करते थे। एक बार वे मुझे हनुमान मंदिर के सामने स्थित पश्चिम बंगाल सूचना केंद्र में आयोजित एक साहित्यिक संगोष्ठी में ले गए। वहां पहली बार मुझे सुप्रसिद्ध कथाकार, नाटककार, अभिनेता और बलराज साहनी के छोटे भाई भीष्म साहनी तथा हिंदी सानेट को प्रतिष्ठित करने वाले वरिष्ठ कवि त्रिलोचन के दर्शन हुए। त्रिलोचन जी ने अध्यक्ष के रूप में सबसे बाद में “ताप के ताये हुए दिन” से कुछ कविताएं सुनाईं। उनसे पहले अन्य कवियों के साथ हम जैसे नौसिखिए कवियों को भी एक दो कविताएं सुनाने का मौका मिला। तेज मिजाज के गीत लिखने का तब नया-नया शौक लगा था मुझे उन्हीं में से एक गीत, –“अपमानित होगी जब खुली हथेली/तो फ़िर/बंद मुठ्ठियां होंगीं, और एक गज़ल “जिस तरह से सवाल उठते हैं, उस तरह से मिले जवाब कोई/बढ़ गईं दिन-व-दिन क्यूं तकलीफ़ें, पूछे उनसे जरा हिसाब कोई” मैंने सुनाई थीं।
       इन दिनों दैनिक हिंदुस्तान के संपादक श्री चंदूलाल चंद्राकर थे और उनके कार्यकाल में प्रशिक्षु उपसंपादकों का एक पूरा समूह भर्ती हुआ था। इन प्रशिक्षुओं में कुछ मेरे मित्र बने जिनके नाम सतीश कौशिक, सतीश सागर और आनंद शर्मा (पूरा नाम-आनंद वल्लभ शर्मा) थे। सतीश कौशिक फ़िल्मसमीक्षाएं लिखा करते थे। सतीश सागर और आनंद शर्मा कवि थे। यदि मैं गलत नहीं हूं तो आनंद शर्मा के माध्यम से ही मैं अपने प्रिय गीतकार स्व. रमेश रंजक से मिला था। मौका था –एन.डी.एम.सी के सभागार में आयोजित एक कविसम्मेलन जिसमें रमानाथ अवस्थी, रामावतार त्यागी, रमेश गौड, मधुर शास्त्री आदि के साथ रमेश रंजक ने भी कवितापाठ किया था। रामावतार त्यागी ने “ इस सदन में मैं अकेला ही दिया हूं, जब मिलेगी रोशनी मुझसे मिलेगी/ तथा “बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं/आदमी हूं, आदमी से प्यार करता हूं”, रमानाथ अवस्थी ने “ भीड़ में भी रहता हूं वीरान के सहारे/जैसे कोई मंदिर किसी गांव के किनारे/”, और रमेश रंजक ने अपना नया गीत सुनाया था –“तिनका जल तैरेगा, डूबेगी कंकरी/मत बोलो, मत बोलो, वाणी दशकंधरी”।
कवि सम्मेलन समाप्त होने के बाद मैं और रमेश रंजक उनके आरामबाग स्थित निवास पर गए। वहां उनसे उनका एक और गीत उन्हीं के स्वर मे सुनने का अवसर मिला- “कभी-कभी यह क्या होता है, कान चले जाते हैं कहीं पड़ोस में/सारी रात खड़े रहते हैं ओस में”। बाद में रमेश रंजक जब गीतों से अतुकांत कविताओं की ओर उन्मुख हुए तो मुझे अच्छा नहीं लगा था और फ़िर उनका अचानक दुनिया से चला जाना तो मेरे लिये किसी आघात से कम नहीं था। उन्होंने बच्चों के लिए भी कविताएं लिखीं यह मेरे लिये एक सुखद बात थी।
एक और साहित्यिक मित्र श्री दुर्गा प्रसाद नौटियाल की यहां याद आ रही है, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं। नौटियाल जी प्रूफ़रीडर के रूप में हिदुस्तान टाइम्स समूह में आए थे और उन्हें अस्थायी सेवा समाप्ति के बाद पुनर्नियुक्ति तथा पत्रकार का दर्ज़ा लम्बी मुकदमेबाजी के बाद मिला था। फ़िर कालांतर में वे उपसंपादक के पद से लेकर मुख्य उपसंपादक पद तक पंहुच गए थे। “साप्ताहिक हिंदुस्तान” में वे बच्चों का पृष्ठ देख रहे थे और उसके लिये कभी-कभी मुझसे भी बाल कविताएं ले लिया करते थे। पहली बार में ही वे मुझे मितभाषी और सहृदय व्यक्ति लगे थे मुझे। बालकविताओं के अलावा और भी कई साहित्यक मुद्दों पर उनसे चर्चा हो जाया करती थी।
चंद्राकर जी के बाद जब विनोद कुमार मिश्र ने दैनिक हिंदुस्तान का सम्पादन भार संभाला तो उनसे मेरा अचानक परिचय हुआ। परिचय के पीछे एक कारण और भी था। मेरे सजातीय श्री पद्मनाभ तैलंग भोपाल में जाने-माने स्वतंत्रता सैनानी होने के अलावा सरकारी मान्यताप्राप्त वरिष्ठ पत्रकार थे और “साधना” नाम का एक टेब्लोय्ड अखबार निकाला करते थे। कुछ समय के लिये वे दैनिक हिंदुस्तान के लिये अंशकालीन संवाददाता (स्ट्रिन्जर) के रूप में भोपाल से खबरें भी भेजने का काम करते। पुराने कांग्रेसी थे और मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री श्री अर्जुन सिंह से उनकी घनिष्ठता थी। दैनिक हिंदुस्तान के दिल्ली संपादकीय कार्यालय में उनका कभी-कभार आना-जाना लगा रहता था। संपादक विनोद मिश्र से मिलकर आते तो सीधे मेरे पास चले आते और अपने बुन्देलखंडी अंदाज में पूछ्ते-“कओ रमेश, कैसे हो? नौने(अच्छे) हो? कविताएं लिख रए हो के नईं। लिखत रओ और खूब नाम करो। हमें तो जो करने हतो, सो खूब करो, अब तुम लोगन को ज़मानो है, अच्छो पढ़ो, अच्छो लिखो...जस कमाओ..”
अलग गोत्र के होते हुए भी सजातीय रिश्ते में पद्मनाभ जी हमारे चाचा, ताउओं मे से थे और हम उन्हें आदर से कक्का कहा करते थे। मेरा जब भी भोपाल जाना होता था तो उनसे मिलना अवश्य होता क्योंकि उनसे एक और रिश्ता जुड़ा हुआ था। मेरी छोटी इकलौती बहन सौ. वीणा के वे चचरे श्वसुर भी लगते थे। हमारी बातचीत हिंदुस्तान टाइम्स के माहौल तथा पत्रकारिता जगत की सच्ची-झूठी खबरों तक ही सीमित रहती थी और उनकी बुन्देली भाषा में मुझे ज़रूरत से ज्यादा रस मिलता था। अब वे दिवंगत हो चुके हैं और उनकी स्मृति ही शेष है।
