Showing posts with label राग-विराग. Show all posts
Showing posts with label राग-विराग. Show all posts

Wednesday, March 5, 2014

राग-विराग -जुगलबंदी : (कुछ दोहे कुछ गीत) 5 मार्च, 2014



आज किवरियां न खोल रे!

फागुन में मन डांवाडोल रे!
ए सखि!
आज किवरियां न खोल रे!

बौराई भोर और  
पागल पवन है 
आंखों से दूर बसा 
मेरा  सजन है
ऐसे में कैसी कलोल रे!
ए सखि!
आज किवरियां न खोल रे!

खेलूं होरी कैसे] 
रूह ही प्यासी
रंगों पे छाई है 
आज  उदासी   
भाएं न टेसू के बोल रे
ए सखि!
आज किवरियां न खोल रे!

ताने दे दुनिया जो
विरहा  मैं गाऊं]
तू ही बता  कैसे 
फागुन मनाऊं
वैरी-सा लागे हिंडोल रे! 

ए सखि!
आज किवरियां न खोल रे!

-रमेश तैलंग 






  

Sunday, March 2, 2014

राग-विराग जुगलबंदी (कुछ दोहे कुछ गीत) : 3 मार्च, 2014




मेला कब का उठ गया, सूने हो गए घाट 
अरे बावले, तू खड़ा, किसकी जोहे बाट?

चमक-दमक से जो भरे वे तो  हैं बाजार
सहज,सादगी को बना, अपना  घर-संसार

ना कोई ताला जड़ा, न कुण्डी ही द्वार
बंदिश में रहता नहीं, मुक्त पवन-सा प्यार

देवे जो सो देवता, लेवे सो भिखमंग 
बलिहारी जग की जहां दोनों घूमे संग

भूल चले सब दृश्य और धुंधलाई हर याद
स्मृतियां भी  मांगतीं,  मिटटी, पानी, खाद

स्वारथ की बलि चढ़ गई रिश्तों की रसबेल
मन को चोटिल कर गया यह गुलेल का खेल

पहले, बच्चे की तरह, पालो  हर उम्मीद 
फिर उसको ही टूटते, देखो, खो दो  नींद 

बड़ी-बड़ी सब सह गए कटु बातें  मतिधीर 
एक छोटी -सी बात ने दिया कलेजा चीर

सुकवि.और लेखक सभी निन्दा रस  में दक्ष 
स्याम वरन अब कर रहे  उजला रचना पक्ष

दुनिया को आये  नज़र  कांटो में ही खोट 
पर हमने देखे यहां,  फूल मारते चोट 

Saturday, March 1, 2014

राग-विराग जुगलबंदी -2 मार्च, 2014


चित्र सौजन्य -googal 


- :: गीत :: -

सबके दिन फिरते हैं,
तू क्यों इतना 
निराश मन है रे!

बड़ी-बड़ी 
लहरें तट को छूकर 
रोज गुज़र जाती हैं 
रेतीली 
आकृतियां बनती हैं 
और बिखर जाती हैं 

पर हठी समंदर के 
आगे अपराजित सर्जन है रे!

जीवन का 
हर पल संभावना 
नई लिए आता है  
फूटता नया अंकुर  
जीर्ण पात 
जब भी झर जाता है

संशय में 
हारे मनुष्य का 
आशा आलंबन है रे! 
---