Wednesday, March 13, 2013

केन्द्रीय साहित्य अकादमी में बाल साहित्य





पिछले दिनों केंद्रीय साहित्य अकादमी में जबसे एक प्रतिष्ठित हिंदी साहित्यकार की अध्यक्ष पद पर नियुक्ति हुई हैन केवल हिंदी जगत की उनसे अपेक्षाएं बढ़ी हैं.बल्कि देश के  बाल साहित्यकारों को भी एक नई आशा की किरण दिखी है. काफी समय से यह कोशिश की जा रही है कि वयस्क साहित्य की तरह बालसाहित्य की भी एक केंद्रीय अकादमी स्थापित हो पर इतना समय बीत गयाइस दिशा में कोई सार्थक कदम फलीभूत  नहीं हुआ. अब कम से कम केंद्रीय साहित्य अकादमी इतना तो कर ही सकती है कि अपने संगठनात्मक ढांचे  में एक स्वतंत्र बालसाहित्य प्रकोष्ठ की स्थापना करने के लिए पहल करे और उसके संचालन के लिए  एक सक्षम कार्यकारी परिषद और समुचित राशि का भी प्रबंधन करे..
इस समय अंतर-राष्ट्रीय स्तर पर बाल साहित्य के संवर्द्धन  तथा प्रकाशन पर शैक्षिक/सांस्कृतिकप्रकाशन संस्थानों का ध्यान केंद्रित हो रहा है और यह समुचित अवसर है जब केंद्रीय साहित्य अकादमी को अपनी गतिविधियों का एक बड़ा हिस्सा श्रेष्ठ बाल साहित्य के लेखनप्रकाशनसंवर्द्धन,तथा संचयन पर केंद्रित करने के लिए समुचित कदम उठाना चाहिए. यह इसलिए भी जरूरी है कि निजी स्तर पर जो प्रयास हो रहे हैं वे अनेक कारणों से या तो असफल हो रहे हैं या फिर वे लाभ की जगह हानि ही दर्शा  रहे हैं.
बाल साहित्य जगत सरकारी संस्थानों की तरफ़ इसलिए भी मुंह जोहता है कि सरकार के पास अपेक्षित संसाधन मौजूद हैं. यह काम कारपोरेट जगत भी कर सकता है पर जैसा का सर्व विदित है वह शिक्षा को साहित्य की जगह तकनीकी  से जोड़ना ज्यादा पसंद करता है. तकनीकी  के प्रसार से भौतिक प्रगति तो हो सकती है पर श्रेष्ठ साहित्य जिस संवेदनशीलता को पोषित करता है वह कहां से आएगीबच्चों का पुस्तकों से घना रिश्ता बने और उनके संवेदनशील मन को सही खुराक मिले इससे अच्छा काम और क्या हो सकता है. श्रेष्ठ बाल पुस्तकों के प्रसार और प्रकाशन में नेशनल बुक ट्रस्ट की भूमिका निस्संदेह अग्रणी है पर साहित्य अकादमी भी इस दिशा में अपना हाथ बढाए  तो यह महत् कार्य अपनी गति पकड़ सकता है.
अकादमी हर वर्ष भारतीय भाषाओं के श्रेष्ठ बाल साहित्य पर पुरस्कार देने की योजना  जारी रखे है, यह प्रशंसनीय है पर  यदि नई पीढ़ी का साहित्य से घना रिश्ता बनाना है तो इस दिशा में और भी कारगर कदम उठाने की आवश्यकता है. साहित्य अकादमी द्वारा कुछ बाल साहित्य की पुस्तकों का प्रकाशन हुआ है पर उनमें ज्यादातर अनूदित अथवा रूपांतरित कृतियां है जबकि मौलिक कृतियों के प्रकाशन में अभी भी बहुत कुछ करने की जरूरत है.
अकादमी के पुस्तकालय में बाल साहित्य का हिस्सा बहुत ही कम है, लगभग न के बराबर. इसे विस्तार देने की  आवश्यकता है. विदेशों में तो बाल साहित्य के क्षेत्र में भी बुक्स इन प्रिंट जैसे साहित्यकोश उपलब्ध हैं जबकि भारत में इस तरह की पहल कहीं से भी नहीं हुई है. यदि इस दिशा में अकादमी जैसी  प्रतिष्ठत संस्था कोई पहल करती है तो वह पूरे बाल साहित्यजगत  के लिए गौरव का विषय होगा. निस्स्संदेह यह एक बड़ा कार्य है और इसमें धन, श्रम, समय  और दृष्टि सभी की आवश्यकता होगी, पर बाल साहित्य के शोधकर्ताओं के लिए ऐसा कार्य एक बहुत बड़ा सहारा सिद्ध होगा.
चूंकि साहित्य अकादमी भारत सरकार के अधीन कार्यरत है इसलिए इस तरह का प्रस्ताव पारित करने के लिए उसे सदेच्छा के अलावा बहुत सी अन्य औपचारिकताएं पूरी करने के लिए प्रतिबद्ध होना पड़ेगा, पर यदि उसकी पहल पर ऐसा कोई भी कार्य संपन्न हुआ तो इससे अकादमी का गौरव ही बढ़ेगा.
जिस तरह हिंदी सप्ताह आते ही हिंदी भाषा का आलाप-प्रलाप शुरू हो जाता है उसी तरह बाल दिवस आते ही बाल-साहित्य की कतिपय कार्यशालाएं, संगोष्ठियां आयोजित कर ली जातीं है और फिर एक लंबा सन्नाटा फ़ैल जाता है. यह सचमुच दुखद स्थिति है. ज्ञातव्य है कि राष्ट्रीय बाल भवन में कभी बाल साहित्य के विविध विषयों को लेकर  हर वर्ष अखिल भारतीय स्तर पर संगोष्ठियां आयोजित की जाती थीं पर अब वे भी बंद हो चुकी हैं. संभव हैं कि उनमें कुछ अनियमितताएं घटित हुई हों पर उनके परिष्कार की जगह विचार-विमर्श की राह को ही बंद कर देना कहां की समझदारी है?