ये  साहित्यिक स्मृतियां उन दिनों की है जब मैं अपने सात सदस्यीय परिवार के साथ अजमेरी गेट के कुंडेवालान चौक में 822 नं मकान में रहता था। साहित्यिक प्रसंगों से हट कर अब ज़रा आत्मिक प्रसंगों की भी चर्चा कर लूं तो कुछ बुरा नहीं। कुन्डेवालान के मकान मालिक संतभूषण लाल, टेलीकाम इन्जीनियर थे।मकान तीन मंजिला था और उसकी छत पर हमारे पास एक ही कमरा था 10 बाई 10 फ़ीट का। उसी में छोटी-सी जगह रसोई की थी। कमरे से सटा जीना और जीने से सटा एक छोटा-सा तिकोना स्नानघर। इस एक कमरे में माता-पिता, हम पांच भाई और एक दो रिश्तेदार, जो यदा-कदा आया ही करते थे, हम लोग थ्री टायर बेड रूम बनाकर सोते थे। कमरे के आगे लोहे का जाल था और उसके आगे दूसरे किरायेदार का थोड़ा और बड़ा कमरा और एक बड़ी रसोई-स्नानघर। दूसरे किरायेदार का नाम राजकुमार गुप्ता था। मेरी शादी हुई तो एक कमरे में माता-पिता भाईयों के सम्मिलित परिवार मे किस तरह से गुज़ारा हो यह सवाल खड़ा हो गया। दिन तो गुज़र जाता पर रात...इस विषम स्थिति से बचने के लिये वैकल्पिक व्यवस्था पहले से करनी थी लेकिन कुछ कारणोंवश नहीं हो पाई। यह कमरा भी हमें हमारी नानी की वजह से मिला था जो कई वर्षों तक यहां रहने के बाद सीलमपुर में अपने नव निर्मित मकान में चली गई थी। हमारी आसन्न कठिनाई भांप कर सामने के किरायेदार राजकुमार गुप्ता और उनकी पत्नी, जिन्हें हम सब भाभीजी कहते थे, ने सोने के लिये अपनी रसोई हम नव दंपति के हवाले कर दी। तीन-चार दिनों तक मेरा और कमलेश का गुजारा वहां “पिया का घर” फ़िल्म की तरह हुआ फ़िर मेरे हिंदुस्तान टाइम्स एक मित्र भरत अरोड़ा ने हमें पहाड़्गंज की चांदीवाली गली में एक कमरा रसोई के साथ किराए पर दिलवा दिया। मज़बूरी थी, वहां जाते हुए हमें यह कलंक भी सिर पर ढोना पड़ा कि “देखो, शादी होते ही बड़ा लड़का मां-बाप तथा छोटे भाईयों से अलग हो कर रहने लगा।“  लेकिन इसके पीछे जो लज्जा, पीड़ा और विवशता थी, उसने हमारा पीछा नहीं छोड़ा और वह लगभग एक वर्ष तक हम दोनों को दिन में कुंडेवालान और रात में पहाड़गंज के बीच भटकाती रही।
चांदीवाली गली वाला वह मकान, मुझे बताया गया कि दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री श्री मदनलाल खुराना के भाई (?) श्री बरकतराम खुराना का था। बरकतराम की पहाड़्गंज बाज़ार में जूतों की दुकान थी। लेकिन इस मकान में प्रवेश के दिन ही हमारा सामना एक विचित्र हिंसात्मक परिस्थिति से हो गया। शाम ढलने को ही और अन्धेरा पहला कदम रख रहा था तभी मकान के चौबारे में लिमका-कोकाकोला की टूटी बोतलें आ-आ कर गिरने लगीं। गली के बाहर काफ़ी शोरगुल मचा हुआ था। बाद में पता चला कि वहां गली के बाहर ब्राइट होटल के मालिक के साथ किसी का झगड़ा हो गया था और लड़ाई हाथ-पैर से आगे बढकर शीतल पेय की बोतलों तक आ पहुंची थी। इस मकान में रहने की एक शर्त यह थी कि हर किरायेदार को एक सप्ताह रोटेशन से नीचे का बेड़ा (चौक) धोना पडेगा। नीचे तीन किराएदार थे इसलिये तीन सप्ताह नीचे की सफ़ाई-धुलाई हम सबके जिम्मे थी और बाकी के दिन ऊपर वालों की।
नीचे के कमरों में सीलन काफ़ी थी जिसके कारण वहां काक्रोचों की भरमार रहा करती थी। बहरहाल, हमने वहां एक साल काटा और फ़िर बड़े ही नाट्कीय ढंग से पूर्वी दिल्ली की कालोनी गणेश नगर-2 शकरपुर आ गए। पहाड़गंज वाला कमरा छोड़्ते समय हम वहां मारे हुए काक्रोचों का एक बड़ा सा पेकैट भेंटस्वरूप छोड़ आए थे।
पहाड़्गंज मे हमारा एक साल (1976-77) का समय कुल मिलाकर सुख-शांति में बीता। गली में ज्यादातर पंजाबी परिवार थे और शाम को वहां साझा चूल्हा जलता था जिसमें कभी हम भी तंदूरी रोटियां सिकवाकर ले आते थे। चूल्हा एक सुन्दर-सी स्थूलकाया वाली पंजाबी औरत जलाती थी जो सरल स्वभाव की थी। उसका बास्तविक नाम तो हम नहीं जानते थे पर मैंने और कमलेश ने उसका नाम अपनी और से क्रिस्टीना रख लिया था जो हमें अच्छा लगता था। सप्ताह में एक दो शामें हमारी कनाट्प्लेस के सेन्ट्रल पार्क में गुज़रती थीं। तब न तो आज के ज़माने जैसा आतंकवाद था और न ही देर रात मे आने-जाने का डर। पर एक बार अवश्य हम छोटी-सी मुसीबत में फ़ंस गये थे। हुआ यूं कि मेरी बड़ी साली जोधपुर से दिल्ली आई हुई थीं। रीगल थियेटर में नई मूवी चल रही थीं –“अर्जुन पंडित”। कमलेश और उन्हें साथ लेकर रात नौ बजे का शो देखने गए। लौटते हुए बारह-सवा बारह बज रहे थे और हम पैदल रीगल से पहाड़्गंज लौट रहे थे। उसी दिन पहाड़्गंज के आस-पास रेडलाईट एरिया मे पुलिस की रेड पड़ी थी इसलिये मेरे साथ दो महिलाओं को देख कर गश्ती पुलिस ने पूछ्ताछ के लिये रोक लिया। मैंने उन्हें बताया – “ मैं हिन्दुस्तान टाइम्स में कार्यरत हूं। मेरे साथ मेरी पत्नी और बड़ी साली हैं और हम रीगल से रात क अंतिम शो देखकर लौट रहे हैं”। इस सबके बावजूद हम तीनों को अनावश्यक रूप से पंचकुइया रोड के नज़दीक आधा-पौन घंटा तक रुकना पड़ गया। “अर्जुन पंडित” मूवी का आधा सुख इस व्यर्थ की पूछ्ताछ ने तबाह कर दिया था।

