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Tuesday, March 17, 2015

हो जी मुकुटधारी!




सिंहासन चढ़ कें न इतराइयो
हो जी मुकुटधारी!

एक दिन उठाई थी हम सबने
मिलकर गंगाजली
निर्बल की सत्ता के आगे सब
हारेंगे महाबली
अपना यह कौल नहीं बिसराइयो
हो जी मुकुटधारी।

जिस दिन से क्रत्रिम सुगंधों की
भरमार हो गई
अस्मिता पसीने की गंध की
तार-तार हो गई
ई सें तो अच्छो है मरजाइयो
हो जी मुकुटधारी।

ज्यादा क्या मांगें, बस हर घर का 
चूल्हा जलता रहे
निरवंसी आंखों में भी मीठा
सपना पलता रहे
एक भलो काम यही करजाइयो
हो जी मुकुटधारी!


- रमेश तैलंग : 17-03-2015

Tuesday, February 25, 2014

जुगलबंदी (कुछ दोहे कुछ गीत) 26 फरवरी, 2014

तीन चका की गाडि़या, खीच रहे दो पांव
घर आएं जब रोटियां,, भरे पेट को गांव

घास फूस की झोंपड़ी, सिर ऊपर तिरपाल 
उजड़-उजड़ हतभागिनी, रही सदा बेहाल

लरज -गरज बादर घिरे, बरसे राजनिवास 
सूनी आँखें मुंद गईं,  लिए अनबुझी प्यास

पसरा हो घर में जहां, सन्नाटे का जाल
किलकारी शिशु की करे मौनों को वाचाल


सब बस्ती बारूद की,, अम्बर बरसे आग 
हाड़-मांस जल भुन गए, बचे जंग के दाग

खेल-खिलौने छोड़कर, थामे है बन्दूक
बच्चे कठपुतली बने, देखे  दुनिया मूक 

दिवस बीतते मौन में, जागत-जाती रैन
दंश वक्त का खा गए, जब से बूढ़े नैन

फैलाकर बांहें दिया, जिनको खूब सनेह
उनकी किरपा पर पली, ढली उमर की देह

भरे कुटिलता मन करे, रोज नये छल-छंद 
अब वसंत में भी कहां, शुभता का मकरंद 

अर्थ नियंत्रित कर रहा, जीवन का व्यापार 
गिरवी रख दी जिन्दगी, जब भी बढ़ा उधार

जुगलबंदी (कुछ दोहे कुछ गीत)-25 फरवरी, 2014


मसि, कागद छूए बिना धन-धन हुए कबीर 
हम पोथी लिख-लिख मरे, फिर भी रहे फ़कीर

सागर को सब सौंप कर नदिया हुई विदेह 
दिया बुझे नर क्यूं करे वृथा धूम सों नेह.

रैन, दिवस खटती रहे, पल भर ना विसराम
सावन लागे जेठ में, जननी तुझे प्रनाम.

अपने दुःख पर्वत लगें, औरन के तृणमूल
जरे, मरे, मति बावरी, गाड़े उर में शूल

मिलें विरल सन्जोग से, सुजन सखा जग माहि 
नाव पडी मझधार में, डूबन देवें नाहि

सब गुन हैं प्रभु, आपके, हममें कहा शऊर
नैना होते आंधरे, दियो न होतो नूर

जब तक बसे न देह में, श्रमजल की  मधुवास 
धरे ना तब तक एक पग, जीवन में मधुमास

मारग पुरखन ने गढ़ो, हम तो बस रह्गीर
सुजस धरो सिर और को, हम काहे के मीर

जहां दीनजन की खबर, लेवत आवे लाज
ऐसे निठुर समाज मे, मीलों दूर सुराज  

धूर नीर से जा मिली करदी कीचमकीच 
धंसे पंक में पग हुई बुद्धि बावरी नीच 

Saturday, July 20, 2013

जिंदगी! जिंदगी! जिंदगी!





जिंदगी! जिंदगी! जिंदगी!
हड़बड़ी में कहाँ भागे री?
रात हो या की दिन, नींद तुझको नहीं,
काहे आठों पहर जागे री?
जिंदगी! जिंदगी! जिंदगी!

सिलसिला थम गया हर मुलाक़ात का,
काई-सा जम गया पानी ज़ज़्बात का,
खिलते चेहरों की मुस्कानें फीकी पडीं,
चाँद को ज्यों गहन लागे री.
जिंदगी! जिंदगी! जिंदगी!

लाखों बेचैनियाँ छोटी-सी जान को
क्या हुआ आज धरती के इंसान को
कांच के टुकड़े हैं नाम, शोहरत सभी,
काहे रब से इन्हें मांगे री?
जिंदगी! जिंदगी! जिंदगी!

रंग नकली ये जिस दिन उतर जायेंगे,
माला मोती के सारे बिखर जायेंगे,
कांपते हाथों में सिर्फ रह जायेंगे -
चंद टूटे हुए धागे री!
जिंदगी! जिंदगी! जिंदगी!

- रमेश तैलंग 


(चित्र सौजन्य : google)