- रमेश तैलंग 
09211688748

Monday, February 11, 2013

तीन गीत




अगन में अगन 

जल में जल मिल जइहै,
अगन में अगन प्यारे!
रोके से न रुकिहै,
करो सौ जतन प्यारे!

वाणी है संतन की 
वेदन, पुरानन की.
का है जरूरत अब
भटकन, भटकावन की.

बंद द्वार खुल जइहैं
होई मुकत मन प्यारे!

परम शान्ति में एक दिन
होगी जब गति भंग
श्वेत-श्याम चादर यह
होगी सब एक रंग

माटी में माटी फिर
पवन में पवन प्यारे!

*

मन पत्थर का 

एक पाट  बुद्धि का
एक पाट उदार का.
दोनों के बीच ह्रदय 
धड़के बित्ता भर का.

भूख भुला दे सबको
अपना ईमान धरम.
और बुद्धि अहंकार-
का लहराए परचम.

डर है, न कर डाले
मन कहीं पत्थर का.

द्वन्द्व भरे जीवन की
अनदेखी गहराई 
पार करे कैसे
कोई गहरी ये खाई

एक भरोसा है बाकी
बस अपने अंदर का.

*

बतियाँ बिसर गईं.

बतियाँ बिसर गईं
बूढ़े-पुरानों की
कितनी कहानियाँ 
कितने जमानों की.

आगत, अनागत,
संभव, असंभव को,
काल धराशायी
करता गया सबको,

गूंजें-अनुगूंजें भी
शक्तिहीनों के रहीं 
न रहीं शक्तिवानों की.

विस्मृति के दंश खा
स्मृति को मांजना
दुहकर हो गया, योग
दोहरा ये साधना

पाकर भी क्या होगा  
सपने वीरानों के,
सुधियाँ वीरानों की.