थके मन से उस रात हम पहाड़गंज लौटे। और फ़िर कुछ दिनों बाद मेरा पूरा परिवार – माता, पिता, भाईयों सहित गणेश नगर-2, की गली नं 2 में शिफ़्ट कर गया जो बड़े ही नाट्कीय ढंग से हमे किराये पर मेरे हिंदुस्तान टाइम्स के एक मित्र प्रकाश चन्द्र झा, जो अप्रेन्टिस के रूप मे काम करता था और उसी मकान के एक कमरे मे किराये पर रहता था, ने दिलवाया था। यह मकान काफ़ी बड़ा था उसमें एक बड़ा ड्राइंग रूम, एक बेड रूम और एक सुविधाजनक रसोइ तथा स्नानघर थे। आगे लान था जिसमें गुलमोहर का एक पेड़ था। मकान का नाम था “शांतिकुन्ज” जो मकान मालकिन के नाम पर था। किराया बसूली आदि का जिम्मा उनके बेटे अरुण कुमार अग्रवाल पर था। अरुण अग्रवाल इन्कम टेक्स आफ़िसर थे और प्रकाश चन्द्र झा ने हमें किरायेदार के रूप में यह कहकर रखवाया था कि हम प्रकाश के रिश्तेदार हैं और बिहार से आए हैं। प्रकाश की मेहरबानी से किरायेनामे की औपचारिक्ता तक हमसे पूरी नहीं करवाई गई थी। हां, एक दो बार अरुण जी हम सबसे मिलने अवश्य आए और पहली मुलाकात में ही उन्हें पता चल गया कि हम बिहार से नहीं मध्य प्रदेश के बुन्देलखंड से संबन्ध रखते हैं। प्रकाश के झूठ बोलने पर उन्हें गुस्सा तो बहुत आया पर हमारे परिवार का परिचय जानकर हमें कुछ नहीं कहा। हम वहां लगभग एक दो-साल तक रहे और फ़िर उसी कालोनी की गली न. 1 में हमने एक सौ गज का प्लाट ले लिया जिस पर, कुछ दिनों बाद अपनी ज़रूरत लायक आधा कच्चा-आधा पक्का आशियाना बना लिया। लेकिन प्रकाश तब तक कमरा छोड़ कर बिहार वापस जा चुका था और बाद में एक दिन अपने पुलिसकर्मी पिता के साथ मिला तो पता चला कि वह पागल हो चुका था और दिल्ली के अस्पताल में मानसिक चिकित्सा हेतु लाया गया था। ज़ाहिर था कि ऐसी स्थिति में वह मुझे देखता रह गया था पर हमारी पह्चान खो चुकी थी। उसके हाथ बंधे हुए थे और बंधन के दोनों सिरे उसके पिता के हाथों मे थे।

Tuesday, October 20, 2015

हिंदी बाल कविता : उपलब्द्धियां और संभावनाएं


हिंदी बाल कविता ने  अपनी लगभग डेढ़ सौ वर्षो की अनवरत यात्रा में कथ्य, शिल्प और प्रयोग की दृष्टि से अनेक उपलब्धियां हासिल की हैं और नई संभावनाओं के भी नये गवाक्ष खोले हैं जिन की चर्चा मैं यहां आगे करूंगा। बस, एक बात मैं आपको पुन: स्मरण दिलाना चाहूंगा कि जब नदी में बाढ़ आती है तो उसमें जल के साथ अनेक अवांछित तत्व भी बह कर साथ आ जाते हैं पर जब उस जल को निथार कर प्रयोग में लाया जाता है तो उसका आस्वाद सदैव मधुर ही होता है।  यह बात बाल-कविता की नदी पर भी लागू होती है और इसका महत्व जांचने  के लिए पाठकीय रुचि का भी परिष्कृत होना ज़रूरी है। अपनी बात को मैं यहां सुप्रसिद्ध गीतकार रमेश रंजक के एक गीत के मुखड़े से स्पष्ट करना चाहूंगा। उन्होंने लिखा था –“जल नदी का पी, न नल का पी/हो सके तो सिर्फ़ तल का पी/ अब आप कहेंगे..आजकल तो नल में भी पानी नहीं आता नदी के तल की बात तो कौन करे। आपका तर्क बिलकुल सही है। पर यह स्थिति आई क्यों, प्रकृति के दोहन की जगह प्रकृति का शोषण शुरु कर दिया मनुष्य ने..बाल कविता की बात करें तो उसको भी प्रदूषित करने के सतत प्रयास होते रहे है.. लेकिन प्रकृति जिस तरह “चेक एन्ड बेलेन्स” की प्रक्रिया द्वारा अपने को संतुलित करती है उसी तरह सर्जना की प्रक्रिया भी अपने को संतुलित करती रह्ती है।
उत्तरकाशी में आयोजित एक बाल-साहित्य संगोष्ठी मे डा. नागेश पांडेय “संजय” ने सुरेश सरित की एक बाल-कविता को उद्धृत किया था। कविता थी-“मीठा-मीठा नारियल का पानी चाहिए/खेलने को परियों की रानी चाहिए/आप करते रहिए  परमाणु परीक्षण / हमको अपनी नानी की कहानी चाहिए” । हम आप जानते हैं कि जब भी हिंदी बाल कविता के धुरंधरों का ज़िक्र होता है ,सुरेश सरित का नाम उनमें शायद ही कभी किसी के द्वारा लिया जाता हो, नागेश जैसे व्यक्ति अपवाद हैं , लेकिन अच्छी बाल कविता को अपनी आभा फ़ैलाने से  आप किसी तरह नहीं रोक सकते, वह अपना रास्ता किसी न किसी तरहबना ही लेती है।  और यह भी सत्य है कि अच्छी बाल कविता कितनी भी पुरानी क्यों न हो,  उसकी आभा क्षीण नहीं होती। अब देखिए ना- पं. श्रीधर पाठक की यह तोतली बोली वाली कविता –“बाबा आज देल छे आए/ऊं..ऊं चिज्जी क्यों न लाए” क्या अब भी बच्चों या बड़ों को कर्णप्रिय नहीं लगती? किसी रचना का केवल पुराना हो जाना उसकी कमजोरी नहीं , शक्ति भी होता है..
            किशोर कविता की अक्सर बात की जाती है। इस श्रेणी में अभी अच्छी कविताएं कम ही मिलती है। एक किशोर अपने मन की व्यथा किस तरह अभिव्यक्त करता है, क्या आपने कभी सोचा है?  प्रख्यात व्यंग्य एवं बाल कविइ सूर्य कुमार पाण्डेय की जुबानी सुनिये –“घर में आए हों दोस्त जब मेरे, कम-से-कम आप तब नहीं डाटें/  अब इसे केवल एक किशोर का अपने माता-पिता से किया गया आग्रह ही न समझें, यह उस तथाकथित पारिवारिक सत्ता का  शालीन विरोध भी है जो आज के समाज में लचर हो गई है।आज का किशोर मूक कठपुतली की तरह आपके क्रोध, आपकी प्रताड़ना को सहने वाला नहीं। उसका अपना स्वाभिमान है, उसकी अपनी आकांक्षाएं हैं और यही नहीं, वह अपनी उन दमित भावनाओं को भी प्रकट करना चाहता है जो पहले की वर्जनाओं के चलते कभी अभिव्यक्त नहीं हो सकी- सूर्य भान गुप्त के शब्दों में इसका खुलासा देखिए –“गांव भाड़ में जाए मुझे वो लड़की अच्छी लगती  है/गुड्डे-गुड़ियों के रिश्ते की बातें तय करवाने में/उसकी बातें सुने कोई दादी मां पक्की लगती है/