(अक्षरम संगोष्ठी से साभार)
pic. credit : google search 

थोड़ा संगीत बचाए रखना :::: एक गीत


 चित्र  सौजन्य: गूगल: द हिंदू 

सोहर के, गौने के, मंगल के, गीत बचाए रखना.
जीवन ये  उत्सव है , थोड़ा संगीत बचाए  रखना.

वैसे तो मेले भी 
अब अपना रूप बदलने लगे 
फुर्सत के पल 
जितने भी थे, चलने लगे
अगन नहीं, चिंगारी ही सही, प्रीत बचाए रखना.
जीवन ये  उत्सव है,थोड़ा संगीत बचाए रखना.

ऐसा न हो आंखों की 
प्रफुल्लता पूरी मर जाए,
बूंद-बूंद पानी की 
चाहत में सिर्फ धूल भर जाए 
कभे-कभी आस्तीन भीगी, मनमीत! बचाए रखना.
जीवन ये उत्सव है, थोड़ा संगीत बचाए  रखना.

अंकुराती बेल नई, खोजेगी 
कल के दिन अपनी विरासत जब, 
खाली भंडार देख कर उसकी 
सोचो तो क्याः होगी हालत तब, 
लोक की कसम तुमको,कुछ लोकगीत बचाए रखना.
जीवन ये  उत्सव है , थोड़ा संगीत बचाए  रखना.

(srijangatha se saabhaar)

Friday, February 1, 2013

मुरलीधर वैष्णव की एक कविता : कचरा बीनती लड़की




मां ने भले ही जन्म दिया हो उसे
मजदूरी करते हुए 
कचरे के आस पास
लेकिन फेंका नहीं उसे
कचरे के ढेर पर उसने,
जैसे फेंक दिया था कई कई बार
बड़ी हवेली वालों ने
अपने ही खून को.

बड़ी हो गई है अब वह 
उठ कर मुंह अंधेरे रोजाना
निकल पड़ती है वह बस्तियों में
कचरा बीनने
उसके कंधे से लटका
यह पोलिथीन का बोरा नहीं
किसी योगिनी का चमत्कारी झोला है
जिसमें भर लेगी वह 
पूरे ब्रह्माण्ड  का कचरा
सीख लिया है उसकी आंखों ने
खोजना और बीनना
हर कहीं का कचरा
भांप लेती है उसकी आंखें
आवारा आंखों को भी
और बीन लेती है वह
उनमें भरे कचरे को भी 

शाम को जब रखती है वह झोला
कबाड़ी के तराजू में
उठती है उसमें से तब
तवे पर सिकती रोटी की महक
उगता है उसमें से
उसका छोटा-सा सपना

कचरा बीनती है वह 
ताकि कचरा न रहे
हमारे बाहर
और हमारे भीतर भी

- मुरलीधर वैष्णव
ए-77, रामेश्वर नगर, बासनी प्रथम,
जोधपुर-342005
मो.: 9460776100

Wednesday, November 14, 2012

आज बस इतना ही .....14 नवंबर, 2012


एक किताब





एक किताब पड़ी थी अलमारी में कई महीने से .
मुद्दत बाद मिली तो रोई लिपट-लिपट कर सीने से.

कहा सुबकते हुए - ' निर्दयी अब आए हो मिलने को
जब गाढ़े संबंधों के आवरण हो गए  झीने से.

और जरा देखो, कैसे बेनूर हो गए ये अक्षर
कभी चमकते थे जो अंगूठी में जड़े नगीने से.

और याद है? जब आंखें भारी होते ही यहां-वहां
सो जाते तुम मुझे सिरहाने रखकर बडे करीने से

किस मुंह से अब अपना ये सर्वस्व सौंप दूं फिर तुमको
धूल धूसरित देह पड़ी है लथपथ आज पसीने से.


- रमेश तैलंग 



चित्र सौजन्य: गूगल 

Monday, November 12, 2012

आज बस इतना ही....'दीप-पर्व' आपको मंगलमय हो.