            गत कुछ दशकों के दौरान हिंदी बाल-कविता में भले ही बहुत-सा  कचरा सामने आया है पर इसी दौरान उसने भाषा, शिल्प और कथ्य की नई ज़मीन भी तोड़ी है। दामोदर अग्रवाल इस क्षेत्र के सबसे अधिक विलक्षण प्रतिभा संपन्न बाल-कवि हैं। उनकी हर बाल कविता एक उपलब्द्धि है – फ़िर चाहे वह –“कुछ रंग भरे फ़ूल, कुछ खट्टे-मीठे फ़ल/कोई बांसुरी की धुन थोड़ा जमुना का जल/कोई लाके मुझे दे”  हो या फ़िर “बड़ी शरम की बात है बिजली बड़ी शरम की बात ”। अनेक लोग कहते हैं बाल-कविता में बिंबों का रचाव नहीं होना चाहिए, कम-से कम मैं ऐसा नहीं मानता। एक बच्चा अपनी परिकल्पना में अनेक बिंब रचता है। वह एक ही बस्तु को अनेक रूपों देखता है और यदि उसकी यह भावना बाल-कवि अपनी कविताओं में प्रकट करते हैं तो इतनी हाय-तौवा क्यों?  दामोदर जी की चर्चित बाल कविता “कोई लाके मुझे दे” की एक दो और पंक्तियां देखिए जो अपने शिल्प और बिंबों के कारण ही अनूठी दिखती है –“एक छाता छांव का/एक धूप की छ्ड़ी/एक बादलों का कोट/एक दूब की छड़ी/कोई लाके मुझे दे/
इन पंक्तियों के लेखक ने भी कभी एक बाल-कविता लिखी थी जिसमें बच्चे की दृष्टि से एक बादल को अनेक शक्लों में देखा गया है _ एक बादल झुका मेरी छत पर सुनो, हां सुनो जी सुनो/उस बादल ने कितने रूप धरे/हां सुनो जी सुनो/खरगोश बना, वह मोर बना/वह सिपाही बना/वह चोर बना/उस चोर से भैया हम खूब डरे/हां, सुनो जी सुनो।“ अब इस बालगीत की टेक और अंतरा के शिल्प विधान पर आप विचार करें तो “हां, सुनो जी सुनो” का अर्थ भी समझ में आ जाएगा।
पिछ्ले वर्ष हिंदी के लोकप्रिय कवि कृष्ण शलभ मेरे निवास पर आए थे। आप जानते हैं उन्होंने नये-पुराने कवियों की बाल-कविताओं का एक विशालकाय संकलन “बचपन एक समंदर “ संपादित किया है और अब वे शिशुगीतों का ऐसा ही वृहत संकलन निकालने का अथक प्रयास कर रहे है। इस दुष्कर कार्य के सिलसिले में वे जब मेरे पास आये तो उनके पास “पराग” पत्रिका के पुराने अंकों में प्रकाशित सैंकड़ों शिशुगीतों की फ़ोटोकापियां थीं – मैं देख कर हैरान था कि “पराग” जैसी नई डृष्टि वाली प्रयोगशील बाल पत्रिका में प्रकाशित शिशुगीतों मे लगभग 90 प्रतिशत वे थे जो चूहे और बिल्ली पर लिखे गए थे। शायद यही कारण है कि उनमें बहुत से “टायप्ड” भी हो गए थे। आखिर आप चूहे बिल्ली को लेकर कितने अनूठे शिशुगीत लिख लेंगे? पर यह समस्या केवल हिंदी में ही नहीं,  अंग्रेजी में भी इसी तरह मौज़ूद है..वहां भी केट एन्ड माउस को लेकर नर्सरी राइम्स की भरमार है। तो यह जो अतिरेक है वह बाल-कविता को कमजोर बनाता है।  मौसमी बाल-कविताओं के साथ भी यही खतरा है जिनकी हर भाषा में भरमार है। हां, अच्छी कविताओं के कुछ अपवाद हो सकते हैं और वे हर जगह होते हैं और जहां हैं, उनकी विशेषताओं को रेखांकित भी किया जाना चाहिए।
आप जानते हैं कि बच्चों का संसार भी वही है जो बड़ों का है। बस, उस संसार को बच्चों द्वारा देखने की  दृष्टि अलग होती है जिसे बाल-कवि को परखना होता है। बाल साहित्य सृजन में आप क्या कह रहे हैं, यह कम महत्व का है, आप किस तरह कह रहे, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है। बाल-मनोविज्ञान की परख यहीं कसौटी पर कसी जाती है। कुछ रचनाएं, संभव है, बच्चों की समझ के ऊपर चली जाएं, लेकिन यहां थोड़े धैर्य की ज़रूरत है। सिर्फ़ इसी बिना पर सुंदर बाल-कविताओं या बाल-गीतों में परिवर्तन की अपेक्षा करके आप उनकी आत्मा ही नष्ट कर सकते हैं। अच्छा संगीत बाल-गीत को समृद्ध भी बनाता है और गौड़ भी। यू-ट्यऊब पर चले जाइये, आप्को फ़र्क समझ में आ जाएगा। कवि-गीतकार योगेन्द्र दत्त शर्मा का एक बाल गीत है-“ लौटकर वनवास से जैसे अवध मे राम आए/साल भर के बाद ऐसे ही अचानक आम आए/ छुट्टियों के दिन, उमस, लू से भरे होने लगे थे/हम घनी अमरियों की छांह में सोने लगे थे/मन मनौती-सी मनाता था कि जल्दी घाम जाए/”  अब आप इस बाल-गीत के कथ्य और शिल्प का रचाव और कसाव देखिए और “घाम” जैसे देशज शब्द का सटीक प्रयोग भी देखिए। यह एक समन्वित प्रयोग है जो किसी तुकबंदी पर आश्रित नहीं है..। ऐसी बाल-कविताएं सचमुच हमारी बहुत बड़ी उप्लब्द्धि हैं।

बाल-कविताऒं में हास्य और नटखट्पन को ले कर भी अनेक प्रयोग हुए हैं । उनमें कुछ बहुत अच्छे हैं तो कुच्छ हास्यास्पद हो गए हैं। यही हाल उन बाल कविताओं का भी  है जो  जबरन विज्ञान के विषयों को लेकर लिखी गई हैं। जहां यह स्वाभाविक रूप से किया गया है वहां ठीक है लेकिन जहां मात्र सूचनाओं के साथ तुकबंदी की गई है वहां स्थिति हास्यास्पद हो गई है। 

Saturday, October 17, 2015

माफ़ कीजिये, मैं नहीं लौटा रहा हूं अपना अकादमी सम्मान


गत कुछ दिनों से अखबार की सुर्खियां पढ़ कर मेरा मन भी मीडिया में उछलने का कर रहा था। लेकिन अपनी मज़बूरी है। पता नहीं आप समझेंगे या नहीं । इसलिए थोड़ा-सा खुलासा कर रहा हूं जो कुछ तिक्त भी है और कुछ सच भी, वरना अपनी जांघ उघाड़ने का उपक्रम कौन करता है।
दरअसल, जब मुझे साहित्य अकादमी सम्मान मिला था तब उसके साथ कुछ अर्थ की प्राप्ति भी हुई थी जो मेरे जैसे अदना लेखक के लिये आड़े वक्त में बहुत बड़ी राशि थी और जिससे मैंने न केवल बहुत पुराने ऋण का कुछ अंश चुकता किया बल्कि दो-चार दिनों की दाल-रोटी भी खा ली थ। (अब तो दाल भी इतनी मंहगी है कि दाल की जगह हवा से काम चलाना पड़ेगा बशर्ते, पानी की तरह कल हवा भी न बिकने लगे) इसलिए उस सम्मान राशि को एक बार गृहण कर के दोबारा लौटा पाना मेरे लिये संभव नही।  यह काम वे करें जो तथा कथित संभ्रांत-जन हैं, जिनके भरे हुए पेट हैं,और जो अपने कृतित्व से ज्यादा अपने व्यक्तित्व, पद, और संपर्क के कारण चर्चा में हैं।
पुरस्कार या सम्मान लौटाना सिर्फ़ कागज का पत्र या धातु का स्मृति-चिन्ह लौटाना नहीं हैं। उसके साथ मिली उस खुशी का भी लौटाना है जो आपके साथ-साथ आपके परिजनों को भी मिली थी। उस धन-राशि का लौटाना भी है जिसे लौटाने  के लिये हो सकता है फ़िलहाल आपकी जेब खाली हो पर अपनी अहंतुष्टि के लिए आप ब्याज पर कोई ऋण उठालें। और क्या आप समझते हैं कि अकादमी या कोई भी सरकारी संस्था इस सम्मान राशि के बहाने अपनी खुद की कमाई का हिस्सा आपको सौंपती है? जी नहीं जो पैसा आपको मिलता है या मिला है वह भी आपकी कमाई से ही करादि के रूप में सरकार द्वारा वसूल किया गया धन है। इसलिए जो पैसा मेरा ही था या है उसे वापस सरकार या सरकारी संस्थान को लौटाने का तो सवाल ही नहीं उठता।
हां, यदि मुझे अपनी आत्मा कुछ ज्यादा ही झकजोरती है और मुझे अपनी ज़िद ही पूरी करनी है (फ़िर चाहे अपने घर के बर्तन बेच कर ये काम करना पड़े) तो यह पैसा मैं सरकार को वापस न कर के उन हत-आहत परिवारों को ही क्यों न दूं जो सांप्रदायिक हिंसा का शिकार हुए हैं। क्या यह प्रतिरोध का जायज़ तरीका नहीं हो सकता? क्या अकादमियों के काम में अब सांप्रदायिक हिंसा को रोकने और व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी भी शामिल करनी होगी? क्योंकि उनके द्वारा दिये गये सम्मान को उन्हें लौटाने का अर्थ तो यही हुआ न कि देश के किसी कोने में भी साम्प्रदायिक हिंसा होती है तो ठीकरा सीधे आप उन के माथे पर फ़ोड़ सकते हैं।
हो सकता है, आपको मेरा यह तर्क लचर या जन विरोधी लगे पर ज़रूरी तो नहीं कि एक जो करे वही बाकी भी सभी करें। और अकादमी या पद्म सम्मान लौटाने से सब कुछ ठीक हो सकता है तो आप लौटाने की जगह यह संकल्प ही क्यों नहीं ले लेते कि सरकार कोई भी क्यों न हो  उससे न तो जीवनपर्यंत कोई सम्मान लेंगे, न वृत्ति लेंगे और न ही विशिष्ट श्रेणी (पत्रकार-लेखक) के लिये दिये जाने वाले आरक्षित अनुग्रह लेंगे। (संतन को कहा सीकरी सों काम.. वशर्ते आप संत हों) आपका निर्णय और  अन्याय के प्रतिरोध का तरीका सार्वकालिक होना चाहिए, अवसरवादी नहीं।
      हमारे एक बड़े लेखक भाई ने यदि यह कह दिया है कि आप जिस सम्मान को लौटाने की घोषणा मीडिया में उछल-उछल कर रहे हैं उसके साथ उस और उस कीर्ति को भी लौटाईये जो आप उस सम्मान के बाद  भोग चुके हैं और भुना चुके हैं,  तो शायद आपको बुरा लग रहा है? लेकिन गुड़ खाएं और गुलगुलों से परहेज करें, यह तो ठीक नहीं
      इसलिए, माफ कीजिये, मैं अपने साहित्य अकादमी का सम्मान (बाल-साहित्य की श्रेणी में है तो क्या) को लौटाने की स्थिति में अपने को नहीं पा रहा हूं।  क्योंकि यह अकादमी का ही नहीं मेरी अपने रचनाकर्म का भी अपमान है। मेरे इस नकार के पीछे  केवल मेरी आर्थिक  विवशता ही नहीं बल्कि उस छ्द्म को अस्वीकार करने की ज़िद भी है जिसे कुछ नामी-गिरामी लोग आवेश, भावुकता, दल-विधान या लोभवश अपने कमजोर क्षणों मे ओढ़ लेते हैं।

-          रमेश तैलंग
-          rtailang@gmail.com

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Friday, June 12, 2015

मेरी यादों का पहाड़: दो आंखर की वृहत कथा


दो आंखर की वृहत कथा
: 