एक बेल रोशनी की जब से चढी है छत पर
छत ले रही बलैयां बाहों में उसे भर-भर.

कोई खुशी अचानक उतरी है आसमां से 
बच्चे के हाथ आए जैसे पतंग कट कर.

ढलते ही शाम सूनी देहरी के भाग जागे,
कोई अभी गया है नन्हा-सा दीप रख कर.

ओ चांद, मेरे वीरा, अब तो जरा बता दे,
मेले में खो गया तू हमसे कहां बिछड़ कर?

दरवाजा खोले चौपट है नाच रही बिटिया 
आएंगी लच्छमी घर, आएंगी लच्छमी घर.

-रमेश तैलंग 



चित्रा सौजन्य: गूगल 

Friday, November 9, 2012

आज बस इतना ही ..................




-1-

जहां उम्मीद थी ज्यादा वहां से खाली हाथ आए.
बबूलों से बुरे निकले तेरे गुलमोहर के साए.

मैं अपनी दास्ताँ तुझको सुनाता किस तरह बोलो,
कलेजा मुंह को आया और कभी आंसू निकल आए .

उदासी है कि पीछा छोडती ही है नहीं मेरा
कोई बैठा रहे कब तक दुआ में हाथ फैलाए?

सुबह से काम पर निकला है बेटा, और मां का मन
हिलोरें ले रहा है, लौट कर वो जल्दी घर आए.

किसी चेहरे को पढ़ना है अगर तो गौर से पढ़ना
कहीं ऐसा न हो सहरा भी दरिया-सा  नज़र आए.

हजारों लम्हे जी कर जिंदगी का ये मिला हासिल
तसल्ली से न जी पाए, तसल्ली से न मर पाए.

-2-

मेरे जज्बात में जब भी कभी थोड़ा उबाल आया
कभी बच्चों की चिंता तो कभी घर का खयाल आया

पुरानी बंदिशें थीं या पुरानी रंजिशें थी वो 
मेरी पूंजी का हिस्सा थीं, करीने से संभाल आया .

इसे हालात से समझौता करना, चाहो तो कह लो,
जगी मरने की ख्वाहिश तो उसे भी कल पे टाल आया.

मैं ऐसा हूं तो क्यों ऐसा ही हूं, हर पल मेरे आगे.
पलट कर बारहा वो ही पुराना-सा सवाल आया.

किसी को चाहा तो अच्छा-बुरा कुछ भी नहीं देखा,
बड़ी मुश्किल से अपनी जिंदगी में ये कमाल आया

-3-

पिछले दिनों जो घट गया, वो घट गया, अब भूल जा. 
वो वक्त जैसा भी था आखिर कट गया, अब भूल जा. 

वो आँधियों का दौर था, पत्ता भी तब सिरमौर था.
सीने पे रख कर पांव, बादल छंट गया, अब भूल जा.

समता का कब वो  युद्ध था, हर शख्स तेरे विरुद्ध था,
खाकर थपेड़े हाथ से जो तट गया, अब भूल जा.

सच से बड़ा हर झूठ था, लड़ता भी तो तू टूटता,
अच्छा हुआ जो रास्ते से हट गया, अब भूल जा.

इस हार का भी रंग है, जीवन का ये भी अंग है,
ये सच है कि  थोड़ा-बहुत जीवट गया, अब भूल जा 

-4-

बर्तन पुराने होते-होते जंग खा गए. 
कांसे के,लोहा-पीतल के दिन भुला गए. 

कमरे में, रसोई में, जब जगह नहीं मिली
बोरे में बंद होकर छत में समा गए. 

बरसों पुरानी बजने की आदत नहीं गई 
बच्चों को तंग आना था सो तंग आ गए.

आखिर तो वही होना था, एक दिन कबाड़ में,
वे गुमशुदा हुए तो कहानी बना गए.

आंखों के सामने ही बहुत कुछ बदल गया 
अफसोस करते बूढ़े सब मर-मरा गए.