देवेन्द्र मेवाड़ी यानी देवेन दा ने जिस दिन मुझे अपनी किताब “मेरी यादों का पहाड़” भेजी थी, उस पर उनके हस्ताक्षर के नीचे एक तारीख पड़ी है : 28-4-2013।
      “आभार” के पश्चात इस किताब की शुरुआत होती है “दो आंखर” से। देवेन दा के शब्दों में कहूं तो ये “दो आंखर” ही उनकी यादों के पहाड़ की निर्मिति करते हैं। सूक्ष्म से विराट की ओर यह एक ऐसी सांस्कृतिक यात्रा है जिसे तय करने में मुझे दो साल लग गए। तो क्या यह सिर्फ़ मेरा आलस्य था? शायद नहीं। स्मृतियों के कोष में जितना अधिक जुड़ता है उससे कहीं अधिक छूटता भी जाता है..और स्मृति-विस्मृति के आवागमन की इस प्रक्रिया में कितना समय कब गुज़र जाता है, पता भी नहीं चलता।
आत्मवृत्त मैने पहले भी अनेक पढ़े हैं पर “मेरी यादों का पहाड़” केवल आत्मकथा नहीं है इसमें कूर्मांचल का पूरा का पूरा लोक सांसें लेता है। किस्सागोई का अद्बुत अंदाज और दुदबोली का निस्संकोच अवांतर प्रयोग आपको आद्यंत बांधे रहता है और देवेन दा के बचपन, किशोरावस्था से गुज़रती इस स्मृति-यात्रा के अंतिम पड़ाव तक पहुंचते-पहुंचते आप पूरे नहीं तो आधे कुमांऊनी तो हो ही जाते हैं।
“मेरी यादों का पहाड़”  में लेखक सिर्फ़ निमित्त है जो आपसे संवाद करता हुआ प्रतीत होता है अन्यंथा गौर से देखें तो यहां संपूर्ण प्रकृति ही आपसे संवाद करती है और श्रोता के रूप में आपसे हुंकारा भरने की अपेक्षा भी करती है...
तो बोलिये ना ---“ओं!”
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यह केवल संयोग है कि इस किताब के आने के पहले मैं देवेन दा के कुछ आत्मीय संस्मरणों को किस्तवार इंटरनेट पर” पढ़ चुका था। उसके पहले मैं देवेन दा को नहीं जानता था, जानता था तो देवेन्द्र मेवाड़ी नाम के एक लेखक को जो सबसे पहले मुझे शास्त्री भवन -पी.आई.बी सभागार में भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार समारोह (2001) में मिले थे। तब वे पंजाब नेशनल बैंक-चंडीगढ में सेवारत थे और उनकी कृति – फ़सलों की कहानी पुरस्कृत हुई थी। तब उनसे एक हल्का-सा परिचयात्मक संवाद हुआ था। फ़िर उनकी कृति विज्ञान बारहमासा मिली तो उनके  बाल साहित्य तथा विज्ञान साहित्य से भी मैं परिचित हुआ। गलतफ़हमी यह रही कि वे नाम के आगे मेवाड़ी लगाते थे इसलिये मुझे लगा कि शायद वे मेवाड़ की भूमि से आते हैं। लेकिन मिलने के वाद पता चला कि उनका नाभिनाल संवन्ध तो कूर्मांचल से है। बहरहाल, जब “मेरी यादों का पहाड़” से मेरा वास्ता पड़ा तो देवेन्द्र मेवाड़ी की जगह मेरी जबान पर देवेन दा ही ठहर गया और अब वे मेरे लिये देवेन दा ही हैं और वही रहेंगे। वैसे भी उम्र के लिहाज से वे मुझसे बड़े हैं।
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नैनीताल जिले का सुदूर पर्वतीय गांव – कालाआगर” जहां देवेन दा की शिक्षा-दीक्षा का बीज पड़ा, के प्रति उनका इतना अधिक मोह है कि दिल्ली जैसे महानगर का आकर्षण भी उसके सामने फ़ीका पड़ जाता है। वे अपने गांव, वहां के लोग, और वहां के प्राकृतिक सौंदर्य का परिचय कराते हुए आपकी जिज्ञासा को लगातार जगाए रखते हैं और ऐसी-ऐसी जानकारियां देते चलते हैं जो आत्मिक और बौद्धिक दोनों रूपों में आपको समृद्ध करती हैं।
मेरी यादों का पहाड़ पढ़ते हुए आप सिर्फ़ अपना ज्ञान ही नहीं बढाते, बल्कि साहित्य के उस रस का पान भी करते चलते हैं जो अब अन्यत्र विरल होता जा रहा है। कुमाऊंनी बोली की अपनी मिठास है और देवेन दा उसमें पूरे रचे-बसे हैं-
“अब देखिए, मंडुवे की रोटी पर मुझे एक “आन” (पहेली) याद आ गया , सुनाऊं?
ग्योंक पिस्या लै मंडुवाक पल्थन
द्यखा ठुल्बाज्यु ठुलिजाक लछ्न
मतलब, गेंहू के आटे की धूनी (लोई) पर मंडुवा के आटे क पलथन, देखो ताऊजी ताई के लक्षण।
मशहूर शिकारी जिम कार्बेट और श्यूं (अदमअखोर) बाघ की आख-मिचौली, कका-काकी, जैंतुवा, जोधसिंह ददा, शेरदा, जैसे जीवंत चरित्रों से मेल-मुलाकात के बाद देवेन दा परताप दा ठ्यक की मिसाल देकर गांव में उपनाम किस कौशल और बुद्धिचातुर्य के साथ रख दिए जाते हैं, इसका मनोरंजक किस्सा सुनाते हैं –
“उपनाम यों ही नहीं, बहुत दिमाग दौड़ाकर रखा जाता है। उसमें उस आदमी की विशेषता झलकनी चाहिए ताकि फ़ौरन पहचान में आ जाए। अब, जैसे कोई बहुत मोटा है तो उसे “ठ्यक” (छाछ फ़ाड़ने का लकदई का पीपे जैसआ वर्तन) छोटा कद और शरी गोल-मटोल है तो “घंटी,  हथ पैरों मे बाल ही बाल हैं तो “भालू”, बंदरों की जैसे हरकतें कर्ता तो “बानर”, चमकती आंखेमं और गोल चेहरा है तो “बाघ”, मोटा पेट है तो “ढोल” उपनाम मिल सकता है।
अब, मैं भी अगर सदा गांव में ही रहता तो क्या पता आज मेरा भी नाम देब्ब “लाम” (लंबू) या देबुवा दाढ़ी या फ़िर कुछ और होता। यह नहीं कि आदमियों के ही उपनाम रख देते हैं, ध्वैड़, काकड़ या बाघ औरतें भी हो सकती हैं”।
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शैशव में शिक्षा की पहली सीढ़ी मां से शुरु होती है और पाठशाला जाने का संस्कार तब तक कैसे संपन्न हो सकता है जब तक  ईजा और बाज्यू का स्नेहिल आशीर्वाद न मिले – “चल बेटा, आज से तू इस्कूल्या हो गया....इस्कूल पढेगा। सुती, धागुली का अब कोई काम नहीं। बस, पाटी-दवात और कापी-किताब से ही तेरा मतलब होगा”।
स्कूल भी कैसा? एक दम वनैला।
“वन ही तो है फ़िर। वो भेशानी धार है ना, वहीं पंडिज्जी आते हैं, पढ़ाते-लिखाते हैं और शाम को सब लोग चले जाते हैं। खाली धार-ही धार है, कमरों वाला इस्कूल नहीं है यहां।...मेज, कुर्सी, श्यामपट, घंटी...कुछ नहीं है”।
फ़िर उस वन प्रांतर के खुले स्कूल मे  जाते समय “श्यूं” बाघ के कहीं दर्शन हो जाएं या सुदूर-पास उसकी घुर्राहट भरी दहाड़ सुनाई दे जाए तो आश्चर्य नहीं। देवेन दा का कहना है –
“श्यूं-बाघों की डर-भर तो उन दिनों बनी ही रहती थी। कुछ वारदातें हो जातीं तो लोग कहते थे-“शुवैं-शुवैं हो गई है। जितने श्यूं-बाघ, उतने उनके किस्से”।
सुनेंगे ना:
तो बोलिये...ओं!”

रनजीत सिंह का किस्सा - जो एक बार आमने-सामने मुकाबले मे श्यू की पूंछ काट्कर ले आए थे, नैथन गांव के शेर सिंह का किस्सा जो श्यूं से आंख-मिचौली खेलते दबे पांव बाघ के पीछे पहुंच गए। जब तक बाघ कुछ समझे, उन्होंने कस कर उसकी पूंछ पकड़ ली और एक झटके में चौतरे से बाहर छ्टका दिया, बल। पारभती से मुठ्भेड़ का किस्सा और फ़िर पिताजी के गोरू-वाछ में से सेतुवा बैल के वलिदान का मार्मिक किस्सा जिसकी गर्दन तोड़ कर ही माना था श्यूं बाघ। घने जंगलों में अकेले सेतुवा की  रक्षा भला कौन करता? द्यौ-द्याप्त (देवी-देवता)- भूत-प्रेत, जंतर-मंतर, झाड़-फ़ूंक.?. कभी-कभी इन में से कुछ काम नहीं आता
पर लोक विश्वासों का क्या? वे तो बने ही रहते हैं। उनकी जड़ें होती भी हैं बहुत ही गहरी। जब तक आस्था का निवास, तब तक देवी-देवता का प्रकाश, फ़िर चाहे वे देवी-देवता नदी, वृक्ष, मिट्टी, पत्थर किसी भी रूप में क्यों न हों। और उन्हीं के साथ पीढी-दर- पीढ़ी जीवंत रहती हैं उनकी स्तुतियां, लोक-गीत, लोक-संगीत।
.”सुवा सरंगे, तीले धारो बौला/हाइ-हाइ नरंगे, तीले धारौ बौला/सुव सरंगे/, बांसुली का बाना/हाइ-हाइ नरंगे, बांसुली का बाना/
      फ़िर देवी-देवता ही क्यों, लोक विश्वासों में  तो भूत-प्रेतों का अस्तित्व भी है। बचपन में देवेन दा जब मां से पूछ्ते हैं –
“हें ईजा? क्या सांची भूत होते हैं?”
      “नें ईजु, तू डरना मत। तेरे पिताजी तो डंगरिया हैं। इसलिए हमारे घर के आसपास भूत-बूत आ ही नहीं सकते।
      “ये बता कि भूत होते हैं या नहीं?”
      “पता नैं। मैंने तो कभी नहीं देखे। बस, एक बार ऐसा हुआ कि......
जाने क्या था, कौन जाने? तू बिल्कुल मत डरना भूतों से! ठीक छ?”
      “होई” कह्कर मैंने हां तो कर दी, लेकिन मन मे उन अदृश्य भूतों का भय बैठ गया तो बैठ ही गया”।
       
लोकविश्वासों की आधारभूमि तर्क कम आस्था ज्याद होती है जहां वैज्ञानिक सोच का होना ज़रूरी नहीं लेकिन न जाने क्यों, कभी-कभी मुझे लगता है कि सृष्टिकर्ता ने मनुष्य सहित जितने भी पंचतत्वीय प्राणी बनाए उनमें मिट्टी का अंश शायद ज्यादा डाला। तभी तो वे स्थूलकाय दिखते हैं। लेकिन यदि मिट्टी की जगह वायु का अंश ज्यादा हो जाए तो आश्चर्य नहीं कि स्थूल दिखने वाले जीव वायवीय हो कर भूत-प्रेत के रूप में घूमते नज़र आएं। क्योंकि सारा खेल कंबिनेशन और पर्म्युटेशन का ही तो है।   
बहरहाल, देवेन दा के पास द्यो-द्याप्त ( देवी-देवता),, त्यों-तार (तीज-त्योहार), ब्या-काज] खेति-पाति, गौरू-बाछ, धुर-जंगल,ध्वैड़-काकड़ आदि, यानी कृषि-कर्म से जुड़ी संपूर्ण लोक-संस्कृति की स्मृतियों का अशेष और अद्भुत खज़ाना है जिसे वे धीरे-धीरे खोलते हैं।
      मेरी यादों का पहाड़ में आंचलिक शब्दों की ध्वन्यात्मक्ता और संगीतात्मक्ता आद्यंत आपके कानों मे गूंजती है। दो आंखर बांचते हुए तो कभी गदेवेन दा के साथ कभी फ़णीश्वर नाथ रेणु याद आते हैं कभी शैलेश मटियानी, तो कभी गौर पंत शिवानी। तभी तो मैंने कहा कि यहां लेखक निमित्त मात्र है, असली संवाद तो प्रकृति का है जिसमे घुघुती बासेंछी...कुरु..रू, चौमासा, चीड़ वनों का संजाल, ताल-तलैया सभी वाचाल हैं।
आंखर-आंख्र पढते जाइये..डूबते-उतराइए
देवेन दा का तो कहना ही है –
“आशा है आपने हमारी बोली-बानी की ध्वन्यात्मकता का आनंद लिया होगा। बादलों के गरजने की गड़-गड़..गिड़म, कहीं चिडियों की चहचहाहट, कहीं घंटियों की टुन-टुन, कहीं खांकरों (बड़े घुंघरू) की खन-खन, कही बड़ी घंटी की घ्हन-मन..घन-मन...कहते हैं जो प्रकृति के जितना ही नज़्दीक रहते हैं, पहाड़ों और वन-प्राम्तरों में, उनकी भाषा में उतनी ही अधिक ध्वन्यात्मकता आ जाती है। शायद इसीलिए हमारी बोली-बानी में भी तमाम आवाजें रस-बस गई हैं”।
यह पोथी लिखते समय मैं सोच रहा था, “धैं” आप इसे समझते हैं या नहीं? लेकिन आपकी “ओं” सुनकर मैं समझ गया, आप समझ रहे हैं। और हां, इस “धैं” से मेरा मतलब है “देखें या देखें तो।“
“ओ!”
“यह हुई न बात} देखिए, मेरी बात सुनते-सुनते आप “ओ” कहकर “उंगुर” यानी हुंकारी देना भी सीख गए”।
“होई, देवेन दा! आपके दो आंखर बांचते-बांचते “ओ!” कहना तो कम-से-कम हम सीख ही गए।
( बाल वाटिका से साभार)
- रमेश तैलंग
 rtailang@gmail.com




Tuesday, March 17, 2015

हो जी मुकुटधारी!




सिंहासन चढ़ कें न इतराइयो
हो जी मुकुटधारी!

एक दिन उठाई थी हम सबने
मिलकर गंगाजली
निर्बल की सत्ता के आगे सब
हारेंगे महाबली
अपना यह कौल नहीं बिसराइयो
हो जी मुकुटधारी।

जिस दिन से क्रत्रिम सुगंधों की
भरमार हो गई
अस्मिता पसीने की गंध की
तार-तार हो गई
ई सें तो अच्छो है मरजाइयो
हो जी मुकुटधारी।

ज्यादा क्या मांगें, बस हर घर का 
चूल्हा जलता रहे
निरवंसी आंखों में भी मीठा
सपना पलता रहे
एक भलो काम यही करजाइयो
हो जी मुकुटधारी!


- रमेश तैलंग : 17-03-2015